भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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खण्ड १ ]

ऐतरेयोपनिषद्

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परम्पराको बढानेके द्वारा अपनी ही रक्षा करता है; क्योंकि इसी प्रकार एक-से-एक उत्पन्न होकर ये सब मनुष्य विस्तारको प्राप्त हुए हैं। यह जो इस जीवका गर्भसे बाहर आकर बालकरूपमें उत्पन्न होना है, वह इसका दूसरा जन्म है।

इस वर्णनसे पिता और पुत्र दोनोंको अपने-अपने कर्तव्यकी शिक्षा दी गयी है। पुत्रको तो यह समझना चाहिये कि उसपर अपने माता-पिताका बड़ा भारी उपकार है; अतः वह उनकी जितनी सेवा कर सके, थोड़ी है और पिताको इस प्रकारका अभिमान नहीं करना चाहिये कि मैंने इसका उपकार किया है, वरं यह समझना चाहिये कि मैंने अपनी ही वृद्धि करके अपने कर्तव्यका पालन किया है॥ ३ ॥

सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः प्रतिधीयते। अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति। स इतः प्रयत्रेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म ॥ ४ ॥

सः =वह (पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ); अयम् =यह; आत्मा =(पिताका ही) आत्मा; अस्य =इस पिताके (द्वारा आचरणीय); पुण्येभ्यः =शुभकर्मके लिये; प्रतिधीयते =उसका प्रतिनिधि बना दिया जाता है; अथ =उसके अनन्तर; अस्य =इस (पुत्र) का; अयम् =यह (पितारूप); इतरः =दूसरा; आत्मा =आत्मा; कृतकृत्यः =अपना कर्तव्य पूरा करके; वयोगतः =आयु पूरी होनेपर; प्रैति =मरकर (यहाँसे) चला जाता है; सः =वह; इतः =यहाँसे; प्रयन् =जाकर; एव =ही; पुनः =पुनः; जायते =उत्पन्न हो जाता है; तत् =वह; अस्य =इसका; तृतीयम् =तीसरा; जन्म =जन्म है॥ ४ ॥

व्याख्या —पूर्वोक्त प्रकारसे इस पिताका ही आत्मस्वरूप पुत्र जब कार्य करनेयोग्य हो जाता है, तब वह पिता उसको अपना प्रतिनिधि बना देता है—अग्निहोत्र, देवपूजा और अतिथि-सेवा आदि वैदिक और लौकिक जितने भी शुभकर्म हैं, उन सबका भार पुत्रको सौंप देता है। गृहस्थका पूरा दायित्व