भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

ताभ्यः=(तब परमात्मा) उनके लिये; पुरुषम्=मनुष्यका शरीर; आनयत्=लाये; (उसे देखकर) ताः=वै (अग्नि आदि सब देवता); अब्रुवन्=बोले; बत=बस; सुकृतम् इति=यह बहुत सुन्दर बन गया; वाव=सचमुच ही; पुरुषः=मनुष्य-शरीर; सुकृतम्=(परमात्माकी) सुन्दर रचना है; ताः अब्रवीत्=(फिर) उन सब देवताओंसे (परमात्माने) कहा; (तुमलोग) यथायतनम्=अपने-अपने योग्य आश्रयोंमें; प्रविशत इति=प्रविष्ट हो जाओ ॥ ३ ॥

व्याख्या—इस प्रकार जब उन्होंने गाय और घोड़ेके शरीरोंको अपने लिये यथेष्ट नहीं समझा, तब परमात्माने उनके लिये पुरुषकी अर्थात् मनुष्य-शरीरकी रचना की और वह उनको दिखाया। उसे देखते ही सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और बोले—‘यह हमारे लिये बहुत सुन्दर निवास-स्थान बन गया। इसमें हम आरामसे रह सकेंगे और हमारी सब आवश्यकताएँ भलीभाँति पूर्ण हो सकेंगी।’ सचमुच मनुष्य-शरीर परमात्माकी सुन्दर और श्रेष्ठ रचना है; इसीलिये यह देवदुर्लभ माना गया है और शास्त्रोंमें जगह-जगह इसकी महिमा गायी गयी है; क्योंकि इसी शरीरमें जीव परमात्माके आज्ञानुसार यथायोग्य साधन करके उन्हें प्राप्त कर सकता है। जब सब देवताओंने उस शरीरको पसंद किया, तब उनसे परमेश्वरने कहा—‘तुमलोग अपने-अपने योग्य स्थान देखकर इस शरीरमें प्रवेश कर जाओ’ ॥ ३ ॥

अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्राविशद्विशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिशनं प्राविशन् ॥ ४ ॥

(तब) अग्निः=अग्निदेवता; वाक्=वाक्-इन्द्रिय; भूत्वा=बनकर; मुखम् प्राविशत्=मुखमें प्रविष्ट हो गया; वायुः=वायुदेवता; प्राणः=प्राण; भूत्वा=बनकर; नासिके प्राविशत्=नासिकाके छिद्रोंमें प्रविष्ट हो गया; आदित्यः=सूर्यदेवता;