भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ३ ]

मन्त्रका तात्पर्य यह है कि उस उपास्यदेव परमात्माके तत्त्वको जाननेकी इच्छावाले कुछ मनुष्य आपसमें विचार करने लगे—‘जिसकी हमलोग उपासना करते हैं अर्थात् जिसकी उपासना करके हमें उसे प्राप्त करना चाहिये, वह आत्मा कौन है? दूसरे शब्दोंमें जिसके सहयोगसे मनुष्य नेत्रोंके द्वारा समस्त दृश्य देखाता है, जिससे कानोंद्वारा शब्द सुनता है, जिससे प्राणेंद्रियके द्वारा नाना प्रकारकी गन्ध स्रुंघता है, जिससे वाणीद्वारा वचन बोलता है; जिससे रसनाद्वारा स्वादयुक्त और स्वादहीन वस्तुको अलग-अलग पहचान लेता है, वह पहले और दूसरे अध्यायमें वर्णित दो आत्माओंमेंसे कौन है? ॥ १ ॥

यदेतद्ब्रूदयं मनश्चैतत्। संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धूर्तिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥ २ ॥

यत्=जो; एतत्=यह; हृदयम्=हृदय है; एतत्=यही; मनः=मन; च=भी है; संज्ञानम्=सम्यक् ज्ञान-शक्ति; आज्ञानम्=आज्ञा देनेकी शक्ति; विज्ञानम्=विभिन्न रूपसे जाननेकी शक्ति; प्रज्ञानम्=तत्काल जाननेकी शक्ति; मेधा=धारण करनेकी शक्ति; दृष्टिः=देखनेकी शक्ति; धृतिः=धैर्य; मतिः=बुद्धि; मनीषा=मनन-शक्ति; जूतिः=वेग; स्मृतिः=स्मरण-शक्ति; संकल्पः=संकल्प-शक्ति; क्रतुः=मनोरथ-शक्ति; असुः=प्राण-शक्ति; कामः=कामना-शक्ति; वशः=स्त्री-संस्पर्ग आदिकी अभिलाषा; इति=इस प्रकार; एतानि=ये; सर्वाणि=सब-के-सब; प्रज्ञानस्य=स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्माके; एव=ही; नामधेयानि=नाम अर्थात् उसकी सत्ताके बोधक लक्षण; भवन्ति=हैं ॥ २ ॥

व्याख्या—इस प्रकार विचार उपस्थित करके उन्होंने सोचा कि जो यह हृदय अर्थात् अन्तःकरण है, यही पहले बताया हुआ मन है, इस मनकी जो यह सम्यक् प्रकारसे जाननेकी शक्ति देखनेमें आती है—अर्थात् जो दूसरोंपर आज्ञाद्वारा शासन करनेकी शक्ति, पदार्थका अलग-अलग विवेचन करके जाननेकी शक्ति, देखे-सुने हुए पदार्थोंको तत्काल समझ लेनेकी शक्ति,