ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 313, कुल 548 में से
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ऐतरेयोपनिषद्
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मनुष्य) ह=अवश्य; अन्नम्=अन्नको; अभिप्राणय=सूँघकर; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ४ ॥
व्याख्या —तब उस पुरुषने अन्नको प्राणके द्वारा अर्थात् प्राण-इन्द्रियके द्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको प्राण-इन्द्रियके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको प्राण-इन्द्रियद्वारा पकड़ सकता तो अब भी लोग अन्नको नाकसे सूँघकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसा नहीं देखा जाता ॥ ४ ॥
तच्चक्षुषाजिघृक्षतन्नाशक्रोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्वैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमन्नपश्यत् ॥ ५ ॥
(तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; चक्षुषा=आँखोंसे; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको; चक्षुषा=आँखोंके द्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्रोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इस अन्नको; चक्षुषा=आँखोंसे; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=अवश्य ही; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नको; दृष्ट्वा=देखकर; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ५ ॥
व्याख्या —फिर उस पुरुषने अन्नको आँखोंसे पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको आँखोंके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको आँखोंसे ग्रहण कर सकता तो अवश्य ही आजकल भी लोग अन्नको केवल देखकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं देखी जाती ॥ ५ ॥
तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षतन्नाशक्रोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्वैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमन्नपश्यत् ॥ ६ ॥
(तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको; श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्रोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इसको; श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=निस्संदेह; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नका नाम; श्रुत्वा=सुनकर; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ६ ॥
व्याख्या —फिर उस पुरुषने अन्नको कानोंद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह