ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र १० ]
माण्डूक्योपनिषद्
२९३
प्रथमाः=(औंकारकी) पहली; मात्रा=मात्रा; अकारः=अकार ही; आसेः=(समस्त जगत्के नामोंमें अर्थात् शब्दमात्रमें) व्यास होनेके कारण; वा=और; आदिमत्त्वात्=आदिवाला होनेके कारण; जागरितस्थानः=जगत्की भाँति स्थूल जगत्-रूप शरीरवाला; वैश्वानरः=वैश्वानर नामक पहला पाद है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=जानता है; [ सः ] ह वै=वह अवश्य ही; सर्वान्=सम्पूर्ण; कामान्=भोगोंको; आप्नोति=प्राप्त कर लेता है; च=और; आदिः=सबका आदि (प्रधान); भवति=बन जाता है ॥ ९ ॥
व्याख्या —परब्रह्म परमात्माके नामात्मक औंकारकी जो पहली मात्रा ‘अ’ है, यह समस्त जगत्के नामोंमें अर्थात् किसी भी अर्थको बतलानेवाले जितने भी शब्द हैं, उन सबमें व्यास है। स्वर अथवा व्यञ्जन—कोई भी वर्ण अकारसे रहित नहीं है। श्रुति भी कहती है—‘अकारो वै सर्वा वाक्’ (ऐतरेय आरण्यक० २।३।६)। गीतामें भी भगवान्ने कहा है कि अक्षरोंमें (वर्णोंमें) मैं ‘अ’ हूँ (१०।३३) तथा समस्त वर्णोंमें ‘अ’ ही पहला वर्ण है। इसी प्रकार इस स्थूल जगत्-रूप विराट् शरीरमें वे वैश्वानररूप अन्तर््यामी परमेश्वर व्यास हैं और विराट्-रूपसे सबके पहले स्वयं प्रकट होनेके कारण इस जगत्के आदि भी वे ही हैं। इस प्रकार ‘अ’ की और जगत्की भाँति प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले इस स्थूल जगत्-रूप शरीरमें व्यास वैश्वानर नामक प्रथम पादकी एकता होनेके कारण ‘अ’ ही पूर्णब्रह्म परमेश्वरका पहला पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार अकार और विराट् शरीरके आत्मा परमेश्वरकी एकताको जानता है और उनकी उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको अर्थात् इच्छित पदार्थोंको पा लेता है और जगत्में प्रधान—सर्वमान्य हो जाता है ॥ ९ ॥
सम्बन्ध —अब दूसरे पादकी और दूसरी मात्राकी एकताका प्रतिपादन करते हैं—
स्वजस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्दोत्कर्षति ह वै ज्ञानसंततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १० ॥