भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

प्रथम अध्याय

प्रथम खण्ड

ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत्किञ्चन मिषत्। स ईक्षत लोकात्र सृजा इति ॥ १ ॥

ॐ=ॐ इस परमात्माके नामका उच्चारण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं; इदम्=यह जगत्; अग्रे=(प्रकट होनेसे) पहले; एकः=एकमात्र; आत्मा=परमात्मा; वै=ही; आसीत्=था; अन्यत्=(उसके सिवा) दूसरा; किञ्चन एव=कोई भी; मिषत्=चेष्टा करनेवाला; न=नहीं था; सः=उस (परम पुरुष परमात्मा) ने; नु=(मैं) निश्चय ही; लोकान् सृजै=लोकोंकी रचना करूँ; इति=इस प्रकार; ईक्षत=विचार किया ॥ १ ॥

व्याख्या—इस मन्त्रमें परमात्माके सृष्टि-रचनाविषयक प्रथम संकल्पका वर्णन है। भाव यह है कि देखने-सुनने और समझनेमें आनेवाले जड़-चेतनमय प्रत्यक्ष जगत्के इस रूपमें प्रकट होनेसे पहले कारण-अवस्थामें एकमात्र परमात्मा ही थे। उस समय इसमें भिन्न-भिन्न नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति नहीं थी। उस समय उन परब्रह्म परमात्माके सिवा दूसरा कोई भी चेष्टा करनेवाला नहीं था। सृष्टिके आदिमें उन परम पुरुष परमात्माने यह विचार किया कि 'मैं प्राणियोंके कर्म-फल-भोगार्थ भिन्न-भिन्न लोकोंकी रचना करूँ' ॥ १ ॥

स इमाल्लोकानसृजत। अभ्यो मरीचीर्ममापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः ॥ २ ॥

सः=उसने; अभ्यः=अम्भ (द्युलोक तथा उसके ऊपरके लोक); मरीचीः=मरीचि (अन्तरिक्ष); मरम्=मर (मर्त्यलोक) (और); आपः=जल (पृथिवीके नीचेके लोक); इमान्=इन सब; लोकान् असृजत=लोकोंकी रचना की; दिवम् परेण=द्युलोक—