भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

पुत्रपर छोड़कर स्वयं कृतकृत्य हो जाता है अर्थात् अपनेको पितृ-ऋणसे मुक्त मानता है। उसके बाद इस शरीरकी आयु पूर्ण होनेपर जब वह (पिता) इसे छोड़कर यहाँसे विदा हो जाता है, तब यहाँसे जाकर दूसरी जगह कर्मानुसार जहाँ जिस योनिमें जन्म लेता है, वह इसका तीसरा जन्म है। इसी तरह यह जन्म-जन्मान्तरकी परम्परा चलती रहती है।

जबतक जन्म-मृत्युके महान् कष्टका विचार करके इससे छुटकारा पानेके लिये जीवात्मा मनुष्य-शरीरमें चेष्टा नहीं करता, तबतक यह परम्परा नहीं टूटती। अतः इसके लिये मनुष्यको अवश्य चेष्टा करनी चाहिये। यही इस प्रकरणका उद्देश्य प्रतीत होता है ॥४॥

सम्बन्ध —इस प्रकार बार-बार जन्म लेना और मरना एक भयानक यन्त्रणा है; और जबतक यह जीव इस रहस्यको समझकर इस शरीररूप पिंजरेको काटकर इससे सर्वथा अलग न हो जायगा तबतक इसका इस जन्म-मृत्युरूप यन्त्रणासे छुटकारा नहीं होगा—यह भाव अगले दो मन्त्रोंमें वामदेव ऋषिके दृष्टान्तसे समझाया जाता है—

तदुक्तमृषिणा—

गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा । शतं मा पुर आयसीररक्षत्रधः श्येनो जवसा निरदीयमिति । गर्भ एवैतच्छ्यानो वामदेव एवमुवाच ॥ ५ ॥*

तत्=वही बात (इस प्रकार); ऋषिणा=ऋषिद्वारा; उत्कम्=कही गयी है; नु=अहो; अहम्=मैंने; गर्भे=गर्भमें; सन्=रहते हुए ही; एषाम्=इन; देवानाम्=देवताओंके; विश्वा=बहुत-से; जनिमानि=जन्मोंको; अन्ववेदम्=भलीभाँति जान लिया; अधः=तत्त्वज्ञान होनेसे पूर्व; मा=मुझे; शतम्=सैकड़ों; आयसीः=लोहेके समान कठोर; पुरः=शरीरोंने; अरक्षन्=अवरुद्ध कर रखा था; (अब मैं) श्येनः=बाज पक्षी (की भाँति); जवसा=वेगसे; निरदीयम् इति=उन सबको तोड़कर उनसे अलग हो गया हूँ;

  • यह मन्त्र ऋग्वेद (४।२७।१) में है।