ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 307, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३०५
देवता संसाररूपी इस महान् समुद्रमें आ पड़े। अर्थात् हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरसे उत्पन्न होनेके बाद उनको कोई निर्दिष्ट स्थान नहीं मिला जिससे वे उस समष्टि-शरीरमें ही रहे। तब परमात्माने उस देवताओंके समुदायको भूख और पिपासासे संयुक्त कर दिया। अतः भूख और प्याससे पीड़ित होकर वे अग्नि आदि सब देवता अपनी सृष्टि करनेवाले परमात्मासे बोले—‘भगवन्! हमारे लिये एक ऐसे स्थानकी व्यवस्था कीजिये, जिसमें रहकर हमलोग अन्न भक्षण कर सकें—अपना-अपना आहार ग्रहण कर सकें’ ॥ १ ॥
ताभ्यो गामानयत्ता अबुवन्न वै नोऽयमलमिति ताभ्योऽश्वमानयत्ता अबुवन्न वै नोऽयमलमिति ॥ २ ॥
(परमात्मा) ताभ्यः =उन देवताओंके लिये; गाम् =गौका शरीर; आनयत् =लाये (उसे देखकर); ताः =उन्होंने; अबुवन् =कहा; नः =हमारे लिये; अयम् =यह; अलम् =पर्याप्त; न वै =नहीं है; इति =इस प्रकार उनके कहनेपर (परमात्मा); ताभ्यः =उनके लिये; अश्वम् =घोड़ेका शरीर; आनयत् =लाये; (उसे देखकर भी); ताः =उन्होंने (फिर वैसे ही); अबुवन् =कहा कि; अयम् =यह भी; नः =हमारे लिये; अलम् =पर्याप्त; न वै =इति=नहीं है ॥ २ ॥
व्याख्या —इस प्रकार उनके प्रार्थना करनेपर सृष्टिकर्ता परमेश्वरने उन सबके रहनेके लिये एक गौका शरीर बनाकर उनको दिखाया। उसे देखकर उन्होंने कहा—‘भगवन्! यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है, अर्थात् इस शरीरसे हमारा कार्य अच्छी तरह नहीं चलनेका। इससे श्रेष्ठ किसी दूसरे शरीरकी रचना कीजिये।’ तब परमात्माने उनके लिये घोड़ेका शरीर रचकर उनको दिखाया। उसे देखकर वे फिर बोले—‘भगवन्! यह भी हमारे लिये यथेष्ट नहीं है, इससे भी हमारा कार्य नहीं चल सकता। आप कोई तीसरा ही शरीर बनाकर हमें दीजिये’ ॥ २ ॥
ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अबुवन् सुकृतं बतेति। पुरुषो वाव सुकृतम्। ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति ॥ ३ ॥