ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 316, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
स ईक्षत कथं न्विदं मद्वृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति। स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्मृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिष्येन विस्मृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥
सः=(तब) उस (सृष्टिके रचयिता परमेश्वर) ने; ईक्षत=सोचा कि; नु=निश्चय ही; इदम्=यह; मत् ऋते=मेरे बिना; कथम्=किस प्रकार; स्यात्=रहेगा; इति=यह सोचकर; (पुनः) सः=उसने; ईक्षत=विचार किया कि; यदि=यदि; वाचा=(इस पुरुषने मेरे बिना ही केवल) वाणीद्वारा; अभिव्याहृतम्=बोलनेकी क्रिया कर ली; यदि=यदि; प्राणेन=घ्राण-इन्द्रियद्वारा; अभिप्राणितम्=सूँघनेकी क्रिया कर ली; यदि=यदि; चक्षुषा=नेत्रद्वारा; दृष्टम्=देख लिया; यदि=यदि; श्रोत्रेण=श्रवणेन्द्रियद्वारा; श्रुतम्=सुन लिया; यदि=यदि; त्वचा=त्वक्-इन्द्रियद्वारा; स्मृष्टम्=स्पर्श कर लिया; यदि=यदि; मनसा=मनद्वारा; ध्यातम्=मनन कर लिया; यदि=यदि; अपानेन=अपानद्वारा; अभ्यपानितम्=अन्नग्रहण आदि अपान-सम्बन्धी क्रिया कर ली; (तथा) यदि=यदि; शिष्येन=उपस्थसे; विस्मृष्टम्=मूत्र और वीर्यका त्याग कर लिया; अथ=तो फिर, अहम्=मैं; कः=कौन हूँ; इति=यह सोचकर; (पुनः) सः=उसने; ईक्षत=विचार किया कि; कतरेण=(पैर और मस्तक—इन दोनोंमेंसे) किस मार्गसे; प्रपद्ये इति=मुझे इसमें प्रवेश करना चाहिये ॥ ११ ॥
व्याख्या —इस प्रकार जब लोक और लोकपालोंकी रचना हो गयी, उन सबके लिये आहार भी उत्पन्न हो गया तथा मनुष्य-शरीरधारी पुरुषने उस आहारको ग्रहण करना भी सीख लिया, तब उस सर्वस्वष्टा परमात्माने फिर विचार किया—‘यह मनुष्यरूप पुरुष मेरे बिना कैसे रहेगा ? यदि इस जीवात्माके साथ मेरा सहयोग नहीं रहेगा तो यह अकेला किस प्रकार टिक सकेगा ?* साथ ही यह भी विचार किया कि ‘यदि मेरे सहयोगके बिना इस पुरुषने वाणीद्वारा
- इसीलिये तो भगवान्ने गीतामें कहा है कि समस्त भूतोंका जो कारण है, वह मैं हूँ। ऐसा कोई भी चराचर प्राणी नहीं है, जो मुझसे रहित हो (१०।३९)।