भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

स्थान है। दूसरा विशुद्ध आकाशरूप परमधाम है—जिसको सत्यलोक, गोलोक, ब्रह्मलोक, साकेतलोक, कैलास आदि अनेक नामोंसे पुकारा जाता है। तीसरा यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है तथा इस जगत्की जो स्थूल, सूक्ष्म और कारणरूप तीन अवस्थाएँ हैं, वे ही इसके तीन स्वप्न हैं ॥ १२ ॥

स जातो भूतान्यभिर्वैख्यत् किमिहान्यं वावदिषदिति। स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत्। इदमदर्शमिति॥ १३ ॥

जातः सः=मनुष्यरूपमें प्रकट हुए उस पुरुषने; भूतानि=पञ्च महाभूतोंकी अर्थात् भौतिक जगत्की रचनाको; अभिवैख्यत्=चारों ओरसे देखा; (और) इह=यहाँ; अन्यम्=दूसरा; किम्=कौन है; इति=यह; वावदिषत्=कहा; सः=(तब) उसने; एतम्=इस; पुरुषम्=अन्तर्धामी परम पुरुषको; एव=ही; ततमम्=सर्वव्यापी; ब्रह्म=परब्रह्मके रूपमें; अपश्यत्=देखा; (और यह प्रकट किया) [ अहो ] इती ३=अहो! बड़े सौभाग्यकी बात है कि; इदम्=इस परब्रह्म परमात्माको; अदर्शम्=मैंने देख लिया ॥ १३ ॥

व्याख्या—मनुष्यरूपमें उत्पन्न हुए उस पुरुषने इस भौतिक जगत्की विचित्र रचनाको बड़े आश्चर्यपूर्वक चारों ओरसे देखा और मन-ही-मन इस प्रकार कहा—‘इस विचित्र जगत्की रचना करनेवाला यहाँ दूसरा कौन है? क्योंकि यह मेरी की हुई रचना तो है नहीं और कार्य होनेके कारण इसका कोई-न-कोई कर्ता अवश्य होना चाहिये।’ इस प्रकार विचार करनेपर उस साधकने अपने हृदयमें अन्तर्धामीरूपसे विराजमान पुरुषको ही इस सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त परब्रह्मके रूपमें प्रत्यक्ष किया। तब वह आनन्दमें भरकर मन-ही-मन कहने लगा—‘अहो! बड़े ही सौभाग्यकी बात है कि मैंने परब्रह्म परमात्माको देख लिया—साक्षात् कर लिया।’

इससे यह भाव प्रकट किया गया है कि इस जगत्की विचित्र रचनाको देखकर इसके कर्ता-धर्ता परमात्माकी सत्तामें विश्वास करके यदि मनुष्य उन्हें जानने और पानेको उत्सुक हो, उन्हींपर निर्भर होकर चेष्टा करे तो अवश्य ही उन्हें जान सकता है। परमात्माको जानने और पानेका काम इस मनुष्य-शरीरमें