ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 306, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
फिर नाभि प्रकट हुई, नाभिसे अपानवायु और अपानवायुसे गुदा-इन्द्रियका अधिष्ठाता मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ। नाभिकी उत्पत्तिके साथ ही गुदा-छिद्र और गुदा-इन्द्रियकी उत्पत्ति भी समझ लेनी चाहिये। यहाँ अपानवायु मलत्यागमें हेतु होनेके कारण और उसका स्थान नाभि होनेके कारण मुख्यतासे उसीका नाम लिया गया है। परंतु मृत्यु अपानका अधिष्ठाता नहीं है, वह गुदा-इन्द्रियका अधिष्ठाता है; अतः उपलक्षणसे गुदा-इन्द्रियका वर्णन भी इसके अन्तर्गत मान लेना उचित प्रतीत होता है। फिर लिङ्ग प्रकट हुआ, उसमेंसे वीर्य और उससे जल उत्पन्न हुआ। यहाँ लिङ्गकी उत्पत्तिसे उपस्थेन्द्रिय और उसका देवता प्रजापति उत्पन्न हुआ—यह बात भी समझ लेनी चाहिये ॥४॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन् महत्पर्युवे प्रापतंस्तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एनमबुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १ ॥
ताः=वे; एताः सृष्टाः=परमात्माद्वारा रचे हुए ये सब; देवताः=अग्नि आदि देवता; अस्मिन्=इस (संसाररूप); महति अर्णवे=महान् समुद्रमें; प्रापतन्=आ पड़े; (तब परमात्माने) तम्=उस (समस्त देवताओंके समुदाय) को; अशनायापिपासाभ्याम्=भूख और प्याससे; अन्ववार्जत्=युक्त कर दिया; (तब) ताः=वे सब अग्नि आदि देवता; एनम् अबुवन्=इस परमात्मासे बोले (भगवन्!); नः=हमारे लिये; आयतनम् प्रजानीहि=एक ऐसे स्थानकी व्यवस्था कीजिये; यस्मिन्=जिसमें; प्रतिष्ठिताः=स्थित रहकर; (हमलोग) अन्नम्=अन्न; अदाम इति=भक्षण करें ॥ १ ॥
व्याख्या—परमात्माद्वारा रचे गये वे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता अग्नि आदि सब