ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 303, कुल 548 में से
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ऐतरेयोपनिषद्
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स्वर्गलोकसे ऊपरके लोक; प्रतिष्ठा=(तथा) उनका आधारभूत; द्यौः=द्युलोक भी; अदः=वे सब; अभ्भः='अभ्भ'के नामसे कहे गये हैं; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्ष लोक (भुवर्लोक) ही; मरीचयः=मरीचि है (तथा); पृथिवी=यह पृथ्वी ही; मरः=मर—मृत्युलोकके नामसे कही गयी है (और); याः=जो; अधस्तात्=(पृथ्वीके) नीचे—भीतरी भागमें (स्थूल पातालादि लोक) हैं; ताः=वे; आपः=जलके नामसे कहे गये हैं ॥ २ ॥
व्याख्या —यह विचार करके परब्रह्म परमेश्वरने अभ्भ, मरीचि, मर और जल—इन लोकोंकी रचना की। इन शब्दोंको स्पष्ट करनेके लिये आगे श्रुतिमें ही कहा गया है कि स्वर्गलोकसे ऊपर जो महः, जनः, तपः और सत्यलोक हैं, वे और उनका आधार द्युलोक—इन पाँचों लोकोंको यहाँ 'अभ्भः' नामसे कहा गया है। उसके नीचे जो अन्तरिक्षलोक (भुवर्लोक) है, जिसमें सूर्य, चन्द्र और तारागण—ये सब किरणोंवाले लोकविशेष हैं, उसका वर्णन यहाँ मरीचि नामसे किया गया है। उसके नीचे जो यह पृथ्वीलोक है— जिसको मृत्युलोक भी कहते हैं, वह यहाँ 'मर' के नामसे कहा गया है और उसके नीचे अर्थात् पृथ्वीके भीतर जो पातालादि लोक हैं, वे 'आपः' के नामसे कहे गये हैं। तात्पर्य यह कि जगत्में जितने भी लोक त्रिलोकी, चतुर्दश भुवन एवं सप्त लोकोंके नामसे प्रसिद्ध हैं, उन सब लोकोंकी परमात्माने रचना की ॥ २ ॥
स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्व्यथ एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत् ॥ ३ ॥
सः =उसने; ईक्षत =फिर विचार किया; इमे =ये; नु =तो हुए; लोकाः =लोक; (अब) लोकपालान् नु सृजै =लोकपालोंकी भी रचना मुझे अवश्य करनी चाहिये; इति =यह विचार करके; सः =उसने; अद्व्यथः =जलसे; एव =ही; पुरुषम् =हिरण्यगर्भरूप पुरुषको; समुद्धृत्य =निकालकर; अमूर्छयत् =उसे मूर्तिमान् बनाया ॥ ३ ॥
व्याख्या —इस प्रकार इन समस्त लोकोंकी रचना करनेके अनन्तर परमेश्वरने फिर विचार किया कि 'ये सब लोक तो रचे गये। अब इन लोकोंकी