ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
मन्त्र १२ ]
माण्डूक्योपनिषद्
२९७
परब्रह्म परमात्मा और उनके नामकी महिमा अपार है, उसका कोई पार नहीं पा सकता। इस प्रकरणमें उन असीम पूर्ण ब्रह्म परमात्माके चार पादोंकी कल्पना उनके स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों सगुण रूपोंकी और निर्गुण-निराकार स्वरूपकी एकता दिखानेके लिये तथा नाम और नामीकी सब प्रकारसे एकता दिखानेके लिये एवं उनकी सर्वभवन-सामर्थ्यरूप जो अचिन्त्य शक्ति है, वह उनसे सर्वथा अभिन्न है—यह भाव दिखानेके लिये की गयी है, ऐसा अनुमान होता है ॥ १२ ॥
॥ अथर्ववेदीय माण्डूक्योपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्बिजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाः सस्तनूभिव्यंशेम देवहितं यदायुः ॥* स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यौ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥†
ॐ शान्तिः!! शान्तिः!! शान्तिः!!!
इसका अर्थ इस उपनिषद्के आदिमें दिया जा चुका है।
- यह मन्त्र ऋग्वेद (१०।८९।६) में है तथा यजुर्वेद (२५।१९) में भी है।
† यह मन्त्र ऋग्वेद (१०।८९।८) में है तथा यजुर्वेद (२५।२१) में भी है।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
ऐतरेयोपनिषद्
ऋग्वेदीय ऐतरेय आरण्यकमें दूसरे आरण्यकके चौथे, पाँचवें और छठे अध्यायोंको ऐतरेय-उपनिषद्के नामसे कहा गया है। इन तीन अध्यायोंमें ब्रह्मविद्याकी प्रधानता है। इस कारण इन्हींको 'उपनिषद्' माना है।
शान्तिपाठ
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता। मनो मे वाचि प्रतिष्ठित- माविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रासंदधाम्युतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि तन्नामवतु। तद्वाकारमवतु। अवतु मामवतु वक्कारमवतु वक्कारम्॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
ॐ=हे सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन्!; मे=मेरी; वाक्=वाक्-इन्द्रिय; मनसि=मनमें; प्रतिष्ठिता=स्थित हो जाय; मे=मेरा; मनः=मन; वाचि=वाक्-इन्द्रियमें; प्रतिष्ठितम्=स्थित हो जाय; आविः=हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर!; मे=मेरे लिये; आवीः एधि=(तू) प्रकट हो; मे=(हे मन और वाणी! तुम दोनों) मेरे लिये; वेदस्य=वेदविषयक ज्ञानको; आणीस्थः=लानेवाले बनो; मे=मेरा; श्रुतम्=सुना हुआ ज्ञान; मा प्रहासीः=(मुझे) न छोड़े; अनेन अधीतेन=इस अध्ययनके द्वारा; अहोरात्रान्=(मैं) दिन और रात्रियोंको; संदधामि=एक कर दूँ; ऋतम्=(मैं) श्रेष्ठ शब्दोंको ही; वदिष्यामि=बोलूँगा; सत्यम्=सत्य ही; वदिष्यामि=बोला करूँगा; तत्=वह (ब्रह्म); माम् अवतु=मेरी रक्षा करे; तत्=वह (ब्रह्म); वक्कारम् अवतु=आचार्यकी रक्षा करे; अवतु माम्=रक्षा करे मेरी (और); अवतु वक्कारम्=रक्षा करे (मेरे) आचार्यकी; अवतु वक्कारम्=रक्षा करे (मेरे) आचार्यकी; ओम् शान्तिः= भगवान् शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः=शान्तिस्वरूप हैं।
ऐतरेयोपनिषद्
२९९
व्याख्या —इस शान्तिपाठमें सब प्रकारके विघ्नोंकी शान्तिके लिये परमात्मासे प्रार्थना की गयी है। प्रार्थनाका भाव यह है कि 'हे सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन्! मेरी वाणी मनमें स्थित हो जाय और मन वाणीमें स्थित हो जाय; अर्थात् मेरे मन-वाणी दोनों एक हो जायँ। ऐसा न हो कि मैं वाणीसे एक पाठ पढ़ता रहूँ और मन दूसरा ही चिन्तन करता रहे या मनमें दूसरा ही भाव रहे और वाणीद्वारा दूसरा प्रकट करूँ। मेरे संकल्प और वचन दोनों विशुद्ध होकर एक हो जायँ। हे प्रकाशस्वरूप परमेश्वर! आप मेरे लिये प्रकट हो जाइये—अपनी योगमायाका पर्दा मेरे सामनेसे हटा लीजिये। (इस प्रकार परमात्मासे प्रार्थना करके अब उपासक अपने मन और वाणीसे कहता है कि) हे मन और वाणी! तुम दोनों मेरे लिये वेदविषयक ज्ञानकी प्राप्ति करानेवाले बनो—तुम्हारी सहायतासे मैं वेदविषयक ज्ञान प्राप्त कर सकूँ। मेरा गुरुमुखसे सुना हुआ और अनुभवमें आया हुआ ज्ञान मेरा त्याग न करे अर्थात् वह सर्वदा मुझे स्मरण रहे—मैं उसे कभी न भूलूँ। मेरी इच्छा है कि अपने अध्ययनद्वारा मैं दिन और रात एक कर दूँ। अर्थात् रात-दिन निरन्तर ब्रह्मविद्याका पठन और चिन्तन ही करता रहूँ। मेरे समयका एक क्षण भी व्यर्थ न बीते। मैं अपनी वाणीसे सदा ऐसे ही शब्दोंका उच्चारण करूँगा; जो सर्वथा उत्तम हो, जिनमें किसी प्रकारका दोष न हो; तथा जो कुछ बोलूँगा, सर्वथा सत्य बोलूँगा—जैसा देखा, सुना और समझा हुआ भाव है, ठीक वही भाव वाणीद्वारा प्रकट करूँगा। उसमें किसी प्रकारका छल नहीं करूँगा। (इस प्रकार अपने मन और वाणीको दृढ़ बनाकर अब पुनः परमात्मासे प्रार्थना करता है—) वे परब्रह्म परमात्मा! मेरी रक्षा करें। वे परमेश्वर मुझे ब्रह्मविद्या सिखानेवाले आचार्यकी रक्षा करें। वे रक्षा करें मेरी और मेरे आचार्यकी, जिससे मेरे अध्ययनमें किसी प्रकारका विघ्न उपस्थित न हो। आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—तीनों प्रकारके विघ्नोंकी सर्वथा निवृत्तिके लिये तीन बार 'शान्तिः' पदका उच्चारण किया गया है। भगवान् शान्तिस्वरूप हैं, इसलिये उनके स्मरणसे शान्ति निश्चित है।
३००
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
प्रथम अध्याय
प्रथम खण्ड
ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत्किञ्चन मिषत्। स ईक्षत लोकात्र सृजा इति ॥ १ ॥
ॐ=ॐ इस परमात्माके नामका उच्चारण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं; इदम्=यह जगत्; अग्रे=(प्रकट होनेसे) पहले; एकः=एकमात्र; आत्मा=परमात्मा; वै=ही; आसीत्=था; अन्यत्=(उसके सिवा) दूसरा; किञ्चन एव=कोई भी; मिषत्=चेष्टा करनेवाला; न=नहीं था; सः=उस (परम पुरुष परमात्मा) ने; नु=(मैं) निश्चय ही; लोकान् सृजै=लोकोंकी रचना करूँ; इति=इस प्रकार; ईक्षत=विचार किया ॥ १ ॥
व्याख्या—इस मन्त्रमें परमात्माके सृष्टि-रचनाविषयक प्रथम संकल्पका वर्णन है। भाव यह है कि देखने-सुनने और समझनेमें आनेवाले जड़-चेतनमय प्रत्यक्ष जगत्के इस रूपमें प्रकट होनेसे पहले कारण-अवस्थामें एकमात्र परमात्मा ही थे। उस समय इसमें भिन्न-भिन्न नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति नहीं थी। उस समय उन परब्रह्म परमात्माके सिवा दूसरा कोई भी चेष्टा करनेवाला नहीं था। सृष्टिके आदिमें उन परम पुरुष परमात्माने यह विचार किया कि 'मैं प्राणियोंके कर्म-फल-भोगार्थ भिन्न-भिन्न लोकोंकी रचना करूँ' ॥ १ ॥
स इमाल्लोकानसृजत। अभ्यो मरीचीर्ममापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः ॥ २ ॥
सः=उसने; अभ्यः=अम्भ (द्युलोक तथा उसके ऊपरके लोक); मरीचीः=मरीचि (अन्तरिक्ष); मरम्=मर (मर्त्यलोक) (और); आपः=जल (पृथिवीके नीचेके लोक); इमान्=इन सब; लोकान् असृजत=लोकोंकी रचना की; दिवम् परेण=द्युलोक—
खण्ड १ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३०१
स्वर्गलोकसे ऊपरके लोक; प्रतिष्ठा=(तथा) उनका आधारभूत; द्यौः=द्युलोक भी; अदः=वे सब; अभ्भः='अभ्भ'के नामसे कहे गये हैं; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्ष लोक (भुवर्लोक) ही; मरीचयः=मरीचि है (तथा); पृथिवी=यह पृथ्वी ही; मरः=मर—मृत्युलोकके नामसे कही गयी है (और); याः=जो; अधस्तात्=(पृथ्वीके) नीचे—भीतरी भागमें (स्थूल पातालादि लोक) हैं; ताः=वे; आपः=जलके नामसे कहे गये हैं ॥ २ ॥
व्याख्या —यह विचार करके परब्रह्म परमेश्वरने अभ्भ, मरीचि, मर और जल—इन लोकोंकी रचना की। इन शब्दोंको स्पष्ट करनेके लिये आगे श्रुतिमें ही कहा गया है कि स्वर्गलोकसे ऊपर जो महः, जनः, तपः और सत्यलोक हैं, वे और उनका आधार द्युलोक—इन पाँचों लोकोंको यहाँ 'अभ्भः' नामसे कहा गया है। उसके नीचे जो अन्तरिक्षलोक (भुवर्लोक) है, जिसमें सूर्य, चन्द्र और तारागण—ये सब किरणोंवाले लोकविशेष हैं, उसका वर्णन यहाँ मरीचि नामसे किया गया है। उसके नीचे जो यह पृथ्वीलोक है— जिसको मृत्युलोक भी कहते हैं, वह यहाँ 'मर' के नामसे कहा गया है और उसके नीचे अर्थात् पृथ्वीके भीतर जो पातालादि लोक हैं, वे 'आपः' के नामसे कहे गये हैं। तात्पर्य यह कि जगत्में जितने भी लोक त्रिलोकी, चतुर्दश भुवन एवं सप्त लोकोंके नामसे प्रसिद्ध हैं, उन सब लोकोंकी परमात्माने रचना की ॥ २ ॥
स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्व्यथ एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत् ॥ ३ ॥
सः =उसने; ईक्षत =फिर विचार किया; इमे =ये; नु =तो हुए; लोकाः =लोक; (अब) लोकपालान् नु सृजै =लोकपालोंकी भी रचना मुझे अवश्य करनी चाहिये; इति =यह विचार करके; सः =उसने; अद्व्यथः =जलसे; एव =ही; पुरुषम् =हिरण्यगर्भरूप पुरुषको; समुद्धृत्य =निकालकर; अमूर्छयत् =उसे मूर्तिमान् बनाया ॥ ३ ॥
व्याख्या —इस प्रकार इन समस्त लोकोंकी रचना करनेके अनन्तर परमेश्वरने फिर विचार किया कि 'ये सब लोक तो रचे गये। अब इन लोकोंकी
३०२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
रक्षा करनेवाले लोकपालोंकी रचना भी मुझे अवश्य करनी चाहिये; अन्यथा बिना रक्षकके ये सब लोक सुरक्षित नहीं रह सकेंगे। यह सोचकर उन्होंने जलमेंसे अर्थात् जल आदि सूक्ष्म महाभूतोंमेंसे हिरण्यमय पुरुषको निकालकर उसको समस्त अङ्ग-उपाङ्गोंसे युक्त करके मूर्तिमान् बनाया। यहाँ ‘पुरुष’ शब्दसे सृष्टिकालमें सबसे पहले प्रकट किये जानेवाले ब्रह्माका वर्णन किया गया है; क्योंकि ब्रह्मासे ही सब लोकपालोंकी और प्रजाको बढ़ानेवाले प्रजापतियोंकी उत्पत्ति हुई है—इस विषयका विस्तृत वर्णन शास्त्रोंमें पाया जाता है और ब्रह्माकी उत्पत्ति जलके भीतरसे कमलनालसे हुई, ऐसा भी वर्णन आता है। अतः यहाँ ‘पुरुष’ शब्दका अर्थ ब्रह्मा मान लेना उचित जान पड़ता है॥ ३ ॥
तमभ्यतपत्तस्याभिमतस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखद्वाम् वाचोऽग्निर्नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष आदित्यः कर्णैं निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्रादिशस्त्वद् निरभिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा नाभिरनिरभिद्यत नाभ्या अपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिशनाद्रेतो रेतस आपः ॥ ४ ॥
(परमात्माने) तम्=उस (हिरण्यगर्भरूप पुरुष) को लक्ष्य करके; अभ्यतपत्=संकल्परूप तप किया; अभिमतस्य=उस तपसे तपे हुए; तस्य=हिरण्यगर्भके शरीरसे; यथाण्डम्=(पहले) अण्डेकी तरह (फूटकर); मुखम्=मुख-छिद्र; निरभिद्यत=प्रकट हुआ; मुखात्=मुखसे; वाक्=वाक्-इन्द्रिय (और); वाचः=वाक्-इन्द्रियसे; अग्निः=अग्निदेवता प्रकट हुआ (फिर); नासिके=नासिकाके दोनों छिद्र; निरभिद्येताम्=प्रकट हुए; नासिकाभ्याम्=नासिका-छिद्रोंमेंसे; प्राणः=प्राण उत्पन्न हुआ (और); प्राणात्=प्राणसे; वायुः=वायुदेवता उत्पन्न हुआ (फिर); अक्षिणी=दोनों आँखोंके छिद्र; निरभिद्येताम्=प्रकट हुए; अक्षिभ्याम्=आँखोंके छिद्रोंमेंसे; चक्षुः=नेत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई (और); चक्षुषः=नेत्र-इन्द्रियसे; आदित्यः=सूर्य प्रकट हुआ
खण्ड १ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३०३
(फिर); कर्णौ=दोनों कानोंके छिद्र; निरभिद्येताम्=प्रकट हुए; कर्णाभ्याम्=कानोंसे; श्रोत्रम्=श्रोत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई (और); श्रोत्रात्=श्रोत्र-इन्द्रियसे; दिशः=दिशाएँ प्रकट हुई (फिर); त्वक्=त्वचा; निरभिद्यत=प्रकट हुई; त्वचः=त्वचासे; लोमानि=रोम उत्पन्न हुए (और); लोमभ्यः=रोमोंसे; ओषधिवनस्पतयः=ओषधि और वनस्पतियाँ प्रकट हुई (फिर); हृदयम्=हृदय; निरभिद्यत=प्रकट हुआ; हृदयात्=हृदयसे; मनः=मनका आविर्भाव हुआ (और); मनसः=मनसे; चन्द्रमाः=चन्द्रमा उत्पन्न हुआ (फिर); नाभिः=नाभि; निरभिद्यत=प्रकट हुई; नाभ्या=नाभिसे; अपानः=अपानवायु प्रकट हुआ (और); अपानात्=अपानवायुसे; मृत्युः=मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ (फिर); शिश्नम्=लिङ्ग; निरभिद्यत=प्रकट हुआ; शिशनात्=लिङ्गसे; रेतः=वीर्य (और); रेतसः=वीर्यसे; आपः=जल उत्पन्न हुआ ॥ ४ ॥
व्याख्या —इस प्रकार हिरण्यगर्भ पुरुषको उत्पन्न करके उसके अङ्ग-उपाङ्गोंके व्यक्त करनेके उद्देश्यसे जब परमात्माने संकल्परूप तप किया, तब उस तपके फलस्वरूप हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरमें सर्वप्रथम अण्डेकी भाँति फूटकर मुख-छिद्र निकला। मुखसे वाक्-इन्द्रिय उत्पन्न हुई और वाक्-इन्द्रियसे उसका अधिष्ठात्-देवता अग्नि उत्पन्न हुआ। फिर नासिकाके दोनों छिद्र हुए, उनमेंसे प्राणवायु प्रकट हुआ और प्राणोंसे वायुदेवता उत्पन्न हुआ। यहाँ प्राणेन्द्रियका अलग वर्णन नहीं है; अतः प्राण-इन्द्रिय और उसके देवता अश्विनीकुमार भी नासिकासे ही उत्पन्न हुए—यों समझ लेना चाहिये। इसी प्रकार रसना-इन्द्रिय और उसके देवताका भी अलग वर्णन नहीं है; अतः मुखसे वाक्-इन्द्रियके साथ-साथ रसना-इन्द्रिय और उसके देवताकी भी उत्पत्ति हुई—यह समझ लेना चाहिये। फिर आँखोंके दोनों छिद्र प्रकट हुए, उनमेंसे नेत्र-इन्द्रिय और नेत्र-इन्द्रियसे उसका देवता सूर्य उत्पन्न हुआ। फिर कानोंके दोनों छिद्र निकले, उनमेंसे श्रोत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई और श्रोत्र-इन्द्रियसे उसके देवता दिशाएँ उत्पन्न हुई। उसके बाद त्वचा (चर्म) प्रकट हुई, त्वचासे रोम उत्पन्न हुए, रोमोंसे ओषधियाँ और वनस्पतियाँ उत्पन्न हुई। फिर हृदय प्रकट हुआ, हृदयसे मन और मनसे उसका अधिष्ठाता चन्द्रमा उत्पन्न हुआ।
३०४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
फिर नाभि प्रकट हुई, नाभिसे अपानवायु और अपानवायुसे गुदा-इन्द्रियका अधिष्ठाता मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ। नाभिकी उत्पत्तिके साथ ही गुदा-छिद्र और गुदा-इन्द्रियकी उत्पत्ति भी समझ लेनी चाहिये। यहाँ अपानवायु मलत्यागमें हेतु होनेके कारण और उसका स्थान नाभि होनेके कारण मुख्यतासे उसीका नाम लिया गया है। परंतु मृत्यु अपानका अधिष्ठाता नहीं है, वह गुदा-इन्द्रियका अधिष्ठाता है; अतः उपलक्षणसे गुदा-इन्द्रियका वर्णन भी इसके अन्तर्गत मान लेना उचित प्रतीत होता है। फिर लिङ्ग प्रकट हुआ, उसमेंसे वीर्य और उससे जल उत्पन्न हुआ। यहाँ लिङ्गकी उत्पत्तिसे उपस्थेन्द्रिय और उसका देवता प्रजापति उत्पन्न हुआ—यह बात भी समझ लेनी चाहिये ॥४॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन् महत्पर्युवे प्रापतंस्तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एनमबुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १ ॥
ताः=वे; एताः सृष्टाः=परमात्माद्वारा रचे हुए ये सब; देवताः=अग्नि आदि देवता; अस्मिन्=इस (संसाररूप); महति अर्णवे=महान् समुद्रमें; प्रापतन्=आ पड़े; (तब परमात्माने) तम्=उस (समस्त देवताओंके समुदाय) को; अशनायापिपासाभ्याम्=भूख और प्याससे; अन्ववार्जत्=युक्त कर दिया; (तब) ताः=वे सब अग्नि आदि देवता; एनम् अबुवन्=इस परमात्मासे बोले (भगवन्!); नः=हमारे लिये; आयतनम् प्रजानीहि=एक ऐसे स्थानकी व्यवस्था कीजिये; यस्मिन्=जिसमें; प्रतिष्ठिताः=स्थित रहकर; (हमलोग) अन्नम्=अन्न; अदाम इति=भक्षण करें ॥ १ ॥
व्याख्या—परमात्माद्वारा रचे गये वे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता अग्नि आदि सब
खण्ड २ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३०५
देवता संसाररूपी इस महान् समुद्रमें आ पड़े। अर्थात् हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरसे उत्पन्न होनेके बाद उनको कोई निर्दिष्ट स्थान नहीं मिला जिससे वे उस समष्टि-शरीरमें ही रहे। तब परमात्माने उस देवताओंके समुदायको भूख और पिपासासे संयुक्त कर दिया। अतः भूख और प्याससे पीड़ित होकर वे अग्नि आदि सब देवता अपनी सृष्टि करनेवाले परमात्मासे बोले—‘भगवन्! हमारे लिये एक ऐसे स्थानकी व्यवस्था कीजिये, जिसमें रहकर हमलोग अन्न भक्षण कर सकें—अपना-अपना आहार ग्रहण कर सकें’ ॥ १ ॥
ताभ्यो गामानयत्ता अबुवन्न वै नोऽयमलमिति ताभ्योऽश्वमानयत्ता अबुवन्न वै नोऽयमलमिति ॥ २ ॥
(परमात्मा) ताभ्यः =उन देवताओंके लिये; गाम् =गौका शरीर; आनयत् =लाये (उसे देखकर); ताः =उन्होंने; अबुवन् =कहा; नः =हमारे लिये; अयम् =यह; अलम् =पर्याप्त; न वै =नहीं है; इति =इस प्रकार उनके कहनेपर (परमात्मा); ताभ्यः =उनके लिये; अश्वम् =घोड़ेका शरीर; आनयत् =लाये; (उसे देखकर भी); ताः =उन्होंने (फिर वैसे ही); अबुवन् =कहा कि; अयम् =यह भी; नः =हमारे लिये; अलम् =पर्याप्त; न वै =इति=नहीं है ॥ २ ॥
व्याख्या —इस प्रकार उनके प्रार्थना करनेपर सृष्टिकर्ता परमेश्वरने उन सबके रहनेके लिये एक गौका शरीर बनाकर उनको दिखाया। उसे देखकर उन्होंने कहा—‘भगवन्! यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है, अर्थात् इस शरीरसे हमारा कार्य अच्छी तरह नहीं चलनेका। इससे श्रेष्ठ किसी दूसरे शरीरकी रचना कीजिये।’ तब परमात्माने उनके लिये घोड़ेका शरीर रचकर उनको दिखाया। उसे देखकर वे फिर बोले—‘भगवन्! यह भी हमारे लिये यथेष्ट नहीं है, इससे भी हमारा कार्य नहीं चल सकता। आप कोई तीसरा ही शरीर बनाकर हमें दीजिये’ ॥ २ ॥
ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अबुवन् सुकृतं बतेति। पुरुषो वाव सुकृतम्। ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति ॥ ३ ॥
३०६
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
ताभ्यः=(तब परमात्मा) उनके लिये; पुरुषम्=मनुष्यका शरीर; आनयत्=लाये; (उसे देखकर) ताः=वै (अग्नि आदि सब देवता); अब्रुवन्=बोले; बत=बस; सुकृतम् इति=यह बहुत सुन्दर बन गया; वाव=सचमुच ही; पुरुषः=मनुष्य-शरीर; सुकृतम्=(परमात्माकी) सुन्दर रचना है; ताः अब्रवीत्=(फिर) उन सब देवताओंसे (परमात्माने) कहा; (तुमलोग) यथायतनम्=अपने-अपने योग्य आश्रयोंमें; प्रविशत इति=प्रविष्ट हो जाओ ॥ ३ ॥
व्याख्या—इस प्रकार जब उन्होंने गाय और घोड़ेके शरीरोंको अपने लिये यथेष्ट नहीं समझा, तब परमात्माने उनके लिये पुरुषकी अर्थात् मनुष्य-शरीरकी रचना की और वह उनको दिखाया। उसे देखते ही सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और बोले—‘यह हमारे लिये बहुत सुन्दर निवास-स्थान बन गया। इसमें हम आरामसे रह सकेंगे और हमारी सब आवश्यकताएँ भलीभाँति पूर्ण हो सकेंगी।’ सचमुच मनुष्य-शरीर परमात्माकी सुन्दर और श्रेष्ठ रचना है; इसीलिये यह देवदुर्लभ माना गया है और शास्त्रोंमें जगह-जगह इसकी महिमा गायी गयी है; क्योंकि इसी शरीरमें जीव परमात्माके आज्ञानुसार यथायोग्य साधन करके उन्हें प्राप्त कर सकता है। जब सब देवताओंने उस शरीरको पसंद किया, तब उनसे परमेश्वरने कहा—‘तुमलोग अपने-अपने योग्य स्थान देखकर इस शरीरमें प्रवेश कर जाओ’ ॥ ३ ॥
अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्राविशद्विशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिशनं प्राविशन् ॥ ४ ॥
(तब) अग्निः=अग्निदेवता; वाक्=वाक्-इन्द्रिय; भूत्वा=बनकर; मुखम् प्राविशत्=मुखमें प्रविष्ट हो गया; वायुः=वायुदेवता; प्राणः=प्राण; भूत्वा=बनकर; नासिके प्राविशत्=नासिकाके छिद्रोंमें प्रविष्ट हो गया; आदित्यः=सूर्यदेवता;
खण्ड २ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३०७
चक्षुः=नेत्र-इन्द्रिय; भूत्वा=बनकर; अक्षिणी प्राविशत्=औँखोंके गोलकोंमें प्रविष्ट हो गया; दिशः=दिशाओंके अभिमानी देवता; श्रोत्रम्=श्रोत्र-इन्द्रिय; भूत्वा=बनकर; कर्णी प्राविशन्=कानोंमें प्रविष्ट हो गये; ओषधिवनस्पतयः=ओषधि और वनस्पतियोंके अभिमानी देवता; लोमानि=रोएँ; भूत्वा=बनकर; त्वचम् प्राविशन्=त्वचामें प्रविष्ट हो गये; चन्द्रमाः=चन्द्रमा; मनः=मन; भूत्वा=बनकर; हृदयम् प्राविशत्=हृदयमें प्रविष्ट हो गया; मृत्युः=मृत्युदेवता; अपानः=अपानवायु; भूत्वा=बनकर; नाभिम प्राविशत्=नाभिमें प्रविष्ट हो गया; आपः=जलका अभिमानी देवता; रेतः=वीर्य; भूत्वा=बनकर; शिरश्चम् प्राविशन्=लिङ्गमें प्रविष्ट हो गया ॥४॥
व्याख्या—सृष्टिकर्ता परमेश्वरकी आज्ञा पाकर अग्निदेवताने वाक्-इन्द्रियका रूप धारण किया और पुरुषके (मनुष्य-शरीरके) मुखमें प्रविष्ट होकर जिह्वाको अपना आश्रय बना लिया। यहाँ वरुणदेवता भी रसना-इन्द्रिय बनकर मुखमें प्रविष्ट हो गये, यह बात अधिक समझ लेनी चाहिये। फिर वायुदेवता प्राण होकर नासिकाके छिद्रोंमें (उसी मार्गसे समस्त शरीरमें) प्रविष्ट हो गये। अश्विनीकुमार भी प्राण-इन्द्रियका रूप धारण करके नासिकामें प्रविष्ट हो गये—यह बात भी यहाँ उपलक्षणसे समझी जा सकती है; क्योंकि उसका पृथक् वर्णन नहीं है। उसके बाद सूर्यदेवता नेत्र-इन्द्रिय बनकर औँखोंमें प्रविष्ट हो गये। दिशाभिमानी देवता श्रोत्रेन्द्रिय बनकर दोनों कानोंमें प्रविष्ट हो गये। ओषधि और वनस्पतियोंके अभिमानी देवता रोम बनकर चमड़ेमें प्रविष्ट हो गये तथा चन्द्रमा मनका रूप धारण करके हृदयमें प्रविष्ट हो गये। मृत्युदेवता अपान (और पायु-इन्द्रिय) का रूप धारण करके नाभिमें प्रविष्ट हो गये। जलके अधिष्ठातृ-देवता वीर्य बनकर लिङ्गमें प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार सब-के-सब देवता इन्द्रियोंके रूपमें अपने-अपने उपयुक्त स्थानोंमें प्रविष्ट होकर स्थित हो गये ॥४॥
तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति। ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति। तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥ ५ ॥
३०८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
तम्=उस परमात्मासे; अशनायापिपासे=भूख और प्यास—ये दोनों; अब्रूताम्=बोलीं; आवाभ्याम्=हमारे लिये भी; अभिप्रजानीहि=(स्थानकी) व्यवस्था कीजिये; इति=यह (सुनकर); ते=उनसे; अब्रवीत्=(परमात्माने) कहा; वाम्=तुम दोनोंको (में); एतासु देवतासु=इन सब देवताओंमें; एव=ही; आभजामि=भाग दिये देता हूँ; एतासु=इन (देवताओं) में ही (तुम्हें); भागिन्यौ=भागीदार; करोमि इति=बनाता हूँ; तस्मात्=इसलिये; यस्यै कस्यै च=जिस किसी भी; देवतायै=देवताके लिये; हविः=हवि (भिन्न-भिन्न विषय); गृह्णते=(इन्द्रियोंद्वारा) ग्रहण की जाती है; अस्याम्=उस देवता (के भोजन) में; अशनायापिपासे=भूख और प्यास—दोनों; एव=ही; भागिन्यौ=भागीदार; भवतः=होती हैं ॥ ५ ॥
व्याख्या—तब भूख और प्यास—ये दोनों परमेश्वरसे कहने लगीं—‘भगवन्! इन सबके लिये तो आपने रहनेके स्थान निश्चित कर दिये, अब हमारे लिये भी किसी स्थान-विशेषकी व्यवस्था करके उसमें हमें स्थापित कीजिये।’ उनके यों कहनेपर उनसे सुष्टिके रचयिता परमेश्वरने कहा—तुम दोनोंके लिये पृथक् स्थानकी आवश्यकता नहीं है। तुम दोनोंको मैं इन देवताओंके स्थानोंमें भाग दिये देता हूँ। इन देवताओंके आहारमें मैं तुम दोनोंको भागीदार बना देता हूँ। सुष्टिके आदिमें ही परमेश्वरने ऐसा नियम बना दिया था; इसीलिये जब जिस किसी भी देवताको देनेके लिये इन्द्रियोंद्वारा विषय-भोग ग्रहण किये जाते हैं, उस देवताके भागमें ये शुधा और पिपासा भी हिस्सेदार होती ही हैं अर्थात् उस इन्द्रियके अभिमानी देवताकी तृप्तिके साथ शुधा-पिपासाको भी शान्ति मिलती है ॥ ५ ॥
॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥
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खण्ड ३ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३०९
तृतीय खण्ड
स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चात्रमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥
सः=उस (परमात्मा) ने; ईक्षत=फिर विचार किया; नु=निश्चय ही; इमे=ये सब; लोकाः=लोक; च=और; लोकपालाः=लोकपाल; च=भी; (रचे गये, अब) एभ्यः=इनके लिये; अत्रम् सृजै इति=मुझे अत्रकी सृष्टि करनी चाहिये ॥ १ ॥
व्याख्या —इन सबकी रचना हो जानेपर परमेश्वरने फिर विचार किया—‘ये सब लोक और लोकपाल तो रचे गये—इनकी रचनाका कार्य तो पूरा हो गया। अब इनके निर्वाहके लिये अत्र भी होना चाहिये—भोग्य पदार्थोंकी भी व्यवस्था होनी चाहिये; क्योंकि इनके साथ भूख-प्यास भी लगा दी गयी है। अतः उस अत्रकी भी रचना करूँ ॥ १ ॥
सोऽपोऽभ्यतपत्ताभ्योऽभितसाभ्यो मूर्तिरजायत। या वै सा मूर्तिरजायतात्र वै तत् ॥ २ ॥
सः=उस (परमात्मा) ने; अपः=जलोंको (पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको); अभ्यतपत्=तपाया (संकल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की); ताभ्यः अभितसाभ्यः=उन तपे हुए सूक्ष्म पाँच भूतोंसे; मूर्तिः=मूर्ति; अजायत=उत्पन्न हुई; वै=निश्चय ही; या=जो; सा=वह; मूर्तिः=मूर्ति; अजायत=उत्पन्न हुई; तत् वै=वही; अत्रम्=अत्र है ॥ २ ॥
व्याख्या —उपर्युक्त प्रकारसे विचार करके परमेश्वरने जलको अर्थात् पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको तपाया—अपने संकल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की। परमात्माके संकल्पद्वारा संचालित हुए उन सूक्ष्म महाभूतोंसे मूर्ति प्रकट हुई अर्थात् उनका स्थूल रूप उत्पन्न हुआ। वह जो मूर्ति अर्थात् उन पाँच महाभूतोंका स्थूलरूप उत्पन्न हुआ; वही अत्र—देवताओंके लिये भोग्य है ॥ २ ॥
तदेनत् सृष्टं पराड्यजिघांसत्तद्वाचाजिघृक्षत्तन्नाशक्रोद्वाचा ग्रहीतुम्। यद्वैन्नद्वाचाग्रहैष्यदभिव्याहृत्य हैवात्रमत्रप्यत् ॥ ३ ॥
सृष्टम्=उत्पन्न किया हुआ; तत्=वह; एनत्=यह अत्र; पराड्=(भोक्ता
३१०
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
पुरुषसे) विमुख होकर; अत्यजिघांसत्=भागनेकी चेष्टा करने लगा; तत्=(तब उस पुरुषने) उसको; वाचा=वाणीद्वारा; अजिघृक्षत्=ग्रहण करनेकी इच्छा की; (परंतु वह) तत्=उसको; वाचा=वाणीद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=ग्रहण नहीं कर सका; यत्=यदि; [ सः ]=वह; एनत्=इस अत्रको; वाचा=वाणीद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=ग्रहण कर सकता; (तो अब भी मनुष्य) ह=अवश्य ही; अन्नम् अभिव्याहृत्य=अन्नका वर्णन करके; एव=ही; अन्नप्यत्=तुस हो जाता ॥ ३ ॥
व्याख्या —लोकों और लोकपालोंकी आहारसम्बन्धी आवश्यकताको पूर्ण करनेके लिये उत्पन्न किया हुआ वह अन्न यों समझकर कि यह मुझे खानेवाला तो मेरा विनाशक ही है, उससे छुटकारा पानेके लिये मुख फेरकर भागने लगा। तब उस मनुष्यके रूपमें उत्पन्न हुए जीवात्माने उस अन्नको वाणीद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसे वाणीद्वारा पकड़ नहीं सका। यदि उस पुरुषने वाणीद्वारा अन्नको ग्रहण कर लिया होता तो अब भी मनुष्य अन्नका वाणीद्वारा उच्चारण करके ही तृप्त हो जाते—अन्नका नाम लेनेमात्रसे उनका पेट भर जाता; परंतु ऐसा नहीं होता ॥ ३ ॥
तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुं स यद्भ्रैन्तप्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राणय हैवान्नमन्नप्यत् ॥ ४ ॥
(तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; प्राणेन=प्राण-इन्द्रियके द्वारा;* अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको; प्राणेन=प्राण-इन्द्रियद्वारा भी; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इस अन्नको; प्राणेन=प्राण-इन्द्रियद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ सकता; (तो अब भी
- प्राण-इन्द्रियका विषय गन्ध, वायु और प्राणके सहयोगसे ही उक्त इन्द्रियद्वारा ग्रहण होता है तथा प्राण-इन्द्रियके निवासस्थान नासिकाछिद्रोंसे ही प्राणका आवागमन होता है। इसलिये यहाँ प्राणैन्द्रियके ही स्थानमें 'प्राण' शब्द प्रयुक्त हुआ है, यह जान पड़ता है; क्योंकि अन्तमें प्राणके ही एक भेद अपानद्वारा अन्नका ग्रहण होना बताया गया है। अतः यहाँ प्राणसे ग्रहण न किया जाना माननेसे पूर्वापरविरोध आयेगा।
खण्ड ३ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३११
मनुष्य) ह=अवश्य; अन्नम्=अन्नको; अभिप्राणय=सूँघकर; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ४ ॥
व्याख्या —तब उस पुरुषने अन्नको प्राणके द्वारा अर्थात् प्राण-इन्द्रियके द्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको प्राण-इन्द्रियके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको प्राण-इन्द्रियद्वारा पकड़ सकता तो अब भी लोग अन्नको नाकसे सूँघकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसा नहीं देखा जाता ॥ ४ ॥
तच्चक्षुषाजिघृक्षतन्नाशक्रोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्वैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमन्नपश्यत् ॥ ५ ॥
(तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; चक्षुषा=आँखोंसे; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको; चक्षुषा=आँखोंके द्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्रोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इस अन्नको; चक्षुषा=आँखोंसे; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=अवश्य ही; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नको; दृष्ट्वा=देखकर; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ५ ॥
व्याख्या —फिर उस पुरुषने अन्नको आँखोंसे पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको आँखोंके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको आँखोंसे ग्रहण कर सकता तो अवश्य ही आजकल भी लोग अन्नको केवल देखकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं देखी जाती ॥ ५ ॥
तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षतन्नाशक्रोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्वैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमन्नपश्यत् ॥ ६ ॥
(तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको; श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्रोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इसको; श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=निस्संदेह; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नका नाम; श्रुत्वा=सुनकर; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ६ ॥
व्याख्या —फिर उस पुरुषने अन्नको कानोंद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह
३१२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
उसको कानोंद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको कानोंसे पकड़ सकता तो अवश्य ही अब भी मनुष्य केवल अन्नका नाम सुनकर ही तृप्त हो जाते; परंतु यह देखनेमें नहीं आता ॥ ६ ॥
तत्त्वचाजिघृक्षतन्नाशक्रोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्वैतत्त्वचाग्रहैष्यत्सृष्ट्वा हैवान्नमन्नपश्यत् ॥ ७ ॥
(तब उस पुरुषने) तत्=उसको; त्वचा=चमड़ीद्वारा; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु) तत्=उसको; त्वचा=चमड़ीद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्रोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एतत्=इसको; त्वचा=चमड़ीद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ सकता तो; ह=अवश्य ही; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नको; सृष्ट्वा=छूकर; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ७ ॥
व्याख्या —तब उस पुरुषने अन्नको चमड़ीद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको चमड़ीद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको चमड़ीद्वारा पकड़ पाता तो अवश्य ही आजकल भी मनुष्य अन्नको छूकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं है ॥ ७ ॥
तन्मनसाजिघृक्षतन्नाशक्रोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्वैतन्मनसाग्रहैष्यद्भ्यात्वा हैवान्नमन्नपश्यत् ॥ ८ ॥
(तब उस पुरुषने) तत्=उसको; मनसा=मनसे; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु) तत्=उसको; मनसा=मनसे भी; ग्रहीतुम् न अशक्रोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एतत्=इसको; मनसा=मनसे; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=अवश्य ही; (मनुष्य) अन्नम्=अन्नको; ध्यात्वा=चिन्तन करके; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ८ ॥
व्याख्या —तब उस पुरुषने अन्नको मनसे पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको मनके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको मनसे पकड़ पाता तो अवश्य ही आज भी मनुष्य अन्नका चिन्तन करके ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात देखनेमें नहीं आती ॥ ८ ॥
खण्ड ३ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३१३
तच्छ्रनेनाजिघृक्षतन्नाशकोच्छ्रनेन ग्रहीतुं स यद्वै- नच्छ्रनेनाग्रहैष्यद्विपुज्य हैवात्रमत्रप्यत् ॥ ९ ॥
(फिर उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; शिश्नेन=उपस्थके द्वारा; अजिघृक्षत्=ग्रहण करना चाह; (परंतु) तत्=उसको; शिश्नेन=उपस्थके द्वारा भी; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इसको; शिश्नेन=उपस्थद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ पाता तो; ह=अवश्य ही; (मनुष्य) अन्नम् विपुज्य=अन्नका त्याग करके; एव=ही; अन्नप्यत्=तुस हो जाता ॥ ९ ॥
व्याख्या —फिर उस पुरुषने अन्नको उपस्थ (लिङ्ग) द्वारा पकड़ना चाह; परंतु वह उसको उपस्थके द्वारा नहीं पकड़ सका। यदि वह उसको उपस्थद्वारा पकड़ पाता तो अवश्य ही अब भी मनुष्य अन्नका त्याग करके ही तुस हो जाते; परंतु यह देखनेमें नहीं आता ॥ ९ ॥
तदपानेनाजिघृक्षतदावयत् सौषोऽत्रस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥
(अन्तमें उसने) तत्=उस अन्नको; अपानेन=अपानवायुके द्वारा; अजिघृक्षत्=ग्रहण करना चाह; (इस बार उसने) तत्=उसको; आवयत्=ग्रहण कर लिया; सः=वह; एषः=यह अपानवायु ही; अन्नस्य=अन्नका; ग्रहः=ग्रह अर्थात् ग्रहण करनेवाला है; यत्=जो; वायुः=वायु; अन्नायुः=अन्नसे जीवनकी रक्षा करनेवालेके रूपमें; वै=प्रसिद्ध है; यत्=जो; एषः=यह; वायुः=अपानवायु है (वही वह वायु है) ॥ १० ॥
व्याख्या —अन्तमें उस पुरुषने अन्नको मुखके द्वारसे अपानवायुद्वारा ग्रहण करना चाह, अर्थात् अपानवायुद्वारा मुखसे शरीरमें प्रवेश करानेकी चेष्टा की; तब वह अन्नको अपने शरीरमें ले जा सका। वह अपानवायु जो बाहरसे शरीरके भीतर प्रश्वासके रूपमें जाता है, यही अन्नका ग्रह—उसको पकड़नेवाला अर्थात् भीतर ले जानेवाला है। प्राणवायुके सम्बन्धमें जो यह प्रसिद्धि है कि यही अन्नके द्वारा मनुष्यके जीवनकी रक्षा करनेवाला होनेसे साक्षात् आयु है, वह इस अपानवायुको लेकर ही है, जो प्राण आदि पाँच भेदोंमें विभक्त मुख्य प्राणका ही एक अंश है; इससे यह सिद्ध हुआ कि प्राण ही मनुष्यका जीवन है ॥ १० ॥
३१४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
स ईक्षत कथं न्विदं मद्वृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति। स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्मृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिष्येन विस्मृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥
सः=(तब) उस (सृष्टिके रचयिता परमेश्वर) ने; ईक्षत=सोचा कि; नु=निश्चय ही; इदम्=यह; मत् ऋते=मेरे बिना; कथम्=किस प्रकार; स्यात्=रहेगा; इति=यह सोचकर; (पुनः) सः=उसने; ईक्षत=विचार किया कि; यदि=यदि; वाचा=(इस पुरुषने मेरे बिना ही केवल) वाणीद्वारा; अभिव्याहृतम्=बोलनेकी क्रिया कर ली; यदि=यदि; प्राणेन=घ्राण-इन्द्रियद्वारा; अभिप्राणितम्=सूँघनेकी क्रिया कर ली; यदि=यदि; चक्षुषा=नेत्रद्वारा; दृष्टम्=देख लिया; यदि=यदि; श्रोत्रेण=श्रवणेन्द्रियद्वारा; श्रुतम्=सुन लिया; यदि=यदि; त्वचा=त्वक्-इन्द्रियद्वारा; स्मृष्टम्=स्पर्श कर लिया; यदि=यदि; मनसा=मनद्वारा; ध्यातम्=मनन कर लिया; यदि=यदि; अपानेन=अपानद्वारा; अभ्यपानितम्=अन्नग्रहण आदि अपान-सम्बन्धी क्रिया कर ली; (तथा) यदि=यदि; शिष्येन=उपस्थसे; विस्मृष्टम्=मूत्र और वीर्यका त्याग कर लिया; अथ=तो फिर, अहम्=मैं; कः=कौन हूँ; इति=यह सोचकर; (पुनः) सः=उसने; ईक्षत=विचार किया कि; कतरेण=(पैर और मस्तक—इन दोनोंमेंसे) किस मार्गसे; प्रपद्ये इति=मुझे इसमें प्रवेश करना चाहिये ॥ ११ ॥
व्याख्या —इस प्रकार जब लोक और लोकपालोंकी रचना हो गयी, उन सबके लिये आहार भी उत्पन्न हो गया तथा मनुष्य-शरीरधारी पुरुषने उस आहारको ग्रहण करना भी सीख लिया, तब उस सर्वस्वष्टा परमात्माने फिर विचार किया—‘यह मनुष्यरूप पुरुष मेरे बिना कैसे रहेगा ? यदि इस जीवात्माके साथ मेरा सहयोग नहीं रहेगा तो यह अकेला किस प्रकार टिक सकेगा ?* साथ ही यह भी विचार किया कि ‘यदि मेरे सहयोगके बिना इस पुरुषने वाणीद्वारा
- इसीलिये तो भगवान्ने गीतामें कहा है कि समस्त भूतोंका जो कारण है, वह मैं हूँ। ऐसा कोई भी चराचर प्राणी नहीं है, जो मुझसे रहित हो (१०।३९)।
खण्ड ३ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३१५
बोलनेकी क्रिया कर ली, घ्राण-इन्द्रियसे सृष्टनेका काम कर लिया, प्राणोंसे वायुको भीतर ले जाने और बाहर छोड़नेकी क्रिया कर ली, नेत्रोंद्वारा देख लिया, श्रवणेंद्रियद्वारा सुन लिया, त्वक्-इन्द्रियद्वारा स्पर्श कर लिया, मनके द्वारा मनन कर लिया, अपानद्वारा अन्न निगल लिया और यदि जननेन्द्रियद्वारा मूत्र और वीर्यका त्याग करनेकी क्रिया सम्पन्न कर ली तो फिर मेरा क्या उपयोग रह गया ? भाव यह कि मेरे बिना इन सब इन्द्रियोंद्वारा कार्य सम्पन्न कर लेना इसके लिये असम्भव है !' यह सोचकर परमात्माने विचार किया कि मैं इस मनुष्य-शरीरमें पैर और मस्तक—इन दोनोंसे किस मार्गसे प्रविष्ट होऊँ ॥ ११ ॥
स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विवृतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः ; अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥
(यों विचारकर) सः=उसने; एतम् एव=इस (मनुष्य-शरीरकी); सीमानम्=सीमाको; विदार्य=चौरकर; एतया द्वारा=इसके द्वारा; प्रापद्यत=उस सजीव शरीरमें प्रवेश किया; सा=वह; एषा=यह; द्वाः=द्वार; विवृतिः नाम=विवृति नामसे प्रसिद्ध है; तत्=वही; एतत्=यह; नानन्दनम्=आनन्द देनेवाला अर्थात् ब्रह्म-प्राप्तिका द्वार है; तस्य=उस परमेश्वरके; त्रयः=तीन; आवसथाः=आश्रय (उपलब्धि-स्थान) हैं; त्रयः=तीन; स्वप्नाः=स्वप्न हैं; अयम्=यह (हृदय-गुहा); आवसथः=एक स्थान है; अयम्=यह (परमधाम); आवसथः=दूसरा स्थान है; अयम्=यह (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड); आवसथः इति=तीसरा स्थान है ॥ १२ ॥
व्याख्या —परमात्मा इस मनुष्य-शरीरकी सीमा (मूर्धा) को अर्थात् ब्रह्मरन्ध्रको चौरकर (उसमें छेद करके) इसके द्वारा उस सजीव मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट हो गये। वह यह द्वार विवृति (विदीर्ण किया हुआ द्वार) नामसे प्रसिद्ध है। वही यह विवृति नामका द्वार (ब्रह्मरन्ध्र) आनन्द देनेवाला अर्थात् आनन्दस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है। परमेश्वरकी उपलब्धिके तीन स्थान हैं और स्वप्न भी तीन हैं। एक तो यह हृदयाकाश उनकी उपलब्धिका
३१६
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
स्थान है। दूसरा विशुद्ध आकाशरूप परमधाम है—जिसको सत्यलोक, गोलोक, ब्रह्मलोक, साकेतलोक, कैलास आदि अनेक नामोंसे पुकारा जाता है। तीसरा यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है तथा इस जगत्की जो स्थूल, सूक्ष्म और कारणरूप तीन अवस्थाएँ हैं, वे ही इसके तीन स्वप्न हैं ॥ १२ ॥
स जातो भूतान्यभिर्वैख्यत् किमिहान्यं वावदिषदिति। स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत्। इदमदर्शमिति॥ १३ ॥
जातः सः=मनुष्यरूपमें प्रकट हुए उस पुरुषने; भूतानि=पञ्च महाभूतोंकी अर्थात् भौतिक जगत्की रचनाको; अभिवैख्यत्=चारों ओरसे देखा; (और) इह=यहाँ; अन्यम्=दूसरा; किम्=कौन है; इति=यह; वावदिषत्=कहा; सः=(तब) उसने; एतम्=इस; पुरुषम्=अन्तर्धामी परम पुरुषको; एव=ही; ततमम्=सर्वव्यापी; ब्रह्म=परब्रह्मके रूपमें; अपश्यत्=देखा; (और यह प्रकट किया) [ अहो ] इती ३=अहो! बड़े सौभाग्यकी बात है कि; इदम्=इस परब्रह्म परमात्माको; अदर्शम्=मैंने देख लिया ॥ १३ ॥
व्याख्या—मनुष्यरूपमें उत्पन्न हुए उस पुरुषने इस भौतिक जगत्की विचित्र रचनाको बड़े आश्चर्यपूर्वक चारों ओरसे देखा और मन-ही-मन इस प्रकार कहा—‘इस विचित्र जगत्की रचना करनेवाला यहाँ दूसरा कौन है? क्योंकि यह मेरी की हुई रचना तो है नहीं और कार्य होनेके कारण इसका कोई-न-कोई कर्ता अवश्य होना चाहिये।’ इस प्रकार विचार करनेपर उस साधकने अपने हृदयमें अन्तर्धामीरूपसे विराजमान पुरुषको ही इस सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त परब्रह्मके रूपमें प्रत्यक्ष किया। तब वह आनन्दमें भरकर मन-ही-मन कहने लगा—‘अहो! बड़े ही सौभाग्यकी बात है कि मैंने परब्रह्म परमात्माको देख लिया—साक्षात् कर लिया।’
इससे यह भाव प्रकट किया गया है कि इस जगत्की विचित्र रचनाको देखकर इसके कर्ता-धर्ता परमात्माकी सत्तामें विश्वास करके यदि मनुष्य उन्हें जानने और पानेको उत्सुक हो, उन्हींपर निर्भर होकर चेष्टा करे तो अवश्य ही उन्हें जान सकता है। परमात्माको जानने और पानेका काम इस मनुष्य-शरीरमें