ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 317, कुल 548 में से
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ऐतरेयोपनिषद्
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बोलनेकी क्रिया कर ली, घ्राण-इन्द्रियसे सृष्टनेका काम कर लिया, प्राणोंसे वायुको भीतर ले जाने और बाहर छोड़नेकी क्रिया कर ली, नेत्रोंद्वारा देख लिया, श्रवणेंद्रियद्वारा सुन लिया, त्वक्-इन्द्रियद्वारा स्पर्श कर लिया, मनके द्वारा मनन कर लिया, अपानद्वारा अन्न निगल लिया और यदि जननेन्द्रियद्वारा मूत्र और वीर्यका त्याग करनेकी क्रिया सम्पन्न कर ली तो फिर मेरा क्या उपयोग रह गया ? भाव यह कि मेरे बिना इन सब इन्द्रियोंद्वारा कार्य सम्पन्न कर लेना इसके लिये असम्भव है !' यह सोचकर परमात्माने विचार किया कि मैं इस मनुष्य-शरीरमें पैर और मस्तक—इन दोनोंसे किस मार्गसे प्रविष्ट होऊँ ॥ ११ ॥
स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विवृतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः ; अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥
(यों विचारकर) सः=उसने; एतम् एव=इस (मनुष्य-शरीरकी); सीमानम्=सीमाको; विदार्य=चौरकर; एतया द्वारा=इसके द्वारा; प्रापद्यत=उस सजीव शरीरमें प्रवेश किया; सा=वह; एषा=यह; द्वाः=द्वार; विवृतिः नाम=विवृति नामसे प्रसिद्ध है; तत्=वही; एतत्=यह; नानन्दनम्=आनन्द देनेवाला अर्थात् ब्रह्म-प्राप्तिका द्वार है; तस्य=उस परमेश्वरके; त्रयः=तीन; आवसथाः=आश्रय (उपलब्धि-स्थान) हैं; त्रयः=तीन; स्वप्नाः=स्वप्न हैं; अयम्=यह (हृदय-गुहा); आवसथः=एक स्थान है; अयम्=यह (परमधाम); आवसथः=दूसरा स्थान है; अयम्=यह (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड); आवसथः इति=तीसरा स्थान है ॥ १२ ॥
व्याख्या —परमात्मा इस मनुष्य-शरीरकी सीमा (मूर्धा) को अर्थात् ब्रह्मरन्ध्रको चौरकर (उसमें छेद करके) इसके द्वारा उस सजीव मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट हो गये। वह यह द्वार विवृति (विदीर्ण किया हुआ द्वार) नामसे प्रसिद्ध है। वही यह विवृति नामका द्वार (ब्रह्मरन्ध्र) आनन्द देनेवाला अर्थात् आनन्दस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है। परमेश्वरकी उपलब्धिके तीन स्थान हैं और स्वप्न भी तीन हैं। एक तो यह हृदयाकाश उनकी उपलब्धिका