ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 325, कुल 548 में से
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ऐतरेयोपनिषद्
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गर्भ एव=गर्भमें ही; शयानः=सोये हुए; वामदेवः=वामदेव ऋषिने; एवम्=उक्त प्रकारसे; एतत्=यह बात; उवाच=कही ॥ ५ ॥
व्याख्या —उपर्युक्त चार मन्त्रोंमें कही हुई बातका ही रहस्य यहाँ ऋषिद्वारा बताया गया है। गर्भमें रहते हुए ही अर्थात् गर्भके बाहर आनेसे पहले ही वामदेव ऋषिको यथार्थ ज्ञान हो गया था, इसलिये उन्होंने माताके उदरमें ही कहा था—‘अहो! कितने आश्चर्य और आनन्दकी बात है कि गर्भमें रहते-रहते ही मैंने इन अन्तःकरण और इन्द्रियरूप देवताओंके अनेक जन्मोंका रहस्य भलीभाँति जान लिया। अर्थात् मैं इस बातको जान गया कि ये जन्म आदि वास्तवमें इन अन्तःकरण और इन्द्रियोंके ही होते हैं, आत्माके नहीं। इस रहस्यको समझनेसे पहले मुझे सैकड़ों लोहेके समान कठोर शरीररूपी पिंजरोने अवरुद्ध कर रखा था। उनमें मेरी ऐसी दृढ़ अहंता हो गयी थी कि उससे छूटना मेरे लिये कठिन हो रहा था। अब मैं बाज पक्षीकी भाँति ज्ञानरूप बलके वेगसे उन सबको तोड़कर उनसे अलग हो गया हूँ। उन शरीररूप पिंजरोँसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं रहा, मैं सदाके लिये उन शरीरोंकी अहंतासे मुक्त हो गया हूँ’ ॥ ५ ॥
स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्वं उक्तम्यामुष्विन् स्वर्गे लोके सर्वांक्रामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत् ॥ ६ ॥
एवम्=इस प्रकार; विद्वान्=(जन्म-जन्मान्तरके रहस्यको) जाननेवाला; सः=वह वामदेव ऋषि; अस्मात्=इस; शरीरभेदात्=शरीरका नाश होनेपर; ऊर्ध्वः उक्तम्य=संसारके ऊपर उठ गया और ऊर्ध्वगतिके द्वारा; अमुष्विन्=उस; स्वर्गे लोके=परमधाममें (पहुँचकर); सर्वांन्=समस्त; क्रामान्=क्रामानाओंको; आप्त्वा=प्राप्त करके; अमृतः=अमृत; समभवत्=हो गया; समभवत्=हो गया ॥ ६ ॥
व्याख्या —इस प्रकार जन्म-जन्मान्तरके तत्त्वको जाननेवाला अर्थात् जबतक यह जीव इन शरीरोंके साथ एक हुआ रहता है, शरीरको ही अपना स्वरूप माने रहता है, तबतक इसका जन्म-मृत्युसे छुटकारा नहीं होता, इसको