भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 300

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

ऐतरेयोपनिषद्

ऋग्वेदीय ऐतरेय आरण्यकमें दूसरे आरण्यकके चौथे, पाँचवें और छठे अध्यायोंको ऐतरेय-उपनिषद्के नामसे कहा गया है। इन तीन अध्यायोंमें ब्रह्मविद्याकी प्रधानता है। इस कारण इन्हींको 'उपनिषद्' माना है।

शान्तिपाठ

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता। मनो मे वाचि प्रतिष्ठित- माविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रासंदधाम्युतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि तन्नामवतु। तद्वाकारमवतु। अवतु मामवतु वक्कारमवतु वक्कारम्॥

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

ॐ=हे सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन्!; मे=मेरी; वाक्=वाक्-इन्द्रिय; मनसि=मनमें; प्रतिष्ठिता=स्थित हो जाय; मे=मेरा; मनः=मन; वाचि=वाक्-इन्द्रियमें; प्रतिष्ठितम्=स्थित हो जाय; आविः=हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर!; मे=मेरे लिये; आवीः एधि=(तू) प्रकट हो; मे=(हे मन और वाणी! तुम दोनों) मेरे लिये; वेदस्य=वेदविषयक ज्ञानको; आणीस्थः=लानेवाले बनो; मे=मेरा; श्रुतम्=सुना हुआ ज्ञान; मा प्रहासीः=(मुझे) न छोड़े; अनेन अधीतेन=इस अध्ययनके द्वारा; अहोरात्रान्=(मैं) दिन और रात्रियोंको; संदधामि=एक कर दूँ; ऋतम्=(मैं) श्रेष्ठ शब्दोंको ही; वदिष्यामि=बोलूँगा; सत्यम्=सत्य ही; वदिष्यामि=बोला करूँगा; तत्=वह (ब्रह्म); माम् अवतु=मेरी रक्षा करे; तत्=वह (ब्रह्म); वक्कारम् अवतु=आचार्यकी रक्षा करे; अवतु माम्=रक्षा करे मेरी (और); अवतु वक्कारम्=रक्षा करे (मेरे) आचार्यकी; अवतु वक्कारम्=रक्षा करे (मेरे) आचार्यकी; ओम् शान्तिः= भगवान् शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं।