ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 304, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
रक्षा करनेवाले लोकपालोंकी रचना भी मुझे अवश्य करनी चाहिये; अन्यथा बिना रक्षकके ये सब लोक सुरक्षित नहीं रह सकेंगे। यह सोचकर उन्होंने जलमेंसे अर्थात् जल आदि सूक्ष्म महाभूतोंमेंसे हिरण्यमय पुरुषको निकालकर उसको समस्त अङ्ग-उपाङ्गोंसे युक्त करके मूर्तिमान् बनाया। यहाँ ‘पुरुष’ शब्दसे सृष्टिकालमें सबसे पहले प्रकट किये जानेवाले ब्रह्माका वर्णन किया गया है; क्योंकि ब्रह्मासे ही सब लोकपालोंकी और प्रजाको बढ़ानेवाले प्रजापतियोंकी उत्पत्ति हुई है—इस विषयका विस्तृत वर्णन शास्त्रोंमें पाया जाता है और ब्रह्माकी उत्पत्ति जलके भीतरसे कमलनालसे हुई, ऐसा भी वर्णन आता है। अतः यहाँ ‘पुरुष’ शब्दका अर्थ ब्रह्मा मान लेना उचित जान पड़ता है॥ ३ ॥
तमभ्यतपत्तस्याभिमतस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखद्वाम् वाचोऽग्निर्नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष आदित्यः कर्णैं निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्रादिशस्त्वद् निरभिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा नाभिरनिरभिद्यत नाभ्या अपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिशनाद्रेतो रेतस आपः ॥ ४ ॥
(परमात्माने) तम्=उस (हिरण्यगर्भरूप पुरुष) को लक्ष्य करके; अभ्यतपत्=संकल्परूप तप किया; अभिमतस्य=उस तपसे तपे हुए; तस्य=हिरण्यगर्भके शरीरसे; यथाण्डम्=(पहले) अण्डेकी तरह (फूटकर); मुखम्=मुख-छिद्र; निरभिद्यत=प्रकट हुआ; मुखात्=मुखसे; वाक्=वाक्-इन्द्रिय (और); वाचः=वाक्-इन्द्रियसे; अग्निः=अग्निदेवता प्रकट हुआ (फिर); नासिके=नासिकाके दोनों छिद्र; निरभिद्येताम्=प्रकट हुए; नासिकाभ्याम्=नासिका-छिद्रोंमेंसे; प्राणः=प्राण उत्पन्न हुआ (और); प्राणात्=प्राणसे; वायुः=वायुदेवता उत्पन्न हुआ (फिर); अक्षिणी=दोनों आँखोंके छिद्र; निरभिद्येताम्=प्रकट हुए; अक्षिभ्याम्=आँखोंके छिद्रोंमेंसे; चक्षुः=नेत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई (और); चक्षुषः=नेत्र-इन्द्रियसे; आदित्यः=सूर्य प्रकट हुआ