भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

पुरुषसे) विमुख होकर; अत्यजिघांसत्=भागनेकी चेष्टा करने लगा; तत्=(तब उस पुरुषने) उसको; वाचा=वाणीद्वारा; अजिघृक्षत्=ग्रहण करनेकी इच्छा की; (परंतु वह) तत्=उसको; वाचा=वाणीद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=ग्रहण नहीं कर सका; यत्=यदि; [ सः ]=वह; एनत्=इस अत्रको; वाचा=वाणीद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=ग्रहण कर सकता; (तो अब भी मनुष्य) ह=अवश्य ही; अन्नम् अभिव्याहृत्य=अन्नका वर्णन करके; एव=ही; अन्नप्यत्=तुस हो जाता ॥ ३ ॥

व्याख्या —लोकों और लोकपालोंकी आहारसम्बन्धी आवश्यकताको पूर्ण करनेके लिये उत्पन्न किया हुआ वह अन्न यों समझकर कि यह मुझे खानेवाला तो मेरा विनाशक ही है, उससे छुटकारा पानेके लिये मुख फेरकर भागने लगा। तब उस मनुष्यके रूपमें उत्पन्न हुए जीवात्माने उस अन्नको वाणीद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसे वाणीद्वारा पकड़ नहीं सका। यदि उस पुरुषने वाणीद्वारा अन्नको ग्रहण कर लिया होता तो अब भी मनुष्य अन्नका वाणीद्वारा उच्चारण करके ही तृप्त हो जाते—अन्नका नाम लेनेमात्रसे उनका पेट भर जाता; परंतु ऐसा नहीं होता ॥ ३ ॥

तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुं स यद्भ्रैन्तप्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राणय हैवान्नमन्नप्यत् ॥ ४ ॥

(तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; प्राणेन=प्राण-इन्द्रियके द्वारा;* अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको; प्राणेन=प्राण-इन्द्रियद्वारा भी; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इस अन्नको; प्राणेन=प्राण-इन्द्रियद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ सकता; (तो अब भी

  • प्राण-इन्द्रियका विषय गन्ध, वायु और प्राणके सहयोगसे ही उक्त इन्द्रियद्वारा ग्रहण होता है तथा प्राण-इन्द्रियके निवासस्थान नासिकाछिद्रोंसे ही प्राणका आवागमन होता है। इसलिये यहाँ प्राणैन्द्रियके ही स्थानमें 'प्राण' शब्द प्रयुक्त हुआ है, यह जान पड़ता है; क्योंकि अन्तमें प्राणके ही एक भेद अपानद्वारा अन्नका ग्रहण होना बताया गया है। अतः यहाँ प्राणसे ग्रहण न किया जाना माननेसे पूर्वापरविरोध आयेगा।