ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 309, कुल 548 में से
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ऐतरेयोपनिषद्
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चक्षुः=नेत्र-इन्द्रिय; भूत्वा=बनकर; अक्षिणी प्राविशत्=औँखोंके गोलकोंमें प्रविष्ट हो गया; दिशः=दिशाओंके अभिमानी देवता; श्रोत्रम्=श्रोत्र-इन्द्रिय; भूत्वा=बनकर; कर्णी प्राविशन्=कानोंमें प्रविष्ट हो गये; ओषधिवनस्पतयः=ओषधि और वनस्पतियोंके अभिमानी देवता; लोमानि=रोएँ; भूत्वा=बनकर; त्वचम् प्राविशन्=त्वचामें प्रविष्ट हो गये; चन्द्रमाः=चन्द्रमा; मनः=मन; भूत्वा=बनकर; हृदयम् प्राविशत्=हृदयमें प्रविष्ट हो गया; मृत्युः=मृत्युदेवता; अपानः=अपानवायु; भूत्वा=बनकर; नाभिम प्राविशत्=नाभिमें प्रविष्ट हो गया; आपः=जलका अभिमानी देवता; रेतः=वीर्य; भूत्वा=बनकर; शिरश्चम् प्राविशन्=लिङ्गमें प्रविष्ट हो गया ॥४॥
व्याख्या—सृष्टिकर्ता परमेश्वरकी आज्ञा पाकर अग्निदेवताने वाक्-इन्द्रियका रूप धारण किया और पुरुषके (मनुष्य-शरीरके) मुखमें प्रविष्ट होकर जिह्वाको अपना आश्रय बना लिया। यहाँ वरुणदेवता भी रसना-इन्द्रिय बनकर मुखमें प्रविष्ट हो गये, यह बात अधिक समझ लेनी चाहिये। फिर वायुदेवता प्राण होकर नासिकाके छिद्रोंमें (उसी मार्गसे समस्त शरीरमें) प्रविष्ट हो गये। अश्विनीकुमार भी प्राण-इन्द्रियका रूप धारण करके नासिकामें प्रविष्ट हो गये—यह बात भी यहाँ उपलक्षणसे समझी जा सकती है; क्योंकि उसका पृथक् वर्णन नहीं है। उसके बाद सूर्यदेवता नेत्र-इन्द्रिय बनकर औँखोंमें प्रविष्ट हो गये। दिशाभिमानी देवता श्रोत्रेन्द्रिय बनकर दोनों कानोंमें प्रविष्ट हो गये। ओषधि और वनस्पतियोंके अभिमानी देवता रोम बनकर चमड़ेमें प्रविष्ट हो गये तथा चन्द्रमा मनका रूप धारण करके हृदयमें प्रविष्ट हो गये। मृत्युदेवता अपान (और पायु-इन्द्रिय) का रूप धारण करके नाभिमें प्रविष्ट हो गये। जलके अधिष्ठातृ-देवता वीर्य बनकर लिङ्गमें प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार सब-के-सब देवता इन्द्रियोंके रूपमें अपने-अपने उपयुक्त स्थानोंमें प्रविष्ट होकर स्थित हो गये ॥४॥
तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति। ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति। तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥ ५ ॥