ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 327, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ
तृतीय अध्याय
प्रथम खण्ड
क्रोडयमात्मेति वयमुपास्महे। कतरः स आत्मा, येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ॥ १ ॥
वयम्=हमलोग; उपास्महे=जिसकी उपासना करते हैं; [ सः ]=वह; अयम्=यह; आत्मा=आत्मा; कः इति=कौन है; वा=अथवा; येन=जिससे; पश्यति=मनुष्य देखता है; वा=या; येन=जिससे; शृणोति=सुनता है; वा=अथवा; येन=जिससे; गन्धान्=गन्धोंको; आजिघ्रति=सूँघता है; वा=अथवा; येन=जिससे; वाचम्=वाणीको; व्याकरोति=स्पष्ट बोलता है; वा=या; येन=जिससे; स्वादु=स्वादयुक्त; च=और; अस्वादु=स्वादहीन वस्तुको; च=भी; विजानाति=अलग-अलग जानता है; सः=वह; आत्मा=आत्मा; कतरः=(पिछले अध्यायोंमें कहे हुए दो आत्माओंमेंसे) कौन है* ॥ १ ॥
व्याख्या—इस उपनिषद्के पहले और दूसरे अध्यायोंमें दो आत्माओंका वर्णन आया है—एक तो वह आत्मा (परमात्मा), जिसने इस सृष्टिकी रचना की और सजीव पुरुषको प्रकट करके उसका सहयोग देनेके लिये स्वयं उनमें प्रविष्ट हुआ; दूसरा वह आत्मा (जीवात्मा), जिसको सजीव पुरुषरूपमें परमात्माने प्रकट किया था और जिसके जन्म-जन्मान्तरकी परम्पराका वर्णन दूसरे अध्यायमें गर्भमें आनेसे लेकर मरणपर्यन्त किया गया है। इनमेंसे उपास्य देव कौन है, वह कैसा है, उसकी क्या पहचान है—इन बातोंका निर्णय करनेके लिये यह तीसरा अध्याय कहा गया है।
- केनोपनिषद्के आरम्भकी इसके साथ बहुत अंशोंमें समानता है।