ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 310, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
तम्=उस परमात्मासे; अशनायापिपासे=भूख और प्यास—ये दोनों; अब्रूताम्=बोलीं; आवाभ्याम्=हमारे लिये भी; अभिप्रजानीहि=(स्थानकी) व्यवस्था कीजिये; इति=यह (सुनकर); ते=उनसे; अब्रवीत्=(परमात्माने) कहा; वाम्=तुम दोनोंको (में); एतासु देवतासु=इन सब देवताओंमें; एव=ही; आभजामि=भाग दिये देता हूँ; एतासु=इन (देवताओं) में ही (तुम्हें); भागिन्यौ=भागीदार; करोमि इति=बनाता हूँ; तस्मात्=इसलिये; यस्यै कस्यै च=जिस किसी भी; देवतायै=देवताके लिये; हविः=हवि (भिन्न-भिन्न विषय); गृह्णते=(इन्द्रियोंद्वारा) ग्रहण की जाती है; अस्याम्=उस देवता (के भोजन) में; अशनायापिपासे=भूख और प्यास—दोनों; एव=ही; भागिन्यौ=भागीदार; भवतः=होती हैं ॥ ५ ॥
व्याख्या—तब भूख और प्यास—ये दोनों परमेश्वरसे कहने लगीं—‘भगवन्! इन सबके लिये तो आपने रहनेके स्थान निश्चित कर दिये, अब हमारे लिये भी किसी स्थान-विशेषकी व्यवस्था करके उसमें हमें स्थापित कीजिये।’ उनके यों कहनेपर उनसे सुष्टिके रचयिता परमेश्वरने कहा—तुम दोनोंके लिये पृथक् स्थानकी आवश्यकता नहीं है। तुम दोनोंको मैं इन देवताओंके स्थानोंमें भाग दिये देता हूँ। इन देवताओंके आहारमें मैं तुम दोनोंको भागीदार बना देता हूँ। सुष्टिके आदिमें ही परमेश्वरने ऐसा नियम बना दिया था; इसीलिये जब जिस किसी भी देवताको देनेके लिये इन्द्रियोंद्वारा विषय-भोग ग्रहण किये जाते हैं, उस देवताके भागमें ये शुधा और पिपासा भी हिस्सेदार होती ही हैं अर्थात् उस इन्द्रियके अभिमानी देवताकी तृप्तिके साथ शुधा-पिपासाको भी शान्ति मिलती है ॥ ५ ॥
॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥
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