ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 322, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय २ ]
सा=वह; भावयित्री=उस गर्भका पालन-पोषण करनेवाली स्त्री; भावयितव्या=पालन-पोषण करनेयोग्य; भवति=होती है; तम् गर्भम्=उस गर्भको; अग्रे=प्रसवके पहलेतक; स्त्री=स्त्री (माता); बिभर्ति=धारण करती है; जन्मनः अधि=(फिर) जन्म लेनेके बाद; सः=वह (उसका पिता); अग्रे=पहले; एव=ही; कुमारम्=उस कुमारको; (जातकर्म आदि संस्कारोंद्वारा) भावयति=अभ्युदयशील बनाता तथा उसकी उन्नति करता है; सः=वह (पिता); यत्=जो; जन्मनः अधि=जन्म लेनेके बाद; अग्रे [एव]=पहले ही; कुमारम् भावयति=बालककी उन्नति करता है; तत्=वह (मानो); एषाम्=इन; लोकानाम्=लोकोंको (मनुष्योंको); संतत्या=बढ़ानेके द्वारा; आत्मानम् एव भावयति=अपनी ही उन्नति करता है; हि=क्योंकि; एवम्=इसी प्रकार; इमे=ये सब; लोकाः=लोक (मनुष्य); संतताः=विस्तारको प्राप्त हुए हैं; तत्=वह; अस्य=इसका; द्वितीयम्=दूसरा; जन्म=जन्म है ॥ ३ ॥
व्याख्या—अपने पतिके आत्मस्वरूप उस गर्भकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाली गर्भिणी स्त्री घरके लोगोंद्वारा और विशेषतः उसके पतिद्वारा पालन-पोषण करनेयोग्य होती है। अर्थात् घरके लोगोंका और पतिका यह परम आवश्यक कर्तव्य है कि वे सब मिलकर उसके खान-पान और रहन-सहनकी सुव्यवस्था करके सब प्रकारसे उसकी सँभाल रखें। उस गर्भको पहले अर्थात् प्रसव होनेतक तो स्त्री (माता) अपने शरीरमें धारण करती है; फिर जन्म लेनेके बाद—जन्म लेते ही उसका पिता जातकर्म आदि संस्कारोंसे और नाना प्रकारके उपचारोंसे उस कुमारको अभ्युदयशील बनाता है और जन्मसे लेकर जबतक वह सर्वथा योग्य नहीं बन जाता, तबतक हर प्रकारसे उसका पालन-पोषण करता है—नाना प्रकारकी विद्या और शिल्पादिका अध्ययन कराके उसे सब प्रकारसे उन्नत बनाता है। वह पिता जन्मके बाद उस बालकको उपयुक्त बना देनेके पहले-पहले जो उसकी रक्षा करता है, उसे सब प्रकारसे योग्य बनाता है, वह मानो इन लोकोंको अर्थात् मनुष्योंकी