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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

३०६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

ताभ्यः=(तब परमात्मा) उनके लिये; पुरुषम्=मनुष्यका शरीर; आनयत्=लाये; (उसे देखकर) ताः=वै (अग्नि आदि सब देवता); अब्रुवन्=बोले; बत=बस; सुकृतम् इति=यह बहुत सुन्दर बन गया; वाव=सचमुच ही; पुरुषः=मनुष्य-शरीर; सुकृतम्=(परमात्माकी) सुन्दर रचना है; ताः अब्रवीत्=(फिर) उन सब देवताओंसे (परमात्माने) कहा; (तुमलोग) यथायतनम्=अपने-अपने योग्य आश्रयोंमें; प्रविशत इति=प्रविष्ट हो जाओ ॥ ३ ॥

व्याख्या—इस प्रकार जब उन्होंने गाय और घोड़ेके शरीरोंको अपने लिये यथेष्ट नहीं समझा, तब परमात्माने उनके लिये पुरुषकी अर्थात् मनुष्य-शरीरकी रचना की और वह उनको दिखाया। उसे देखते ही सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और बोले—‘यह हमारे लिये बहुत सुन्दर निवास-स्थान बन गया। इसमें हम आरामसे रह सकेंगे और हमारी सब आवश्यकताएँ भलीभाँति पूर्ण हो सकेंगी।’ सचमुच मनुष्य-शरीर परमात्माकी सुन्दर और श्रेष्ठ रचना है; इसीलिये यह देवदुर्लभ माना गया है और शास्त्रोंमें जगह-जगह इसकी महिमा गायी गयी है; क्योंकि इसी शरीरमें जीव परमात्माके आज्ञानुसार यथायोग्य साधन करके उन्हें प्राप्त कर सकता है। जब सब देवताओंने उस शरीरको पसंद किया, तब उनसे परमेश्वरने कहा—‘तुमलोग अपने-अपने योग्य स्थान देखकर इस शरीरमें प्रवेश कर जाओ’ ॥ ३ ॥

अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्राविशद्विशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिशनं प्राविशन् ॥ ४ ॥

(तब) अग्निः=अग्निदेवता; वाक्=वाक्-इन्द्रिय; भूत्वा=बनकर; मुखम् प्राविशत्=मुखमें प्रविष्ट हो गया; वायुः=वायुदेवता; प्राणः=प्राण; भूत्वा=बनकर; नासिके प्राविशत्=नासिकाके छिद्रोंमें प्रविष्ट हो गया; आदित्यः=सूर्यदेवता;

खण्ड २ ]

ऐतरेयोपनिषद्

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चक्षुः=नेत्र-इन्द्रिय; भूत्वा=बनकर; अक्षिणी प्राविशत्=औँखोंके गोलकोंमें प्रविष्ट हो गया; दिशः=दिशाओंके अभिमानी देवता; श्रोत्रम्=श्रोत्र-इन्द्रिय; भूत्वा=बनकर; कर्णी प्राविशन्=कानोंमें प्रविष्ट हो गये; ओषधिवनस्पतयः=ओषधि और वनस्पतियोंके अभिमानी देवता; लोमानि=रोएँ; भूत्वा=बनकर; त्वचम् प्राविशन्=त्वचामें प्रविष्ट हो गये; चन्द्रमाः=चन्द्रमा; मनः=मन; भूत्वा=बनकर; हृदयम् प्राविशत्=हृदयमें प्रविष्ट हो गया; मृत्युः=मृत्युदेवता; अपानः=अपानवायु; भूत्वा=बनकर; नाभिम प्राविशत्=नाभिमें प्रविष्ट हो गया; आपः=जलका अभिमानी देवता; रेतः=वीर्य; भूत्वा=बनकर; शिरश्चम् प्राविशन्=लिङ्गमें प्रविष्ट हो गया ॥४॥

व्याख्या—सृष्टिकर्ता परमेश्वरकी आज्ञा पाकर अग्निदेवताने वाक्-इन्द्रियका रूप धारण किया और पुरुषके (मनुष्य-शरीरके) मुखमें प्रविष्ट होकर जिह्वाको अपना आश्रय बना लिया। यहाँ वरुणदेवता भी रसना-इन्द्रिय बनकर मुखमें प्रविष्ट हो गये, यह बात अधिक समझ लेनी चाहिये। फिर वायुदेवता प्राण होकर नासिकाके छिद्रोंमें (उसी मार्गसे समस्त शरीरमें) प्रविष्ट हो गये। अश्विनीकुमार भी प्राण-इन्द्रियका रूप धारण करके नासिकामें प्रविष्ट हो गये—यह बात भी यहाँ उपलक्षणसे समझी जा सकती है; क्योंकि उसका पृथक् वर्णन नहीं है। उसके बाद सूर्यदेवता नेत्र-इन्द्रिय बनकर औँखोंमें प्रविष्ट हो गये। दिशाभिमानी देवता श्रोत्रेन्द्रिय बनकर दोनों कानोंमें प्रविष्ट हो गये। ओषधि और वनस्पतियोंके अभिमानी देवता रोम बनकर चमड़ेमें प्रविष्ट हो गये तथा चन्द्रमा मनका रूप धारण करके हृदयमें प्रविष्ट हो गये। मृत्युदेवता अपान (और पायु-इन्द्रिय) का रूप धारण करके नाभिमें प्रविष्ट हो गये। जलके अधिष्ठातृ-देवता वीर्य बनकर लिङ्गमें प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार सब-के-सब देवता इन्द्रियोंके रूपमें अपने-अपने उपयुक्त स्थानोंमें प्रविष्ट होकर स्थित हो गये ॥४॥

तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति। ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति। तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥ ५ ॥

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

तम्=उस परमात्मासे; अशनायापिपासे=भूख और प्यास—ये दोनों; अब्रूताम्=बोलीं; आवाभ्याम्=हमारे लिये भी; अभिप्रजानीहि=(स्थानकी) व्यवस्था कीजिये; इति=यह (सुनकर); ते=उनसे; अब्रवीत्=(परमात्माने) कहा; वाम्=तुम दोनोंको (में); एतासु देवतासु=इन सब देवताओंमें; एव=ही; आभजामि=भाग दिये देता हूँ; एतासु=इन (देवताओं) में ही (तुम्हें); भागिन्यौ=भागीदार; करोमि इति=बनाता हूँ; तस्मात्=इसलिये; यस्यै कस्यै च=जिस किसी भी; देवतायै=देवताके लिये; हविः=हवि (भिन्न-भिन्न विषय); गृह्णते=(इन्द्रियोंद्वारा) ग्रहण की जाती है; अस्याम्=उस देवता (के भोजन) में; अशनायापिपासे=भूख और प्यास—दोनों; एव=ही; भागिन्यौ=भागीदार; भवतः=होती हैं ॥ ५ ॥

व्याख्या—तब भूख और प्यास—ये दोनों परमेश्वरसे कहने लगीं—‘भगवन्! इन सबके लिये तो आपने रहनेके स्थान निश्चित कर दिये, अब हमारे लिये भी किसी स्थान-विशेषकी व्यवस्था करके उसमें हमें स्थापित कीजिये।’ उनके यों कहनेपर उनसे सुष्टिके रचयिता परमेश्वरने कहा—तुम दोनोंके लिये पृथक् स्थानकी आवश्यकता नहीं है। तुम दोनोंको मैं इन देवताओंके स्थानोंमें भाग दिये देता हूँ। इन देवताओंके आहारमें मैं तुम दोनोंको भागीदार बना देता हूँ। सुष्टिके आदिमें ही परमेश्वरने ऐसा नियम बना दिया था; इसीलिये जब जिस किसी भी देवताको देनेके लिये इन्द्रियोंद्वारा विषय-भोग ग्रहण किये जाते हैं, उस देवताके भागमें ये शुधा और पिपासा भी हिस्सेदार होती ही हैं अर्थात् उस इन्द्रियके अभिमानी देवताकी तृप्तिके साथ शुधा-पिपासाको भी शान्ति मिलती है ॥ ५ ॥

॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥

—◆◆◆—

खण्ड ३ ]

ऐतरेयोपनिषद्

३०९

तृतीय खण्ड

स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चात्रमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥

सः=उस (परमात्मा) ने; ईक्षत=फिर विचार किया; नु=निश्चय ही; इमे=ये सब; लोकाः=लोक; च=और; लोकपालाः=लोकपाल; च=भी; (रचे गये, अब) एभ्यः=इनके लिये; अत्रम् सृजै इति=मुझे अत्रकी सृष्टि करनी चाहिये ॥ १ ॥

व्याख्या —इन सबकी रचना हो जानेपर परमेश्वरने फिर विचार किया—‘ये सब लोक और लोकपाल तो रचे गये—इनकी रचनाका कार्य तो पूरा हो गया। अब इनके निर्वाहके लिये अत्र भी होना चाहिये—भोग्य पदार्थोंकी भी व्यवस्था होनी चाहिये; क्योंकि इनके साथ भूख-प्यास भी लगा दी गयी है। अतः उस अत्रकी भी रचना करूँ ॥ १ ॥

सोऽपोऽभ्यतपत्ताभ्योऽभितसाभ्यो मूर्तिरजायत। या वै सा मूर्तिरजायतात्र वै तत् ॥ २ ॥

सः=उस (परमात्मा) ने; अपः=जलोंको (पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको); अभ्यतपत्=तपाया (संकल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की); ताभ्यः अभितसाभ्यः=उन तपे हुए सूक्ष्म पाँच भूतोंसे; मूर्तिः=मूर्ति; अजायत=उत्पन्न हुई; वै=निश्चय ही; या=जो; सा=वह; मूर्तिः=मूर्ति; अजायत=उत्पन्न हुई; तत् वै=वही; अत्रम्=अत्र है ॥ २ ॥

व्याख्या —उपर्युक्त प्रकारसे विचार करके परमेश्वरने जलको अर्थात् पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको तपाया—अपने संकल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की। परमात्माके संकल्पद्वारा संचालित हुए उन सूक्ष्म महाभूतोंसे मूर्ति प्रकट हुई अर्थात् उनका स्थूल रूप उत्पन्न हुआ। वह जो मूर्ति अर्थात् उन पाँच महाभूतोंका स्थूलरूप उत्पन्न हुआ; वही अत्र—देवताओंके लिये भोग्य है ॥ २ ॥

तदेनत् सृष्टं पराड्यजिघांसत्तद्वाचाजिघृक्षत्तन्नाशक्रोद्वाचा ग्रहीतुम्। यद्वैन्नद्वाचाग्रहैष्यदभिव्याहृत्य हैवात्रमत्रप्यत् ॥ ३ ॥

सृष्टम्=उत्पन्न किया हुआ; तत्=वह; एनत्=यह अत्र; पराड्=(भोक्ता

३१०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

पुरुषसे) विमुख होकर; अत्यजिघांसत्=भागनेकी चेष्टा करने लगा; तत्=(तब उस पुरुषने) उसको; वाचा=वाणीद्वारा; अजिघृक्षत्=ग्रहण करनेकी इच्छा की; (परंतु वह) तत्=उसको; वाचा=वाणीद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=ग्रहण नहीं कर सका; यत्=यदि; [ सः ]=वह; एनत्=इस अत्रको; वाचा=वाणीद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=ग्रहण कर सकता; (तो अब भी मनुष्य) ह=अवश्य ही; अन्नम् अभिव्याहृत्य=अन्नका वर्णन करके; एव=ही; अन्नप्यत्=तुस हो जाता ॥ ३ ॥

व्याख्या —लोकों और लोकपालोंकी आहारसम्बन्धी आवश्यकताको पूर्ण करनेके लिये उत्पन्न किया हुआ वह अन्न यों समझकर कि यह मुझे खानेवाला तो मेरा विनाशक ही है, उससे छुटकारा पानेके लिये मुख फेरकर भागने लगा। तब उस मनुष्यके रूपमें उत्पन्न हुए जीवात्माने उस अन्नको वाणीद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसे वाणीद्वारा पकड़ नहीं सका। यदि उस पुरुषने वाणीद्वारा अन्नको ग्रहण कर लिया होता तो अब भी मनुष्य अन्नका वाणीद्वारा उच्चारण करके ही तृप्त हो जाते—अन्नका नाम लेनेमात्रसे उनका पेट भर जाता; परंतु ऐसा नहीं होता ॥ ३ ॥

तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुं स यद्भ्रैन्तप्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राणय हैवान्नमन्नप्यत् ॥ ४ ॥

(तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; प्राणेन=प्राण-इन्द्रियके द्वारा;* अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको; प्राणेन=प्राण-इन्द्रियद्वारा भी; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इस अन्नको; प्राणेन=प्राण-इन्द्रियद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ सकता; (तो अब भी

  • प्राण-इन्द्रियका विषय गन्ध, वायु और प्राणके सहयोगसे ही उक्त इन्द्रियद्वारा ग्रहण होता है तथा प्राण-इन्द्रियके निवासस्थान नासिकाछिद्रोंसे ही प्राणका आवागमन होता है। इसलिये यहाँ प्राणैन्द्रियके ही स्थानमें 'प्राण' शब्द प्रयुक्त हुआ है, यह जान पड़ता है; क्योंकि अन्तमें प्राणके ही एक भेद अपानद्वारा अन्नका ग्रहण होना बताया गया है। अतः यहाँ प्राणसे ग्रहण न किया जाना माननेसे पूर्वापरविरोध आयेगा।

खण्ड ३ ]

ऐतरेयोपनिषद्

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मनुष्य) ह=अवश्य; अन्नम्=अन्नको; अभिप्राणय=सूँघकर; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ४ ॥

व्याख्या —तब उस पुरुषने अन्नको प्राणके द्वारा अर्थात् प्राण-इन्द्रियके द्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको प्राण-इन्द्रियके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको प्राण-इन्द्रियद्वारा पकड़ सकता तो अब भी लोग अन्नको नाकसे सूँघकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसा नहीं देखा जाता ॥ ४ ॥

तच्चक्षुषाजिघृक्षतन्नाशक्रोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्वैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमन्नपश्यत् ॥ ५ ॥

(तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; चक्षुषा=आँखोंसे; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको; चक्षुषा=आँखोंके द्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्रोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इस अन्नको; चक्षुषा=आँखोंसे; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=अवश्य ही; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नको; दृष्ट्वा=देखकर; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ५ ॥

व्याख्या —फिर उस पुरुषने अन्नको आँखोंसे पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको आँखोंके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको आँखोंसे ग्रहण कर सकता तो अवश्य ही आजकल भी लोग अन्नको केवल देखकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं देखी जाती ॥ ५ ॥

तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षतन्नाशक्रोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्वैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमन्नपश्यत् ॥ ६ ॥

(तब उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु वह) तत्=उसको; श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्रोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इसको; श्रोत्रेण=कानोंद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=निस्संदेह; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नका नाम; श्रुत्वा=सुनकर; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ६ ॥

व्याख्या —फिर उस पुरुषने अन्नको कानोंद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह

३१२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

उसको कानोंद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको कानोंसे पकड़ सकता तो अवश्य ही अब भी मनुष्य केवल अन्नका नाम सुनकर ही तृप्त हो जाते; परंतु यह देखनेमें नहीं आता ॥ ६ ॥

तत्त्वचाजिघृक्षतन्नाशक्रोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्वैतत्त्वचाग्रहैष्यत्सृष्ट्वा हैवान्नमन्नपश्यत् ॥ ७ ॥

(तब उस पुरुषने) तत्=उसको; त्वचा=चमड़ीद्वारा; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु) तत्=उसको; त्वचा=चमड़ीद्वारा; ग्रहीतुम् न अशक्रोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एतत्=इसको; त्वचा=चमड़ीद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ सकता तो; ह=अवश्य ही; (अब भी मनुष्य) अन्नम्=अन्नको; सृष्ट्वा=छूकर; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ७ ॥

व्याख्या —तब उस पुरुषने अन्नको चमड़ीद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको चमड़ीद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको चमड़ीद्वारा पकड़ पाता तो अवश्य ही आजकल भी मनुष्य अन्नको छूकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं है ॥ ७ ॥

तन्मनसाजिघृक्षतन्नाशक्रोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्वैतन्मनसाग्रहैष्यद्भ्यात्वा हैवान्नमन्नपश्यत् ॥ ८ ॥

(तब उस पुरुषने) तत्=उसको; मनसा=मनसे; अजिघृक्षत्=पकड़ना चाहा; (परंतु) तत्=उसको; मनसा=मनसे भी; ग्रहीतुम् न अशक्रोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एतत्=इसको; मनसा=मनसे; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ लेता तो; ह=अवश्य ही; (मनुष्य) अन्नम्=अन्नको; ध्यात्वा=चिन्तन करके; एव=ही; अन्नपश्यत्=तृप्त हो जाता ॥ ८ ॥

व्याख्या —तब उस पुरुषने अन्नको मनसे पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको मनके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको मनसे पकड़ पाता तो अवश्य ही आज भी मनुष्य अन्नका चिन्तन करके ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात देखनेमें नहीं आती ॥ ८ ॥

खण्ड ३ ]

ऐतरेयोपनिषद्

३१३

तच्छ्रनेनाजिघृक्षतन्नाशकोच्छ्रनेन ग्रहीतुं स यद्वै- नच्छ्रनेनाग्रहैष्यद्विपुज्य हैवात्रमत्रप्यत् ॥ ९ ॥

(फिर उस पुरुषने) तत्=उस अन्नको; शिश्नेन=उपस्थके द्वारा; अजिघृक्षत्=ग्रहण करना चाह; (परंतु) तत्=उसको; शिश्नेन=उपस्थके द्वारा भी; ग्रहीतुम् न अशक्नोत्=नहीं पकड़ सका; यत्=यदि; सः=वह; एनत्=इसको; शिश्नेन=उपस्थद्वारा; ह=ही; अग्रहैष्यत्=पकड़ पाता तो; ह=अवश्य ही; (मनुष्य) अन्नम् विपुज्य=अन्नका त्याग करके; एव=ही; अन्नप्यत्=तुस हो जाता ॥ ९ ॥

व्याख्या —फिर उस पुरुषने अन्नको उपस्थ (लिङ्ग) द्वारा पकड़ना चाह; परंतु वह उसको उपस्थके द्वारा नहीं पकड़ सका। यदि वह उसको उपस्थद्वारा पकड़ पाता तो अवश्य ही अब भी मनुष्य अन्नका त्याग करके ही तुस हो जाते; परंतु यह देखनेमें नहीं आता ॥ ९ ॥

तदपानेनाजिघृक्षतदावयत् सौषोऽत्रस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥

(अन्तमें उसने) तत्=उस अन्नको; अपानेन=अपानवायुके द्वारा; अजिघृक्षत्=ग्रहण करना चाह; (इस बार उसने) तत्=उसको; आवयत्=ग्रहण कर लिया; सः=वह; एषः=यह अपानवायु ही; अन्नस्य=अन्नका; ग्रहः=ग्रह अर्थात् ग्रहण करनेवाला है; यत्=जो; वायुः=वायु; अन्नायुः=अन्नसे जीवनकी रक्षा करनेवालेके रूपमें; वै=प्रसिद्ध है; यत्=जो; एषः=यह; वायुः=अपानवायु है (वही वह वायु है) ॥ १० ॥

व्याख्या —अन्तमें उस पुरुषने अन्नको मुखके द्वारसे अपानवायुद्वारा ग्रहण करना चाह, अर्थात् अपानवायुद्वारा मुखसे शरीरमें प्रवेश करानेकी चेष्टा की; तब वह अन्नको अपने शरीरमें ले जा सका। वह अपानवायु जो बाहरसे शरीरके भीतर प्रश्वासके रूपमें जाता है, यही अन्नका ग्रह—उसको पकड़नेवाला अर्थात् भीतर ले जानेवाला है। प्राणवायुके सम्बन्धमें जो यह प्रसिद्धि है कि यही अन्नके द्वारा मनुष्यके जीवनकी रक्षा करनेवाला होनेसे साक्षात् आयु है, वह इस अपानवायुको लेकर ही है, जो प्राण आदि पाँच भेदोंमें विभक्त मुख्य प्राणका ही एक अंश है; इससे यह सिद्ध हुआ कि प्राण ही मनुष्यका जीवन है ॥ १० ॥

३१४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

स ईक्षत कथं न्विदं मद्वृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति। स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्मृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिष्येन विस्मृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥

सः=(तब) उस (सृष्टिके रचयिता परमेश्वर) ने; ईक्षत=सोचा कि; नु=निश्चय ही; इदम्=यह; मत् ऋते=मेरे बिना; कथम्=किस प्रकार; स्यात्=रहेगा; इति=यह सोचकर; (पुनः) सः=उसने; ईक्षत=विचार किया कि; यदि=यदि; वाचा=(इस पुरुषने मेरे बिना ही केवल) वाणीद्वारा; अभिव्याहृतम्=बोलनेकी क्रिया कर ली; यदि=यदि; प्राणेन=घ्राण-इन्द्रियद्वारा; अभिप्राणितम्=सूँघनेकी क्रिया कर ली; यदि=यदि; चक्षुषा=नेत्रद्वारा; दृष्टम्=देख लिया; यदि=यदि; श्रोत्रेण=श्रवणेन्द्रियद्वारा; श्रुतम्=सुन लिया; यदि=यदि; त्वचा=त्वक्-इन्द्रियद्वारा; स्मृष्टम्=स्पर्श कर लिया; यदि=यदि; मनसा=मनद्वारा; ध्यातम्=मनन कर लिया; यदि=यदि; अपानेन=अपानद्वारा; अभ्यपानितम्=अन्नग्रहण आदि अपान-सम्बन्धी क्रिया कर ली; (तथा) यदि=यदि; शिष्येन=उपस्थसे; विस्मृष्टम्=मूत्र और वीर्यका त्याग कर लिया; अथ=तो फिर, अहम्=मैं; कः=कौन हूँ; इति=यह सोचकर; (पुनः) सः=उसने; ईक्षत=विचार किया कि; कतरेण=(पैर और मस्तक—इन दोनोंमेंसे) किस मार्गसे; प्रपद्ये इति=मुझे इसमें प्रवेश करना चाहिये ॥ ११ ॥

व्याख्या —इस प्रकार जब लोक और लोकपालोंकी रचना हो गयी, उन सबके लिये आहार भी उत्पन्न हो गया तथा मनुष्य-शरीरधारी पुरुषने उस आहारको ग्रहण करना भी सीख लिया, तब उस सर्वस्वष्टा परमात्माने फिर विचार किया—‘यह मनुष्यरूप पुरुष मेरे बिना कैसे रहेगा ? यदि इस जीवात्माके साथ मेरा सहयोग नहीं रहेगा तो यह अकेला किस प्रकार टिक सकेगा ?* साथ ही यह भी विचार किया कि ‘यदि मेरे सहयोगके बिना इस पुरुषने वाणीद्वारा

  • इसीलिये तो भगवान्ने गीतामें कहा है कि समस्त भूतोंका जो कारण है, वह मैं हूँ। ऐसा कोई भी चराचर प्राणी नहीं है, जो मुझसे रहित हो (१०।३९)।

खण्ड ३ ]

ऐतरेयोपनिषद्

३१५

बोलनेकी क्रिया कर ली, घ्राण-इन्द्रियसे सृष्टनेका काम कर लिया, प्राणोंसे वायुको भीतर ले जाने और बाहर छोड़नेकी क्रिया कर ली, नेत्रोंद्वारा देख लिया, श्रवणेंद्रियद्वारा सुन लिया, त्वक्-इन्द्रियद्वारा स्पर्श कर लिया, मनके द्वारा मनन कर लिया, अपानद्वारा अन्न निगल लिया और यदि जननेन्द्रियद्वारा मूत्र और वीर्यका त्याग करनेकी क्रिया सम्पन्न कर ली तो फिर मेरा क्या उपयोग रह गया ? भाव यह कि मेरे बिना इन सब इन्द्रियोंद्वारा कार्य सम्पन्न कर लेना इसके लिये असम्भव है !' यह सोचकर परमात्माने विचार किया कि मैं इस मनुष्य-शरीरमें पैर और मस्तक—इन दोनोंसे किस मार्गसे प्रविष्ट होऊँ ॥ ११ ॥

स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विवृतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः ; अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥

(यों विचारकर) सः=उसने; एतम् एव=इस (मनुष्य-शरीरकी); सीमानम्=सीमाको; विदार्य=चौरकर; एतया द्वारा=इसके द्वारा; प्रापद्यत=उस सजीव शरीरमें प्रवेश किया; सा=वह; एषा=यह; द्वाः=द्वार; विवृतिः नाम=विवृति नामसे प्रसिद्ध है; तत्=वही; एतत्=यह; नानन्दनम्=आनन्द देनेवाला अर्थात् ब्रह्म-प्राप्तिका द्वार है; तस्य=उस परमेश्वरके; त्रयः=तीन; आवसथाः=आश्रय (उपलब्धि-स्थान) हैं; त्रयः=तीन; स्वप्नाः=स्वप्न हैं; अयम्=यह (हृदय-गुहा); आवसथः=एक स्थान है; अयम्=यह (परमधाम); आवसथः=दूसरा स्थान है; अयम्=यह (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड); आवसथः इति=तीसरा स्थान है ॥ १२ ॥

व्याख्या —परमात्मा इस मनुष्य-शरीरकी सीमा (मूर्धा) को अर्थात् ब्रह्मरन्ध्रको चौरकर (उसमें छेद करके) इसके द्वारा उस सजीव मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट हो गये। वह यह द्वार विवृति (विदीर्ण किया हुआ द्वार) नामसे प्रसिद्ध है। वही यह विवृति नामका द्वार (ब्रह्मरन्ध्र) आनन्द देनेवाला अर्थात् आनन्दस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है। परमेश्वरकी उपलब्धिके तीन स्थान हैं और स्वप्न भी तीन हैं। एक तो यह हृदयाकाश उनकी उपलब्धिका

३१६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

स्थान है। दूसरा विशुद्ध आकाशरूप परमधाम है—जिसको सत्यलोक, गोलोक, ब्रह्मलोक, साकेतलोक, कैलास आदि अनेक नामोंसे पुकारा जाता है। तीसरा यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है तथा इस जगत्की जो स्थूल, सूक्ष्म और कारणरूप तीन अवस्थाएँ हैं, वे ही इसके तीन स्वप्न हैं ॥ १२ ॥

स जातो भूतान्यभिर्वैख्यत् किमिहान्यं वावदिषदिति। स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत्। इदमदर्शमिति॥ १३ ॥

जातः सः=मनुष्यरूपमें प्रकट हुए उस पुरुषने; भूतानि=पञ्च महाभूतोंकी अर्थात् भौतिक जगत्की रचनाको; अभिवैख्यत्=चारों ओरसे देखा; (और) इह=यहाँ; अन्यम्=दूसरा; किम्=कौन है; इति=यह; वावदिषत्=कहा; सः=(तब) उसने; एतम्=इस; पुरुषम्=अन्तर्धामी परम पुरुषको; एव=ही; ततमम्=सर्वव्यापी; ब्रह्म=परब्रह्मके रूपमें; अपश्यत्=देखा; (और यह प्रकट किया) [ अहो ] इती ३=अहो! बड़े सौभाग्यकी बात है कि; इदम्=इस परब्रह्म परमात्माको; अदर्शम्=मैंने देख लिया ॥ १३ ॥

व्याख्या—मनुष्यरूपमें उत्पन्न हुए उस पुरुषने इस भौतिक जगत्की विचित्र रचनाको बड़े आश्चर्यपूर्वक चारों ओरसे देखा और मन-ही-मन इस प्रकार कहा—‘इस विचित्र जगत्की रचना करनेवाला यहाँ दूसरा कौन है? क्योंकि यह मेरी की हुई रचना तो है नहीं और कार्य होनेके कारण इसका कोई-न-कोई कर्ता अवश्य होना चाहिये।’ इस प्रकार विचार करनेपर उस साधकने अपने हृदयमें अन्तर्धामीरूपसे विराजमान पुरुषको ही इस सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त परब्रह्मके रूपमें प्रत्यक्ष किया। तब वह आनन्दमें भरकर मन-ही-मन कहने लगा—‘अहो! बड़े ही सौभाग्यकी बात है कि मैंने परब्रह्म परमात्माको देख लिया—साक्षात् कर लिया।’

इससे यह भाव प्रकट किया गया है कि इस जगत्की विचित्र रचनाको देखकर इसके कर्ता-धर्ता परमात्माकी सत्तामें विश्वास करके यदि मनुष्य उन्हें जानने और पानेको उत्सुक हो, उन्हींपर निर्भर होकर चेष्टा करे तो अवश्य ही उन्हें जान सकता है। परमात्माको जानने और पानेका काम इस मनुष्य-शरीरमें

खण्ड ३ ] ऐतरेयोपनिषद् ३१७

ही हो सकता है, दूसरे शरीरमें नहीं। अतः मनुष्यको अपने जीवनके अमूल्य समयका सदुपयोग करना चाहिये, उसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिये। इस अध्यायमें मानो परमात्माकी महिमाका और मनुष्य-शरीरके महत्त्वका दिग्दर्शन करानेके लिये ही सृष्टि-रचनाका वर्णन किया गया है॥ १३॥

तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण। परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ १४ ॥

तस्मात्=इसीलिये; इदन्द्रः नाम=वह 'इदन्द्र' नामवाला है; =वास्तवमें; इदन्द्रः नाम वै=वह 'इदन्द्र' नामवाला ही है; (परंतु) इदन्द्रम्=इदन्द्र; सन्तम्=होते हुए ही; तम्=उस परमात्माको; परोक्षेण=परोक्षभावसे (गुप्त नामसे); इन्द्रः=‘इन्द्र’; इति=यों; आचक्षते=पुकारते हैं; हि=क्योंकि; देवाः=देवतालोग; परोक्षप्रियाः इव=मानो परोक्षभावसे कही हुई बातको पसंद करनेवाले होते हैं; हि देवाः परोक्षप्रियाः इव=देवतालोग मानो परोक्षभावसे कही हुई बातोंको ही पसंद करनेवाले होते हैं॥ १४॥

व्याख्या— परब्रह्म परमात्माको उस मनुष्य-शरीरमें उत्पन्न हुए पुरुषने पूर्वोक्त प्रकारसे प्रत्यक्ष कर लिया, इसी कारण परमात्माका नाम 'इदन्द्र' है। अर्थात् ‘इदम् द्रः=इसको मैंने देख लिया' इस व्युत्पत्तिके अनुसार उसका 'इदन्द्र' नाम है। इस प्रकार यद्यपि उस परमात्माका नाम 'इदन्द्र' ही है, फिर भी लोग इसे परोक्षभावसे 'इन्द्र' कहकर पुकारते हैं; क्योंकि देवता लोग मानो छिपाकर ही कुछ कहना पसंद करते हैं। 'परोक्षप्रिया इव हि देवाः' इस अन्तिम वाक्यको दुबारा कहकर इस खण्डकी समाप्ति सूचित की गयी है॥ १४॥

॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥

॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय

प्रथम खण्ड

सम्बन्ध —प्रथम अध्यायमें सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम और मनुष्य-शरीरका महत्त्व बताया गया और यह बात भी संकेतसे कही गयी कि जीवात्मा इस शरीरमें परमात्माको जानकर कृतकृत्य हो सकता है। अब इस शरीरकी अनित्यता दिखाकर वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये इस अध्यायमें मनुष्य-शरीरकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है—

पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति। यदेतद्रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म ॥ १ ॥

अयम् =यह (संसारी जीव); =निश्चयपूर्वक; आदितः =पहले-पहल; पुरुषे =पुरुष-शरीरमें; वै =ही; गर्भः =भवति=वीर्यरूपसे गर्भ बनता है; यत् =जो; एतत् =यह (पुरुषमें); रेतः =वीर्य है; तत् =वह; एतत् =यह; (पुरुषके) सर्वेभ्यः =सम्पूर्ण; अङ्गेभ्यः =अङ्गोंसे; सम्भूतम् =उत्पन्न हुआ; तेजः =तेज है; आत्मानम् =(यह पुरुष पहले तो) अपने ही स्वरूपभूत इस वीर्यमय तेजको; आत्मनि =अपने शरीरमें; एव =ही; बिभर्ति =धारण करता है; (फिर) यदा =जब; (यह) तत् =उसको; स्त्रियाम् =स्त्रीमें; सिञ्चति =सिंचन करता है; अथ =तब; एतत् =इसको; जनयति =गर्भरूपमें उत्पन्न करता है; तत् =वह; अस्य =इसका; प्रथमम् =पहला; जन्म =जन्म है ॥ १ ॥

व्याख्या —यह संसारी जीव पहले-पहल पुरुष-शरीरमें (पिताके शरीरमें) वीर्यरूपसे गर्भ बनता है—प्रकट होता है। पुरुषके शरीरमें जो यह वीर्य है, वह सम्पूर्ण अङ्गोंमेंसे निकलकर उत्पन्न हुआ तेज (सार) है। यह पिता अपने स्वरूपभूत उस वीर्यरूप तेजको पहले तो अपने शरीरमें ही

खण्ड १ ]

ऐतरेयोपनिषद्

३१९

धारण-पोषण करता है—ब्रह्मचर्यके द्वारा बढ़ाता एवं पुष्ट करता है; फिर जब यह उसको स्त्रीके गर्भाशयमें सिञ्चन (स्थापित) करता है, तब इसे गर्भरूपमें उत्पन्न करता है। वह माताके शरीरमें प्रवेश करना ही इसका पहला जन्म है॥ १ ॥

तत्त्रिया आत्मभूतं गच्छति। यथा स्वमङ्गं तथा। तस्मादेनां न हिनस्ति। सास्यैतमात्मानमत्रगतं भावयति॥ २ ॥

तत्=वह (गर्भ); स्त्रियाः=स्त्रीके; आत्मभूतम्=आत्मभावको; गच्छति=प्राप्त हो जाता है; यथा=जैसे; स्वम्=अपना; अङ्गम्=अङ्ग होता है; तथा=वैसे ही (हो जाता है); तस्मात्=इसी कारणसे; एनाम्=इस स्त्रीको; न हिनस्ति=वह पीड़ा नहीं देता; सा=वह स्त्री (माता); अत्रगतम्=यहाँ (अपने शरीरमें) आये हुए; अस्य=इस (अपने पति) के; आत्मानम्=आत्मारूप (स्वरूपभूत); एतम् भावयति=इस गर्भका पालन-पोषण करती है॥ २ ॥

व्याख्या —उस स्त्री (माता) के शरीरमें आया हुआ वह गर्भ—पिताके द्वारा स्थापित किया हुआ तेज उस स्त्रीके आत्मभावको प्राप्त हो जाता है—अर्थात् जैसे उसके दूसरे अङ्ग हैं, उसी प्रकार वह गर्भ भी उसके शरीरका एक अङ्ग-सा ही हो जाता है। यही कारण है कि वह गर्भ उस स्त्रीके उदरमें रहता हुआ भी गर्भिणी स्त्रीको पीड़ा नहीं पहुँचाता—उसे भाररूप नहीं प्रतीत होता। वह स्त्री अपने शरीरमें आये हुए अपने पतिके आत्मारूप इस गर्भको अपने अङ्गोंकी भाँति ही भोजनके रससे पुष्ट करती है और अन्य सब प्रकारके आवश्यक नियमोंका पालन करके उसकी भलीभाँति रक्षा करती है॥ २ ॥

सा भावयित्री भावयितव्या भवति। तं स्त्री गर्भं बिभर्ति। सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति। स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां संतत्या। एवं संतता हीमे लोकास्तदस्य द्वितीयं जन्म॥ ३ ॥

३२०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

सा=वह; भावयित्री=उस गर्भका पालन-पोषण करनेवाली स्त्री; भावयितव्या=पालन-पोषण करनेयोग्य; भवति=होती है; तम् गर्भम्=उस गर्भको; अग्रे=प्रसवके पहलेतक; स्त्री=स्त्री (माता); बिभर्ति=धारण करती है; जन्मनः अधि=(फिर) जन्म लेनेके बाद; सः=वह (उसका पिता); अग्रे=पहले; एव=ही; कुमारम्=उस कुमारको; (जातकर्म आदि संस्कारोंद्वारा) भावयति=अभ्युदयशील बनाता तथा उसकी उन्नति करता है; सः=वह (पिता); यत्=जो; जन्मनः अधि=जन्म लेनेके बाद; अग्रे [एव]=पहले ही; कुमारम् भावयति=बालककी उन्नति करता है; तत्=वह (मानो); एषाम्=इन; लोकानाम्=लोकोंको (मनुष्योंको); संतत्या=बढ़ानेके द्वारा; आत्मानम् एव भावयति=अपनी ही उन्नति करता है; हि=क्योंकि; एवम्=इसी प्रकार; इमे=ये सब; लोकाः=लोक (मनुष्य); संतताः=विस्तारको प्राप्त हुए हैं; तत्=वह; अस्य=इसका; द्वितीयम्=दूसरा; जन्म=जन्म है ॥ ३ ॥

व्याख्या—अपने पतिके आत्मस्वरूप उस गर्भकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाली गर्भिणी स्त्री घरके लोगोंद्वारा और विशेषतः उसके पतिद्वारा पालन-पोषण करनेयोग्य होती है। अर्थात् घरके लोगोंका और पतिका यह परम आवश्यक कर्तव्य है कि वे सब मिलकर उसके खान-पान और रहन-सहनकी सुव्यवस्था करके सब प्रकारसे उसकी सँभाल रखें। उस गर्भको पहले अर्थात् प्रसव होनेतक तो स्त्री (माता) अपने शरीरमें धारण करती है; फिर जन्म लेनेके बाद—जन्म लेते ही उसका पिता जातकर्म आदि संस्कारोंसे और नाना प्रकारके उपचारोंसे उस कुमारको अभ्युदयशील बनाता है और जन्मसे लेकर जबतक वह सर्वथा योग्य नहीं बन जाता, तबतक हर प्रकारसे उसका पालन-पोषण करता है—नाना प्रकारकी विद्या और शिल्पादिका अध्ययन कराके उसे सब प्रकारसे उन्नत बनाता है। वह पिता जन्मके बाद उस बालकको उपयुक्त बना देनेके पहले-पहले जो उसकी रक्षा करता है, उसे सब प्रकारसे योग्य बनाता है, वह मानो इन लोकोंको अर्थात् मनुष्योंकी

खण्ड १ ]

ऐतरेयोपनिषद्

३२१

परम्पराको बढानेके द्वारा अपनी ही रक्षा करता है; क्योंकि इसी प्रकार एक-से-एक उत्पन्न होकर ये सब मनुष्य विस्तारको प्राप्त हुए हैं। यह जो इस जीवका गर्भसे बाहर आकर बालकरूपमें उत्पन्न होना है, वह इसका दूसरा जन्म है।

इस वर्णनसे पिता और पुत्र दोनोंको अपने-अपने कर्तव्यकी शिक्षा दी गयी है। पुत्रको तो यह समझना चाहिये कि उसपर अपने माता-पिताका बड़ा भारी उपकार है; अतः वह उनकी जितनी सेवा कर सके, थोड़ी है और पिताको इस प्रकारका अभिमान नहीं करना चाहिये कि मैंने इसका उपकार किया है, वरं यह समझना चाहिये कि मैंने अपनी ही वृद्धि करके अपने कर्तव्यका पालन किया है॥ ३ ॥

सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः प्रतिधीयते। अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति। स इतः प्रयत्रेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म ॥ ४ ॥

सः =वह (पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ); अयम् =यह; आत्मा =(पिताका ही) आत्मा; अस्य =इस पिताके (द्वारा आचरणीय); पुण्येभ्यः =शुभकर्मके लिये; प्रतिधीयते =उसका प्रतिनिधि बना दिया जाता है; अथ =उसके अनन्तर; अस्य =इस (पुत्र) का; अयम् =यह (पितारूप); इतरः =दूसरा; आत्मा =आत्मा; कृतकृत्यः =अपना कर्तव्य पूरा करके; वयोगतः =आयु पूरी होनेपर; प्रैति =मरकर (यहाँसे) चला जाता है; सः =वह; इतः =यहाँसे; प्रयन् =जाकर; एव =ही; पुनः =पुनः; जायते =उत्पन्न हो जाता है; तत् =वह; अस्य =इसका; तृतीयम् =तीसरा; जन्म =जन्म है॥ ४ ॥

व्याख्या —पूर्वोक्त प्रकारसे इस पिताका ही आत्मस्वरूप पुत्र जब कार्य करनेयोग्य हो जाता है, तब वह पिता उसको अपना प्रतिनिधि बना देता है—अग्निहोत्र, देवपूजा और अतिथि-सेवा आदि वैदिक और लौकिक जितने भी शुभकर्म हैं, उन सबका भार पुत्रको सौंप देता है। गृहस्थका पूरा दायित्व

३२२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

पुत्रपर छोड़कर स्वयं कृतकृत्य हो जाता है अर्थात् अपनेको पितृ-ऋणसे मुक्त मानता है। उसके बाद इस शरीरकी आयु पूर्ण होनेपर जब वह (पिता) इसे छोड़कर यहाँसे विदा हो जाता है, तब यहाँसे जाकर दूसरी जगह कर्मानुसार जहाँ जिस योनिमें जन्म लेता है, वह इसका तीसरा जन्म है। इसी तरह यह जन्म-जन्मान्तरकी परम्परा चलती रहती है।

जबतक जन्म-मृत्युके महान् कष्टका विचार करके इससे छुटकारा पानेके लिये जीवात्मा मनुष्य-शरीरमें चेष्टा नहीं करता, तबतक यह परम्परा नहीं टूटती। अतः इसके लिये मनुष्यको अवश्य चेष्टा करनी चाहिये। यही इस प्रकरणका उद्देश्य प्रतीत होता है ॥४॥

सम्बन्ध —इस प्रकार बार-बार जन्म लेना और मरना एक भयानक यन्त्रणा है; और जबतक यह जीव इस रहस्यको समझकर इस शरीररूप पिंजरेको काटकर इससे सर्वथा अलग न हो जायगा तबतक इसका इस जन्म-मृत्युरूप यन्त्रणासे छुटकारा नहीं होगा—यह भाव अगले दो मन्त्रोंमें वामदेव ऋषिके दृष्टान्तसे समझाया जाता है—

तदुक्तमृषिणा—

गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा । शतं मा पुर आयसीररक्षत्रधः श्येनो जवसा निरदीयमिति । गर्भ एवैतच्छ्यानो वामदेव एवमुवाच ॥ ५ ॥*

तत्=वही बात (इस प्रकार); ऋषिणा=ऋषिद्वारा; उत्कम्=कही गयी है; नु=अहो; अहम्=मैंने; गर्भे=गर्भमें; सन्=रहते हुए ही; एषाम्=इन; देवानाम्=देवताओंके; विश्वा=बहुत-से; जनिमानि=जन्मोंको; अन्ववेदम्=भलीभाँति जान लिया; अधः=तत्त्वज्ञान होनेसे पूर्व; मा=मुझे; शतम्=सैकड़ों; आयसीः=लोहेके समान कठोर; पुरः=शरीरोंने; अरक्षन्=अवरुद्ध कर रखा था; (अब मैं) श्येनः=बाज पक्षी (की भाँति); जवसा=वेगसे; निरदीयम् इति=उन सबको तोड़कर उनसे अलग हो गया हूँ;

  • यह मन्त्र ऋग्वेद (४।२७।१) में है।

खण्ड १ ]

ऐतरेयोपनिषद्

३२३

गर्भ एव=गर्भमें ही; शयानः=सोये हुए; वामदेवः=वामदेव ऋषिने; एवम्=उक्त प्रकारसे; एतत्=यह बात; उवाच=कही ॥ ५ ॥

व्याख्या —उपर्युक्त चार मन्त्रोंमें कही हुई बातका ही रहस्य यहाँ ऋषिद्वारा बताया गया है। गर्भमें रहते हुए ही अर्थात् गर्भके बाहर आनेसे पहले ही वामदेव ऋषिको यथार्थ ज्ञान हो गया था, इसलिये उन्होंने माताके उदरमें ही कहा था—‘अहो! कितने आश्चर्य और आनन्दकी बात है कि गर्भमें रहते-रहते ही मैंने इन अन्तःकरण और इन्द्रियरूप देवताओंके अनेक जन्मोंका रहस्य भलीभाँति जान लिया। अर्थात् मैं इस बातको जान गया कि ये जन्म आदि वास्तवमें इन अन्तःकरण और इन्द्रियोंके ही होते हैं, आत्माके नहीं। इस रहस्यको समझनेसे पहले मुझे सैकड़ों लोहेके समान कठोर शरीररूपी पिंजरोने अवरुद्ध कर रखा था। उनमें मेरी ऐसी दृढ़ अहंता हो गयी थी कि उससे छूटना मेरे लिये कठिन हो रहा था। अब मैं बाज पक्षीकी भाँति ज्ञानरूप बलके वेगसे उन सबको तोड़कर उनसे अलग हो गया हूँ। उन शरीररूप पिंजरोँसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं रहा, मैं सदाके लिये उन शरीरोंकी अहंतासे मुक्त हो गया हूँ’ ॥ ५ ॥

स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्वं उक्तम्यामुष्विन् स्वर्गे लोके सर्वांक्रामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत् ॥ ६ ॥

एवम्=इस प्रकार; विद्वान्=(जन्म-जन्मान्तरके रहस्यको) जाननेवाला; सः=वह वामदेव ऋषि; अस्मात्=इस; शरीरभेदात्=शरीरका नाश होनेपर; ऊर्ध्वः उक्तम्य=संसारके ऊपर उठ गया और ऊर्ध्वगतिके द्वारा; अमुष्विन्=उस; स्वर्गे लोके=परमधाममें (पहुँचकर); सर्वांन्=समस्त; क्रामान्=क्रामानाओंको; आप्त्वा=प्राप्त करके; अमृतः=अमृत; समभवत्=हो गया; समभवत्=हो गया ॥ ६ ॥

व्याख्या —इस प्रकार जन्म-जन्मान्तरके तत्त्वको जाननेवाला अर्थात् जबतक यह जीव इन शरीरोंके साथ एक हुआ रहता है, शरीरको ही अपना स्वरूप माने रहता है, तबतक इसका जन्म-मृत्युसे छुटकारा नहीं होता, इसको

३२४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

बार-बार नाना योनियोंमें जन्म लेकर नाना प्रकारके कष्ट भोगने पड़ते हैं— इस रहस्यको समझनेवाला वह ज्ञानी वामदेव ऋषि गर्भसे बाहर आकर अन्तमें शरीरका नाश होनेपर संसारसे ऊपर उठ गया तथा ऊर्ध्वगतिके द्वारा भगवान्के परमधाममें पहुँचकर वहाँ समस्त कामनाओंको पाकर अर्थात् सर्वथा आसकाम होकर अमृत हो गया! अमृत हो गया। जन्म-मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट गया। ‘समभवत्’ पदको दुहराकर यहाँ अध्यायकी समाप्तिको सूचित किया गया है ॥ ६ ॥

॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥

॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥

✥ ✥ ✥

तृतीय अध्याय

प्रथम खण्ड

क्रोडयमात्मेति वयमुपास्महे। कतरः स आत्मा, येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ॥ १ ॥

वयम्=हमलोग; उपास्महे=जिसकी उपासना करते हैं; [ सः ]=वह; अयम्=यह; आत्मा=आत्मा; कः इति=कौन है; वा=अथवा; येन=जिससे; पश्यति=मनुष्य देखता है; वा=या; येन=जिससे; शृणोति=सुनता है; वा=अथवा; येन=जिससे; गन्धान्=गन्धोंको; आजिघ्रति=सूँघता है; वा=अथवा; येन=जिससे; वाचम्=वाणीको; व्याकरोति=स्पष्ट बोलता है; वा=या; येन=जिससे; स्वादु=स्वादयुक्त; च=और; अस्वादु=स्वादहीन वस्तुको; च=भी; विजानाति=अलग-अलग जानता है; सः=वह; आत्मा=आत्मा; कतरः=(पिछले अध्यायोंमें कहे हुए दो आत्माओंमेंसे) कौन है* ॥ १ ॥

व्याख्या—इस उपनिषद्के पहले और दूसरे अध्यायोंमें दो आत्माओंका वर्णन आया है—एक तो वह आत्मा (परमात्मा), जिसने इस सृष्टिकी रचना की और सजीव पुरुषको प्रकट करके उसका सहयोग देनेके लिये स्वयं उनमें प्रविष्ट हुआ; दूसरा वह आत्मा (जीवात्मा), जिसको सजीव पुरुषरूपमें परमात्माने प्रकट किया था और जिसके जन्म-जन्मान्तरकी परम्पराका वर्णन दूसरे अध्यायमें गर्भमें आनेसे लेकर मरणपर्यन्त किया गया है। इनमेंसे उपास्य देव कौन है, वह कैसा है, उसकी क्या पहचान है—इन बातोंका निर्णय करनेके लिये यह तीसरा अध्याय कहा गया है।

  • केनोपनिषद्के आरम्भकी इसके साथ बहुत अंशोंमें समानता है।