ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 305, कुल 548 में से
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ऐतरेयोपनिषद्
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(फिर); कर्णौ=दोनों कानोंके छिद्र; निरभिद्येताम्=प्रकट हुए; कर्णाभ्याम्=कानोंसे; श्रोत्रम्=श्रोत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई (और); श्रोत्रात्=श्रोत्र-इन्द्रियसे; दिशः=दिशाएँ प्रकट हुई (फिर); त्वक्=त्वचा; निरभिद्यत=प्रकट हुई; त्वचः=त्वचासे; लोमानि=रोम उत्पन्न हुए (और); लोमभ्यः=रोमोंसे; ओषधिवनस्पतयः=ओषधि और वनस्पतियाँ प्रकट हुई (फिर); हृदयम्=हृदय; निरभिद्यत=प्रकट हुआ; हृदयात्=हृदयसे; मनः=मनका आविर्भाव हुआ (और); मनसः=मनसे; चन्द्रमाः=चन्द्रमा उत्पन्न हुआ (फिर); नाभिः=नाभि; निरभिद्यत=प्रकट हुई; नाभ्या=नाभिसे; अपानः=अपानवायु प्रकट हुआ (और); अपानात्=अपानवायुसे; मृत्युः=मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ (फिर); शिश्नम्=लिङ्ग; निरभिद्यत=प्रकट हुआ; शिशनात्=लिङ्गसे; रेतः=वीर्य (और); रेतसः=वीर्यसे; आपः=जल उत्पन्न हुआ ॥ ४ ॥
व्याख्या —इस प्रकार हिरण्यगर्भ पुरुषको उत्पन्न करके उसके अङ्ग-उपाङ्गोंके व्यक्त करनेके उद्देश्यसे जब परमात्माने संकल्परूप तप किया, तब उस तपके फलस्वरूप हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरमें सर्वप्रथम अण्डेकी भाँति फूटकर मुख-छिद्र निकला। मुखसे वाक्-इन्द्रिय उत्पन्न हुई और वाक्-इन्द्रियसे उसका अधिष्ठात्-देवता अग्नि उत्पन्न हुआ। फिर नासिकाके दोनों छिद्र हुए, उनमेंसे प्राणवायु प्रकट हुआ और प्राणोंसे वायुदेवता उत्पन्न हुआ। यहाँ प्राणेन्द्रियका अलग वर्णन नहीं है; अतः प्राण-इन्द्रिय और उसके देवता अश्विनीकुमार भी नासिकासे ही उत्पन्न हुए—यों समझ लेना चाहिये। इसी प्रकार रसना-इन्द्रिय और उसके देवताका भी अलग वर्णन नहीं है; अतः मुखसे वाक्-इन्द्रियके साथ-साथ रसना-इन्द्रिय और उसके देवताकी भी उत्पत्ति हुई—यह समझ लेना चाहिये। फिर आँखोंके दोनों छिद्र प्रकट हुए, उनमेंसे नेत्र-इन्द्रिय और नेत्र-इन्द्रियसे उसका देवता सूर्य उत्पन्न हुआ। फिर कानोंके दोनों छिद्र निकले, उनमेंसे श्रोत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई और श्रोत्र-इन्द्रियसे उसके देवता दिशाएँ उत्पन्न हुई। उसके बाद त्वचा (चर्म) प्रकट हुई, त्वचासे रोम उत्पन्न हुए, रोमोंसे ओषधियाँ और वनस्पतियाँ उत्पन्न हुई। फिर हृदय प्रकट हुआ, हृदयसे मन और मनसे उसका अधिष्ठाता चन्द्रमा उत्पन्न हुआ।