ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मन्त्र ८-९ ]
अन्तर्यामी और अधिष्ठाता भी हैं; तथा वे ही इन सबसे अलग निर्विशेष परमात्मा हैं। वे सर्वशक्तिमान् भी हैं और सब शक्तियोंसे रहित भी हैं। वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी। वे साकार भी हैं और निराकार भी। वास्तवमें वे हमारी बुद्धि और तर्कसे सर्वथा अतीत हैं ॥७॥
सम्बन्ध— उक्त परब्रह्म परमात्माकी उनके वाचक प्रणवके साथ एकता करते हुए कहते हैं—
सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥८॥
सः =वह (जिसको चार पादवाला बताया गया है); अयम् =यह; आत्मा =परमात्मा; अध्यक्षरम् =(उसके वाचक) प्रणवके अधिकारमें (प्रकरणमें) वर्णित होनेके कारण; अधिमात्रम् =तीन मात्राओंसे युक्त; ओंकारः =ओंकार है; अकारः =‘अ’; उकारः =‘उ’ (और); मकारः =‘म’; इति =ये (तीनों); मात्राः =मात्राएँ ही; पादाः =(तीन) पाद हैं; च =और; पादाः =(उस ब्रह्मके तीन) पाद ही; मात्राः =(तीन) मात्राएँ हैं ॥८॥
व्याख्या— वे परब्रह्म परमात्मा, जिनके चार पादोंका वर्णन किया गया है, यहाँ अक्षरके प्रकरणमें अपने नामसे अभिन्न होनेके कारण तीन मात्राओंवाला ओंकार हैं। ‘अ’, ‘उ’ और ‘म’—ये तीनों मात्राएँ ही उनके उपर्युक्त तीन पाद हैं और उनके तीनों पाद ही ओंकारकी तीन मात्राएँ हैं। जिस प्रकार ओंकार अपनी मात्राओंसे अलग नहीं है, उसी प्रकार अपने पादोंसे परमात्मा अलग नहीं हैं। यहाँ पाद और मात्राकी एकता ओंकारके द्वारा परब्रह्म परमात्माकी उपासनाके लिये की गयी है—ऐसा मालूम होता है ॥८॥
सम्बन्ध— ओंकारकी किस मात्रासे ब्रह्मके किस पादकी एकता है और वह क्यों है? इस जिज्ञासापर तीन मात्राओंका रहस्य समझानेके लिये प्रथम पहले पाद और पहली मात्राकी एकताका प्रतिपादन करते हैं—
जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽऽसे- रादिमत्त्वाद्वाऽऽज्जोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९ ॥