ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 298, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ मन्त्र १२ ]
जगत्को भली प्रकार जान लेता है और सबको विलीन करनेवाला हो जाता है, अर्थात् उसकी बाह्य दृष्टि निवृत्त हो जाती है। अतः वह सर्वत्र एक परब्रह्म परमेश्वरको ही देखनेवाला बन जाता है ॥११॥
सम्बन्ध— मात्रारहित ओंकारकी चौथे पादके साथ एकताका प्रतिपादन करते हुए इस उपनिषद्का उपसंहार करते हैं—
अमात्रश्रुतुर्थाऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद य एवं वेद ॥१२॥
एवम्=इसी प्रकार; अमात्रः=मात्रारहित; ओंकारः=प्रणव ही; अव्यवहार्यः=व्यवहारमें न आनेवाला; प्रपञ्चोपशमः=प्रपञ्चसे अतीत; शिवः=कल्याणमय; अद्वैतः=अद्वितीय; चतुर्थः=पूर्ण ब्रह्मका चौथा पाद है; [ सः ] आत्मा=वह आत्मा; एव=अवश्य ही; आत्मना=आत्माके द्वारा; आत्मानम्=परात्परब्रह्म परमात्मामें; संविशति=पूर्णतया प्रविष्ट हो जाता है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=जानता है; यः एवम् वेद=जो इस प्रकार जानता है ॥१२॥
व्याख्या— परब्रह्म परमात्माके नामात्मक ओंकारका जो मात्रारहित, बोलनेमें न आनेवाला निराकार स्वरूप है, वही मन-वाणीका अविषय होनेसे व्यवहारमें न लाया जा सकेनेवाला, प्रपञ्चसे अतीत, कल्याणमय, अद्वितीय—निर्गुण-निराकाररूप चौथा पाद है, भाव यह है कि जिस प्रकार तीन मात्राओंकी पहले बताये हुए तीन पादोंके साथ समता है, उसी प्रकार ओङ्कारके निराकार स्वरूपकी परब्रह्म परमात्माके निर्गुण-निराकार निर्विशेषरूप चौथे पादके साथ समता है। जो मनुष्य इस प्रकार ओंकार और परब्रह्म परमात्माकी अर्थात् नाम और नामीकी एकताके रहस्यको समझकर परब्रह्म परमात्माको पानेके लिये उनके नाम-जपका अवलम्बन लेकर तत्परतासे साधन करता है, वह निस्संदेह आत्मासे आत्मामें अर्थात् परात्पर परब्रह्म परमात्मामें प्रविष्ट हो जाता है। ‘जो इस प्रकार जानता है’ इस वाक्यको दो बार कहकर उपनिषद्की समाप्ति सूचित की गयी है।