ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 315, कुल 548 में से
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ऐतरेयोपनिषद्
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तच्छ्रनेनाजिघृक्षतन्नाशकोच्छ्रनेन ग्रहीतुं स यद्वै- नच्छ्रनेनाग्रहैष्यद्विपुज्य हैवात्रमत्रप्यत् ॥ ९ ॥
(फिर उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; शिश्नेन=उपस्थके द्वारा; अजिघृक्षत्=ग्रहण करना चाह; (परंतु) तत्=उसको; शिश्नेन=उपस्थके द्वारा भी; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इसको; शिश्नेन=उपस्थद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ पाता तो; ह=अवश्य ही; (मनुष्य) अन्नम् विपुज्य=अन्नका त्याग करके; एव=ही; अन्नप्यत्=तुस हो जाता ॥ ९ ॥
व्याख्या —फिर उस पुरुषने अन्नको उपस्थ (लिङ्ग) द्वारा पकड़ना चाह; परंतु वह उसको उपस्थके द्वारा नहीं पकड़ सका। यदि वह उसको उपस्थद्वारा पकड़ पाता तो अवश्य ही अब भी मनुष्य अन्नका त्याग करके ही तुस हो जाते; परंतु यह देखनेमें नहीं आता ॥ ९ ॥
तदपानेनाजिघृक्षतदावयत् सौषोऽत्रस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥
(अन्तमें उसने) तत्=उस अन्नको; अपानेन=अपानवायुके द्वारा; अजिघृक्षत्=ग्रहण करना चाह; (इस बार उसने) तत्=उसको; आवयत्=ग्रहण कर लिया; सः=वह; एषः=यह अपानवायु ही; अन्नस्य=अन्नका; ग्रहः=ग्रह अर्थात् ग्रहण करनेवाला है; यत्=जो; वायुः=वायु; अन्नायुः=अन्नसे जीवनकी रक्षा करनेवालेके रूपमें; वै=प्रसिद्ध है; यत्=जो; एषः=यह; वायुः=अपानवायु है (वही वह वायु है) ॥ १० ॥
व्याख्या —अन्तमें उस पुरुषने अन्नको मुखके द्वारसे अपानवायुद्वारा ग्रहण करना चाह, अर्थात् अपानवायुद्वारा मुखसे शरीरमें प्रवेश करानेकी चेष्टा की; तब वह अन्नको अपने शरीरमें ले जा सका। वह अपानवायु जो बाहरसे शरीरके भीतर प्रश्वासके रूपमें जाता है, यही अन्नका ग्रह—उसको पकड़नेवाला अर्थात् भीतर ले जानेवाला है। प्राणवायुके सम्बन्धमें जो यह प्रसिद्धि है कि यही अन्नके द्वारा मनुष्यके जीवनकी रक्षा करनेवाला होनेसे साक्षात् आयु है, वह इस अपानवायुको लेकर ही है, जो प्राण आदि पाँच भेदोंमें विभक्त मुख्य प्राणका ही एक अंश है; इससे यह सिद्ध हुआ कि प्राण ही मनुष्यका जीवन है ॥ १० ॥