ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 296, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मन्त्र १० ]
द्वितीया=(औंकारकी) दूसरी; मात्रा=मात्रा; उकारः='उ'; उत्कर्षात्=(‘अ’ से) उत्कृष्ट होनेके कारण; वा=और; उभयत्वात्=दोनों भाववाला होनेके कारण; स्वप्नस्थानः=स्वप्नकी भाँति सूक्ष्म जगत्-रूप शरीरवाला; तैजसः=तैजस नामक (दूसरा पाद) है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=जानता है; [ सः ] ह वै=वह अवश्य ही; ज्ञानसंततिम्=ज्ञानकी परम्पराको; उत्कर्षति=उन्नत करता है; च=और; समानः=समान भाववाला; भवति=हो जाता है; अस्य=इसके; कुले=कुलमें; अब्रह्मवित्=हिरण्यगर्भरूप परमेश्वरको न जाननेवाला; न=नहीं; भवति=होता ॥ १० ॥
व्याख्या —परब्रह्म परमात्माके नामात्मक औंकारकी दूसरी मात्रा जो ‘उ’ है, यह ‘अ’से उत्कृष्ट (ऊपर उठा हुआ) होनेके कारण श्रेष्ठ है तथा ‘अ’ और ‘म’ इन दोनोंके बीचमें होनेके कारण उन दोनोंके साथ इसका घनिष्ठ सम्बन्ध है; अतः यह उभयस्वरूप है। इसी प्रकार वैश्वानरसे तैजस (हिरण्यगर्भ) उत्कृष्ट है तथा वैश्वानर और प्राज्ञके मध्यगत होनेसे वह उभयसम्बन्धी भी है। इस समानताके कारण ही ‘उ’ को ‘तैजस’ नामक द्वितीय पाद कहा गया है। भाव यह है कि इस स्थूल जगत्के प्राकट्यसे पहले परमेश्वरके आदि संकल्पद्वारा जो सूक्ष्म सृष्टि उत्पन्न होती है, जिसका वर्णन मानस-सृष्टिके नामसे आता है, जिसमें समस्त तत्त्व तन्मात्राओंके रूपमें रहते हैं, स्थूलरूपमें परिणत नहीं होते, उस सूक्ष्म जगत्-रूप शरीरमें चेतन प्रकाशस्वरूप हिरण्यगर्भ परमेश्वर इसके अधिष्ठाता होकर रहते हैं तथा कारण-जगत् और स्थूल-जगत्—इन दोनोंसे ही सूक्ष्म जगत्का घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसलिये वे कारण और स्थूल दोनों रूपवाले हैं। इस तरह ‘उ’की और मानसिक सृष्टिके अधिष्ठाता तैजसरूप दूसरे पादकी समानता होनेके कारण ‘उ’ ही पूर्णब्रह्म परमात्माका दूसरा पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार ‘उ’ और तेजोमय हिरण्यगर्भरूपकी एकताके रहस्यको समझ लेता है, वह स्वयं इस जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंको भलीभाँति प्रत्यक्ष कर लेता है, इस कारण इस ज्ञानकी परम्पराको उन्नत करता है—उसे बढ़ाता है तथा सर्वत्र समभाववाला हो जाता है; क्योंकि जगत्के सूक्ष्म-तत्त्वोंको समझ लेनेके कारण उसका वास्तविक रहस्य समझमें आ जानेसे उसकी विषमताका नाश हो जाता