ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 320, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ
द्वितीय अध्याय
प्रथम खण्ड
सम्बन्ध —प्रथम अध्यायमें सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम और मनुष्य-शरीरका महत्त्व बताया गया और यह बात भी संकेतसे कही गयी कि जीवात्मा इस शरीरमें परमात्माको जानकर कृतकृत्य हो सकता है। अब इस शरीरकी अनित्यता दिखाकर वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये इस अध्यायमें मनुष्य-शरीरकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है—
पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति। यदेतद्रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म ॥ १ ॥
अयम् =यह (संसारी जीव); ह =निश्चयपूर्वक; आदितः =पहले-पहल; पुरुषे =पुरुष-शरीरमें; वै =ही; गर्भः =भवति=वीर्यरूपसे गर्भ बनता है; यत् =जो; एतत् =यह (पुरुषमें); रेतः =वीर्य है; तत् =वह; एतत् =यह; (पुरुषके) सर्वेभ्यः =सम्पूर्ण; अङ्गेभ्यः =अङ्गोंसे; सम्भूतम् =उत्पन्न हुआ; तेजः =तेज है; आत्मानम् =(यह पुरुष पहले तो) अपने ही स्वरूपभूत इस वीर्यमय तेजको; आत्मनि =अपने शरीरमें; एव =ही; बिभर्ति =धारण करता है; (फिर) यदा =जब; (यह) तत् =उसको; स्त्रियाम् =स्त्रीमें; सिञ्चति =सिंचन करता है; अथ =तब; एतत् =इसको; जनयति =गर्भरूपमें उत्पन्न करता है; तत् =वह; अस्य =इसका; प्रथमम् =पहला; जन्म =जन्म है ॥ १ ॥
व्याख्या —यह संसारी जीव पहले-पहल पुरुष-शरीरमें (पिताके शरीरमें) वीर्यरूपसे गर्भ बनता है—प्रकट होता है। पुरुषके शरीरमें जो यह वीर्य है, वह सम्पूर्ण अङ्गोंमेंसे निकलकर उत्पन्न हुआ तेज (सार) है। यह पिता अपने स्वरूपभूत उस वीर्यरूप तेजको पहले तो अपने शरीरमें ही