भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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मन्त्र ११ ]

माण्डूक्योपनिषद्

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है। इसलिये उससे उत्पन्न हुई संतान भी कोई ऐसी नहीं होती, जिसको हिरण्यगर्भरूप परमेश्वरके उपर्युक्त रहस्यका ज्ञान न हो जाय॥१०॥

सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद॥११॥

तृतीया=(ओंकारकी) तीसरी; मात्रा=मात्रा; मकारः='म' ही; मितेः=माप करनेवाला (जाननेवाला) होनेके कारण; वा=और; अपीतेः=विलीन करनेवाला होनेसे; सुषुप्तस्थानः=सुषुप्तिकी भाँति कारणमें विलीन जगत् ही जिसका शरीर है; प्राज्ञः=प्राज्ञ नामक तीसरा पाद है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=जानता है, [ सः ] ह वै=वह अवश्य ही; इदम्=इस; सर्वम्=सम्पूर्ण कारण-जगत्को; मिनोति=माप लेता है अर्थात् भलीभाँति जान लेता है; च=और; अपीतिः=सबको अपनेमें विलीन करनेवाला; भवति=हो जाता है॥११॥

व्याख्या —परमात्माके नामात्मक ओंकारकी जो तीसरी मात्रा 'म' है, यह 'मा' धातुसे बना है। 'मा' धातुका अर्थ माप लेना यानी अमुक वस्तु इतनी है, यह समझ लेना है। यह 'म' ओंकारकी अन्तिम मात्रा है; 'अ' और 'उ' के पीछे उच्चरित होती है—इस कारण दोनोंका माप इसमें आ जाता है; अतः यह उनको जाननेवाला है। तथा 'म'का उच्चारण होते-होते मुख बंद हो जाता है; 'अ' और 'उ' दोनों उसमें विलीन हो जाते हैं; अतः वह उन दोनों मात्राओंको अन्तमें विलीन करनेवाला भी है। इसी प्रकार सुषुप्तस्थानीय कारण-जगत्का अधिष्ठाता प्राज्ञ भी सर्वज्ञ है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों अवस्थाओंमें स्थित जगत्को जाननेवाला है। कारण-जगत्से ही सूक्ष्म और स्थूल जगत्की उत्पत्ति होती है और उसीमें उनका लय होता है। इस प्रकार 'म' की और कारण-जगत्के अधिष्ठाता प्राज्ञ नामक तीसरे पादकी समता होनेके कारण 'म' रूप तीसरी मात्रा ही पूर्ण ब्रह्मका तीसरा पाद है। जो मनुष्य इस प्रकार 'म' और 'प्राज्ञ' स्वरूप परमेश्वरकी एकताको जानता है—इस रहस्यको समझकर ओंकारके स्मरणद्वारा परमेश्वरका चिन्तन करता है, वह इस मूलसहित सम्पूर्ण