ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 314, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें३१२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
उसको कानोंद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको कानोंसे पकड़ सकता तो अवश्य ही अब भी मनुष्य केवल अन्नका नाम सुनकर ही तृप्त हो जाते; परंतु यह देखनेमें नहीं आता ॥ ६ ॥
तत्त्वचाजिघृक्षतन्नाशक्रोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्वैतत्त्वचाग्रहैष्यत्सृष्ट्वा हैवान्नमन्नपश्यत् ॥ ७ ॥
(तब उस पुरुषने) तत्=उसको; त्वचा=चमड़ीद्वारा; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु) तत्=उसको; त्वचा=चमड़ीद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्रोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एतत्=इसको; त्वचा=चमड़ीद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ सकता तो; ह=अवश्य ही; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नको; सृष्ट्वा=छूकर; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ७ ॥
व्याख्या —तब उस पुरुषने अन्नको चमड़ीद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको चमड़ीद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको चमड़ीद्वारा पकड़ पाता तो अवश्य ही आजकल भी मनुष्य अन्नको छूकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं है ॥ ७ ॥
तन्मनसाजिघृक्षतन्नाशक्रोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्वैतन्मनसाग्रहैष्यद्भ्यात्वा हैवान्नमन्नपश्यत् ॥ ८ ॥
(तब उस पुरुषने) तत्=उसको; मनसा=मनसे; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु) तत्=उसको; मनसा=मनसे भी; ग्रहीतुम् न अशक्रोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एतत्=इसको; मनसा=मनसे; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=अवश्य ही; (मनुष्य) अन्नम्=अन्नको; ध्यात्वा=चिन्तन करके; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ८ ॥
व्याख्या —तब उस पुरुषने अन्नको मनसे पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको मनके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको मनसे पकड़ पाता तो अवश्य ही आज भी मनुष्य अन्नका चिन्तन करके ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात देखनेमें नहीं आती ॥ ८ ॥