ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 311, कुल 548 में से
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ऐतरेयोपनिषद्
३०९
तृतीय खण्ड
स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चात्रमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥
सः=उस (परमात्मा) ने; ईक्षत=फिर विचार किया; नु=निश्चय ही; इमे=ये सब; लोकाः=लोक; च=और; लोकपालाः=लोकपाल; च=भी; (रचे गये, अब) एभ्यः=इनके लिये; अत्रम् सृजै इति=मुझे अत्रकी सृष्टि करनी चाहिये ॥ १ ॥
व्याख्या —इन सबकी रचना हो जानेपर परमेश्वरने फिर विचार किया—‘ये सब लोक और लोकपाल तो रचे गये—इनकी रचनाका कार्य तो पूरा हो गया। अब इनके निर्वाहके लिये अत्र भी होना चाहिये—भोग्य पदार्थोंकी भी व्यवस्था होनी चाहिये; क्योंकि इनके साथ भूख-प्यास भी लगा दी गयी है। अतः उस अत्रकी भी रचना करूँ ॥ १ ॥
सोऽपोऽभ्यतपत्ताभ्योऽभितसाभ्यो मूर्तिरजायत। या वै सा मूर्तिरजायतात्र वै तत् ॥ २ ॥
सः=उस (परमात्मा) ने; अपः=जलोंको (पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको); अभ्यतपत्=तपाया (संकल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की); ताभ्यः अभितसाभ्यः=उन तपे हुए सूक्ष्म पाँच भूतोंसे; मूर्तिः=मूर्ति; अजायत=उत्पन्न हुई; वै=निश्चय ही; या=जो; सा=वह; मूर्तिः=मूर्ति; अजायत=उत्पन्न हुई; तत् वै=वही; अत्रम्=अत्र है ॥ २ ॥
व्याख्या —उपर्युक्त प्रकारसे विचार करके परमेश्वरने जलको अर्थात् पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको तपाया—अपने संकल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की। परमात्माके संकल्पद्वारा संचालित हुए उन सूक्ष्म महाभूतोंसे मूर्ति प्रकट हुई अर्थात् उनका स्थूल रूप उत्पन्न हुआ। वह जो मूर्ति अर्थात् उन पाँच महाभूतोंका स्थूलरूप उत्पन्न हुआ; वही अत्र—देवताओंके लिये भोग्य है ॥ २ ॥
तदेनत् सृष्टं पराड्यजिघांसत्तद्वाचाजिघृक्षत्तन्नाशक्रोद्वाचा ग्रहीतुम्। यद्वैन्नद्वाचाग्रहैष्यदभिव्याहृत्य हैवात्रमत्रप्यत् ॥ ३ ॥
सृष्टम्=उत्पन्न किया हुआ; तत्=वह; एनत्=यह अत्र; पराड्=(भोक्ता