ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 299, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र १२ ]
माण्डूक्योपनिषद्
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परब्रह्म परमात्मा और उनके नामकी महिमा अपार है, उसका कोई पार नहीं पा सकता। इस प्रकरणमें उन असीम पूर्ण ब्रह्म परमात्माके चार पादोंकी कल्पना उनके स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों सगुण रूपोंकी और निर्गुण-निराकार स्वरूपकी एकता दिखानेके लिये तथा नाम और नामीकी सब प्रकारसे एकता दिखानेके लिये एवं उनकी सर्वभवन-सामर्थ्यरूप जो अचिन्त्य शक्ति है, वह उनसे सर्वथा अभिन्न है—यह भाव दिखानेके लिये की गयी है, ऐसा अनुमान होता है ॥ १२ ॥
॥ अथर्ववेदीय माण्डूक्योपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्बिजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाः सस्तनूभिव्यंशेम देवहितं यदायुः ॥* स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यौ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥†
ॐ शान्तिः!! शान्तिः!! शान्तिः!!!
इसका अर्थ इस उपनिषद्के आदिमें दिया जा चुका है।
- यह मन्त्र ऋग्वेद (१०।८९।६) में है तथा यजुर्वेद (२५।१९) में भी है।
† यह मन्त्र ऋग्वेद (१०।८९।८) में है तथा यजुर्वेद (२५।२१) में भी है।