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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

द्वितीय अध्याय

प्रथम खण्ड

सम्बन्ध —प्रथम अध्यायमें सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम और मनुष्य-शरीरका महत्त्व बताया गया और यह बात भी संकेतसे कही गयी कि जीवात्मा इस शरीरमें परमात्माको जानकर कृतकृत्य हो सकता है। अब इस शरीरकी अनित्यता दिखाकर वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये इस अध्यायमें मनुष्य-शरीरकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है—

पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति। यदेतद्रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म ॥ १ ॥

अयम् =यह (संसारी जीव); =निश्चयपूर्वक; आदितः =पहले-पहल; पुरुषे =पुरुष-शरीरमें; वै =ही; गर्भः =भवति=वीर्यरूपसे गर्भ बनता है; यत् =जो; एतत् =यह (पुरुषमें); रेतः =वीर्य है; तत् =वह; एतत् =यह; (पुरुषके) सर्वेभ्यः =सम्पूर्ण; अङ्गेभ्यः =अङ्गोंसे; सम्भूतम् =उत्पन्न हुआ; तेजः =तेज है; आत्मानम् =(यह पुरुष पहले तो) अपने ही स्वरूपभूत इस वीर्यमय तेजको; आत्मनि =अपने शरीरमें; एव =ही; बिभर्ति =धारण करता है; (फिर) यदा =जब; (यह) तत् =उसको; स्त्रियाम् =स्त्रीमें; सिञ्चति =सिंचन करता है; अथ =तब; एतत् =इसको; जनयति =गर्भरूपमें उत्पन्न करता है; तत् =वह; अस्य =इसका; प्रथमम् =पहला; जन्म =जन्म है ॥ १ ॥

व्याख्या —यह संसारी जीव पहले-पहल पुरुष-शरीरमें (पिताके शरीरमें) वीर्यरूपसे गर्भ बनता है—प्रकट होता है। पुरुषके शरीरमें जो यह वीर्य है, वह सम्पूर्ण अङ्गोंमेंसे निकलकर उत्पन्न हुआ तेज (सार) है। यह पिता अपने स्वरूपभूत उस वीर्यरूप तेजको पहले तो अपने शरीरमें ही

खण्ड १ ]

ऐतरेयोपनिषद्

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धारण-पोषण करता है—ब्रह्मचर्यके द्वारा बढ़ाता एवं पुष्ट करता है; फिर जब यह उसको स्त्रीके गर्भाशयमें सिञ्चन (स्थापित) करता है, तब इसे गर्भरूपमें उत्पन्न करता है। वह माताके शरीरमें प्रवेश करना ही इसका पहला जन्म है॥ १ ॥

तत्त्रिया आत्मभूतं गच्छति। यथा स्वमङ्गं तथा। तस्मादेनां न हिनस्ति। सास्यैतमात्मानमत्रगतं भावयति॥ २ ॥

तत्=वह (गर्भ); स्त्रियाः=स्त्रीके; आत्मभूतम्=आत्मभावको; गच्छति=प्राप्त हो जाता है; यथा=जैसे; स्वम्=अपना; अङ्गम्=अङ्ग होता है; तथा=वैसे ही (हो जाता है); तस्मात्=इसी कारणसे; एनाम्=इस स्त्रीको; न हिनस्ति=वह पीड़ा नहीं देता; सा=वह स्त्री (माता); अत्रगतम्=यहाँ (अपने शरीरमें) आये हुए; अस्य=इस (अपने पति) के; आत्मानम्=आत्मारूप (स्वरूपभूत); एतम् भावयति=इस गर्भका पालन-पोषण करती है॥ २ ॥

व्याख्या —उस स्त्री (माता) के शरीरमें आया हुआ वह गर्भ—पिताके द्वारा स्थापित किया हुआ तेज उस स्त्रीके आत्मभावको प्राप्त हो जाता है—अर्थात् जैसे उसके दूसरे अङ्ग हैं, उसी प्रकार वह गर्भ भी उसके शरीरका एक अङ्ग-सा ही हो जाता है। यही कारण है कि वह गर्भ उस स्त्रीके उदरमें रहता हुआ भी गर्भिणी स्त्रीको पीड़ा नहीं पहुँचाता—उसे भाररूप नहीं प्रतीत होता। वह स्त्री अपने शरीरमें आये हुए अपने पतिके आत्मारूप इस गर्भको अपने अङ्गोंकी भाँति ही भोजनके रससे पुष्ट करती है और अन्य सब प्रकारके आवश्यक नियमोंका पालन करके उसकी भलीभाँति रक्षा करती है॥ २ ॥

सा भावयित्री भावयितव्या भवति। तं स्त्री गर्भं बिभर्ति। सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति। स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां संतत्या। एवं संतता हीमे लोकास्तदस्य द्वितीयं जन्म॥ ३ ॥

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

सा=वह; भावयित्री=उस गर्भका पालन-पोषण करनेवाली स्त्री; भावयितव्या=पालन-पोषण करनेयोग्य; भवति=होती है; तम् गर्भम्=उस गर्भको; अग्रे=प्रसवके पहलेतक; स्त्री=स्त्री (माता); बिभर्ति=धारण करती है; जन्मनः अधि=(फिर) जन्म लेनेके बाद; सः=वह (उसका पिता); अग्रे=पहले; एव=ही; कुमारम्=उस कुमारको; (जातकर्म आदि संस्कारोंद्वारा) भावयति=अभ्युदयशील बनाता तथा उसकी उन्नति करता है; सः=वह (पिता); यत्=जो; जन्मनः अधि=जन्म लेनेके बाद; अग्रे [एव]=पहले ही; कुमारम् भावयति=बालककी उन्नति करता है; तत्=वह (मानो); एषाम्=इन; लोकानाम्=लोकोंको (मनुष्योंको); संतत्या=बढ़ानेके द्वारा; आत्मानम् एव भावयति=अपनी ही उन्नति करता है; हि=क्योंकि; एवम्=इसी प्रकार; इमे=ये सब; लोकाः=लोक (मनुष्य); संतताः=विस्तारको प्राप्त हुए हैं; तत्=वह; अस्य=इसका; द्वितीयम्=दूसरा; जन्म=जन्म है ॥ ३ ॥

व्याख्या—अपने पतिके आत्मस्वरूप उस गर्भकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाली गर्भिणी स्त्री घरके लोगोंद्वारा और विशेषतः उसके पतिद्वारा पालन-पोषण करनेयोग्य होती है। अर्थात् घरके लोगोंका और पतिका यह परम आवश्यक कर्तव्य है कि वे सब मिलकर उसके खान-पान और रहन-सहनकी सुव्यवस्था करके सब प्रकारसे उसकी सँभाल रखें। उस गर्भको पहले अर्थात् प्रसव होनेतक तो स्त्री (माता) अपने शरीरमें धारण करती है; फिर जन्म लेनेके बाद—जन्म लेते ही उसका पिता जातकर्म आदि संस्कारोंसे और नाना प्रकारके उपचारोंसे उस कुमारको अभ्युदयशील बनाता है और जन्मसे लेकर जबतक वह सर्वथा योग्य नहीं बन जाता, तबतक हर प्रकारसे उसका पालन-पोषण करता है—नाना प्रकारकी विद्या और शिल्पादिका अध्ययन कराके उसे सब प्रकारसे उन्नत बनाता है। वह पिता जन्मके बाद उस बालकको उपयुक्त बना देनेके पहले-पहले जो उसकी रक्षा करता है, उसे सब प्रकारसे योग्य बनाता है, वह मानो इन लोकोंको अर्थात् मनुष्योंकी

खण्ड १ ]

ऐतरेयोपनिषद्

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परम्पराको बढानेके द्वारा अपनी ही रक्षा करता है; क्योंकि इसी प्रकार एक-से-एक उत्पन्न होकर ये सब मनुष्य विस्तारको प्राप्त हुए हैं। यह जो इस जीवका गर्भसे बाहर आकर बालकरूपमें उत्पन्न होना है, वह इसका दूसरा जन्म है।

इस वर्णनसे पिता और पुत्र दोनोंको अपने-अपने कर्तव्यकी शिक्षा दी गयी है। पुत्रको तो यह समझना चाहिये कि उसपर अपने माता-पिताका बड़ा भारी उपकार है; अतः वह उनकी जितनी सेवा कर सके, थोड़ी है और पिताको इस प्रकारका अभिमान नहीं करना चाहिये कि मैंने इसका उपकार किया है, वरं यह समझना चाहिये कि मैंने अपनी ही वृद्धि करके अपने कर्तव्यका पालन किया है॥ ३ ॥

सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः प्रतिधीयते। अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति। स इतः प्रयत्रेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म ॥ ४ ॥

सः =वह (पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ); अयम् =यह; आत्मा =(पिताका ही) आत्मा; अस्य =इस पिताके (द्वारा आचरणीय); पुण्येभ्यः =शुभकर्मके लिये; प्रतिधीयते =उसका प्रतिनिधि बना दिया जाता है; अथ =उसके अनन्तर; अस्य =इस (पुत्र) का; अयम् =यह (पितारूप); इतरः =दूसरा; आत्मा =आत्मा; कृतकृत्यः =अपना कर्तव्य पूरा करके; वयोगतः =आयु पूरी होनेपर; प्रैति =मरकर (यहाँसे) चला जाता है; सः =वह; इतः =यहाँसे; प्रयन् =जाकर; एव =ही; पुनः =पुनः; जायते =उत्पन्न हो जाता है; तत् =वह; अस्य =इसका; तृतीयम् =तीसरा; जन्म =जन्म है॥ ४ ॥

व्याख्या —पूर्वोक्त प्रकारसे इस पिताका ही आत्मस्वरूप पुत्र जब कार्य करनेयोग्य हो जाता है, तब वह पिता उसको अपना प्रतिनिधि बना देता है—अग्निहोत्र, देवपूजा और अतिथि-सेवा आदि वैदिक और लौकिक जितने भी शुभकर्म हैं, उन सबका भार पुत्रको सौंप देता है। गृहस्थका पूरा दायित्व

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

पुत्रपर छोड़कर स्वयं कृतकृत्य हो जाता है अर्थात् अपनेको पितृ-ऋणसे मुक्त मानता है। उसके बाद इस शरीरकी आयु पूर्ण होनेपर जब वह (पिता) इसे छोड़कर यहाँसे विदा हो जाता है, तब यहाँसे जाकर दूसरी जगह कर्मानुसार जहाँ जिस योनिमें जन्म लेता है, वह इसका तीसरा जन्म है। इसी तरह यह जन्म-जन्मान्तरकी परम्परा चलती रहती है।

जबतक जन्म-मृत्युके महान् कष्टका विचार करके इससे छुटकारा पानेके लिये जीवात्मा मनुष्य-शरीरमें चेष्टा नहीं करता, तबतक यह परम्परा नहीं टूटती। अतः इसके लिये मनुष्यको अवश्य चेष्टा करनी चाहिये। यही इस प्रकरणका उद्देश्य प्रतीत होता है ॥४॥

सम्बन्ध —इस प्रकार बार-बार जन्म लेना और मरना एक भयानक यन्त्रणा है; और जबतक यह जीव इस रहस्यको समझकर इस शरीररूप पिंजरेको काटकर इससे सर्वथा अलग न हो जायगा तबतक इसका इस जन्म-मृत्युरूप यन्त्रणासे छुटकारा नहीं होगा—यह भाव अगले दो मन्त्रोंमें वामदेव ऋषिके दृष्टान्तसे समझाया जाता है—

तदुक्तमृषिणा—

गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा । शतं मा पुर आयसीररक्षत्रधः श्येनो जवसा निरदीयमिति । गर्भ एवैतच्छ्यानो वामदेव एवमुवाच ॥ ५ ॥*

तत्=वही बात (इस प्रकार); ऋषिणा=ऋषिद्वारा; उत्कम्=कही गयी है; नु=अहो; अहम्=मैंने; गर्भे=गर्भमें; सन्=रहते हुए ही; एषाम्=इन; देवानाम्=देवताओंके; विश्वा=बहुत-से; जनिमानि=जन्मोंको; अन्ववेदम्=भलीभाँति जान लिया; अधः=तत्त्वज्ञान होनेसे पूर्व; मा=मुझे; शतम्=सैकड़ों; आयसीः=लोहेके समान कठोर; पुरः=शरीरोंने; अरक्षन्=अवरुद्ध कर रखा था; (अब मैं) श्येनः=बाज पक्षी (की भाँति); जवसा=वेगसे; निरदीयम् इति=उन सबको तोड़कर उनसे अलग हो गया हूँ;

  • यह मन्त्र ऋग्वेद (४।२७।१) में है।

खण्ड १ ]

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गर्भ एव=गर्भमें ही; शयानः=सोये हुए; वामदेवः=वामदेव ऋषिने; एवम्=उक्त प्रकारसे; एतत्=यह बात; उवाच=कही ॥ ५ ॥

व्याख्या —उपर्युक्त चार मन्त्रोंमें कही हुई बातका ही रहस्य यहाँ ऋषिद्वारा बताया गया है। गर्भमें रहते हुए ही अर्थात् गर्भके बाहर आनेसे पहले ही वामदेव ऋषिको यथार्थ ज्ञान हो गया था, इसलिये उन्होंने माताके उदरमें ही कहा था—‘अहो! कितने आश्चर्य और आनन्दकी बात है कि गर्भमें रहते-रहते ही मैंने इन अन्तःकरण और इन्द्रियरूप देवताओंके अनेक जन्मोंका रहस्य भलीभाँति जान लिया। अर्थात् मैं इस बातको जान गया कि ये जन्म आदि वास्तवमें इन अन्तःकरण और इन्द्रियोंके ही होते हैं, आत्माके नहीं। इस रहस्यको समझनेसे पहले मुझे सैकड़ों लोहेके समान कठोर शरीररूपी पिंजरोने अवरुद्ध कर रखा था। उनमें मेरी ऐसी दृढ़ अहंता हो गयी थी कि उससे छूटना मेरे लिये कठिन हो रहा था। अब मैं बाज पक्षीकी भाँति ज्ञानरूप बलके वेगसे उन सबको तोड़कर उनसे अलग हो गया हूँ। उन शरीररूप पिंजरोँसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं रहा, मैं सदाके लिये उन शरीरोंकी अहंतासे मुक्त हो गया हूँ’ ॥ ५ ॥

स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्वं उक्तम्यामुष्विन् स्वर्गे लोके सर्वांक्रामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत् ॥ ६ ॥

एवम्=इस प्रकार; विद्वान्=(जन्म-जन्मान्तरके रहस्यको) जाननेवाला; सः=वह वामदेव ऋषि; अस्मात्=इस; शरीरभेदात्=शरीरका नाश होनेपर; ऊर्ध्वः उक्तम्य=संसारके ऊपर उठ गया और ऊर्ध्वगतिके द्वारा; अमुष्विन्=उस; स्वर्गे लोके=परमधाममें (पहुँचकर); सर्वांन्=समस्त; क्रामान्=क्रामानाओंको; आप्त्वा=प्राप्त करके; अमृतः=अमृत; समभवत्=हो गया; समभवत्=हो गया ॥ ६ ॥

व्याख्या —इस प्रकार जन्म-जन्मान्तरके तत्त्वको जाननेवाला अर्थात् जबतक यह जीव इन शरीरोंके साथ एक हुआ रहता है, शरीरको ही अपना स्वरूप माने रहता है, तबतक इसका जन्म-मृत्युसे छुटकारा नहीं होता, इसको

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

बार-बार नाना योनियोंमें जन्म लेकर नाना प्रकारके कष्ट भोगने पड़ते हैं— इस रहस्यको समझनेवाला वह ज्ञानी वामदेव ऋषि गर्भसे बाहर आकर अन्तमें शरीरका नाश होनेपर संसारसे ऊपर उठ गया तथा ऊर्ध्वगतिके द्वारा भगवान्के परमधाममें पहुँचकर वहाँ समस्त कामनाओंको पाकर अर्थात् सर्वथा आसकाम होकर अमृत हो गया! अमृत हो गया। जन्म-मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट गया। ‘समभवत्’ पदको दुहराकर यहाँ अध्यायकी समाप्तिको सूचित किया गया है ॥ ६ ॥

॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥

॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥

✥ ✥ ✥

तृतीय अध्याय

प्रथम खण्ड

क्रोडयमात्मेति वयमुपास्महे। कतरः स आत्मा, येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ॥ १ ॥

वयम्=हमलोग; उपास्महे=जिसकी उपासना करते हैं; [ सः ]=वह; अयम्=यह; आत्मा=आत्मा; कः इति=कौन है; वा=अथवा; येन=जिससे; पश्यति=मनुष्य देखता है; वा=या; येन=जिससे; शृणोति=सुनता है; वा=अथवा; येन=जिससे; गन्धान्=गन्धोंको; आजिघ्रति=सूँघता है; वा=अथवा; येन=जिससे; वाचम्=वाणीको; व्याकरोति=स्पष्ट बोलता है; वा=या; येन=जिससे; स्वादु=स्वादयुक्त; च=और; अस्वादु=स्वादहीन वस्तुको; च=भी; विजानाति=अलग-अलग जानता है; सः=वह; आत्मा=आत्मा; कतरः=(पिछले अध्यायोंमें कहे हुए दो आत्माओंमेंसे) कौन है* ॥ १ ॥

व्याख्या—इस उपनिषद्के पहले और दूसरे अध्यायोंमें दो आत्माओंका वर्णन आया है—एक तो वह आत्मा (परमात्मा), जिसने इस सृष्टिकी रचना की और सजीव पुरुषको प्रकट करके उसका सहयोग देनेके लिये स्वयं उनमें प्रविष्ट हुआ; दूसरा वह आत्मा (जीवात्मा), जिसको सजीव पुरुषरूपमें परमात्माने प्रकट किया था और जिसके जन्म-जन्मान्तरकी परम्पराका वर्णन दूसरे अध्यायमें गर्भमें आनेसे लेकर मरणपर्यन्त किया गया है। इनमेंसे उपास्य देव कौन है, वह कैसा है, उसकी क्या पहचान है—इन बातोंका निर्णय करनेके लिये यह तीसरा अध्याय कहा गया है।

  • केनोपनिषद्के आरम्भकी इसके साथ बहुत अंशोंमें समानता है।

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ३ ]

मन्त्रका तात्पर्य यह है कि उस उपास्यदेव परमात्माके तत्त्वको जाननेकी इच्छावाले कुछ मनुष्य आपसमें विचार करने लगे—‘जिसकी हमलोग उपासना करते हैं अर्थात् जिसकी उपासना करके हमें उसे प्राप्त करना चाहिये, वह आत्मा कौन है? दूसरे शब्दोंमें जिसके सहयोगसे मनुष्य नेत्रोंके द्वारा समस्त दृश्य देखाता है, जिससे कानोंद्वारा शब्द सुनता है, जिससे प्राणेंद्रियके द्वारा नाना प्रकारकी गन्ध स्रुंघता है, जिससे वाणीद्वारा वचन बोलता है; जिससे रसनाद्वारा स्वादयुक्त और स्वादहीन वस्तुको अलग-अलग पहचान लेता है, वह पहले और दूसरे अध्यायमें वर्णित दो आत्माओंमेंसे कौन है? ॥ १ ॥

यदेतद्ब्रूदयं मनश्चैतत्। संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धूर्तिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥ २ ॥

यत्=जो; एतत्=यह; हृदयम्=हृदय है; एतत्=यही; मनः=मन; च=भी है; संज्ञानम्=सम्यक् ज्ञान-शक्ति; आज्ञानम्=आज्ञा देनेकी शक्ति; विज्ञानम्=विभिन्न रूपसे जाननेकी शक्ति; प्रज्ञानम्=तत्काल जाननेकी शक्ति; मेधा=धारण करनेकी शक्ति; दृष्टिः=देखनेकी शक्ति; धृतिः=धैर्य; मतिः=बुद्धि; मनीषा=मनन-शक्ति; जूतिः=वेग; स्मृतिः=स्मरण-शक्ति; संकल्पः=संकल्प-शक्ति; क्रतुः=मनोरथ-शक्ति; असुः=प्राण-शक्ति; कामः=कामना-शक्ति; वशः=स्त्री-संस्पर्ग आदिकी अभिलाषा; इति=इस प्रकार; एतानि=ये; सर्वाणि=सब-के-सब; प्रज्ञानस्य=स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्माके; एव=ही; नामधेयानि=नाम अर्थात् उसकी सत्ताके बोधक लक्षण; भवन्ति=हैं ॥ २ ॥

व्याख्या—इस प्रकार विचार उपस्थित करके उन्होंने सोचा कि जो यह हृदय अर्थात् अन्तःकरण है, यही पहले बताया हुआ मन है, इस मनकी जो यह सम्यक् प्रकारसे जाननेकी शक्ति देखनेमें आती है—अर्थात् जो दूसरोंपर आज्ञाद्वारा शासन करनेकी शक्ति, पदार्थका अलग-अलग विवेचन करके जाननेकी शक्ति, देखे-सुने हुए पदार्थोंको तत्काल समझ लेनेकी शक्ति,

खण्ड १ ]

ऐतरेयोपनिषद्

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अनुभवको धारण करनेकी शक्ति, देखनेकी शक्ति, धैर्य अर्थात् विचलित न होनेकी शक्ति, बुद्धि अर्थात् निश्चय करनेकी शक्ति, मनन करनेकी शक्ति, वेग अर्थात् क्षणभरमें कहीं-से-कहीं चले जानेकी शक्ति, स्मरण-शक्ति, संकल्प-शक्ति, मनोरथ-शक्ति, प्राण-शक्ति, कामना-शक्ति और स्त्री-सहवास आदिकी अभिलाषा—इस प्रकार जो ये शक्तियाँ हैं, वे सब-की-सब उस स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्माके नाम हैं अर्थात् उसकी सत्ताका बोध करानेवाले लक्षण हैं; इन सबको देखकर इन सबके रचयिता, संचालक और रक्षककी सर्वव्यापिनी सत्ताका ज्ञान होता है॥ २॥

एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतीर्षीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्रा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥ ३ ॥

एषः=यह; ब्रह्म=ब्रह्मा है; एषः=यह; इन्द्रः=इन्द्र है; एषः=यही; प्रजापतिः=प्रजापति है; एते=ये; सर्वे=समस्त; देवाः=देवता; च=तथा; इमानि=ये; पृथिवी=पृथ्वी; वायुः=वायु; आकाशः=आकाश; आपः=जल; (और) ज्योतीर्षि=तेज; इति=इस प्रकार; एतानि=ये; पञ्च=पाँच; महाभूतानि=महाभूत; च=तथा; इमानि=ये; क्षुद्रमिश्राणि इव=छोटे-छोटे, मिले हुए-से; बीजानि=बीजरूप समस्त प्राणी; च=और; इतराणि=इनसे भिन्न; इतराणि=दूसरे; च=भी; अण्डजानि=अंडेसे उत्पन्न होनेवाले; च=एवं; जारुजानि=जेरसे उत्पन्न होनेवाले; च=तथा; स्वेदजानि=पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले; च=और; उद्भिज्जानि=जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले; च=तथा; अश्राः=घोड़े; गावः=गायें; हस्तिनः=हाथी; पुरुषाः=मनुष्य (ये सब-के-सब मिलकर); यत् किम् च=जो कुछ भी; इदम्=यह जगत् है; यत् च=जो भी कोई; पतत्रि=पोंखोंवाला; च=और; जङ्गमम्=चलने-फिरनेवाला; च=और; स्थावरम्=नहीं चलनेवाला;

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ३ ]

प्राणि=प्राणिसमुदाय है; तत् सर्वम्=वह सब; प्रज्ञानेत्रम्=प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्यमें समर्थ होनेवाले हैं (और); प्रज्ञाने=उस प्रज्ञानस्वरूप परमात्मामें ही; प्रतिष्ठितम्=स्थित हैं; लोकः=(यह समस्त) ब्रह्माण्ड; प्रज्ञानेत्रः=प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे ही ज्ञान-शक्तियुक्त है; प्रज्ञा=प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही; प्रतिष्ठा=इस स्थितिका आधार है; प्रज्ञानम्=यह प्रज्ञान ही; ब्रह्म=ब्रह्म है॥३॥

व्याख्या —इस प्रकार विचार करके उन्होंने निश्चय किया कि सबको उत्पन्न करके सब प्रकारकी शक्ति प्रदान करनेवाले और उनकी रक्षा करनेवाले स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही उपास्यदेव हैं। ये ही ब्रह्म हैं, ये ही पहले अध्यायमें वर्णित इन्द्र हैं। ये ही सबकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले समस्त प्रजाओंके स्वामी प्रजापति हैं। ये सब इन्द्रादि देवता, ये पाँचों महाभूत—जो पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेजके रूपमें प्रकट हैं—तथा ये छोटे-छोटे मिले हुए—से बीजरूपमें स्थित समस्त प्राणी तथा उनसे भिन्न दूसरे भी— अर्थात् अंडेसे उत्पन्न होनेवाले, जेरसे उत्पन्न होनेवाले, पसीनेसे अर्थात् शरीरके मैलसे उत्पन्न होनेवाले और जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले तथा घोड़े, गाय, हाथी, मनुष्य—ये सब मिलकर जो कुछ यह जगत् है; जो भी कोई पंखोंवाले तथा चलने-फिरनेवाले और नहीं चलनेवाले जीवोंके समुदाय हैं—वे सब-के-सब प्राणी प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्यमें समर्थ होते हैं और उन प्रज्ञानस्वरूप परमात्मामें ही स्थित हैं। यह समस्त ब्रह्माण्ड प्रज्ञानस्वरूप परमात्माकी शक्तिसे ही ज्ञान-शक्तियुक्त है। इसकी स्थितिके आधार प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही हैं। अतः जिनको पहले इन्द्र और प्रजापतिके नामसे कहा गया है, जो सबकी रचना और रक्षा करनेवाले तथा सबको सब प्रकारकी शक्ति देनेवाले प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा हैं, वे ही हमारे उपास्यदेव ब्रह्म हैं—यह निश्चय हुआ॥३॥

स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुक्तम्यामुष्विन्स्वर्गं लोके सर्वां कामानाप्लवामृतः समभवत्समभवत्॥४॥

सः=वह; अस्मात्=इस; लोकात्=लोकसे; उक्तम्य=ऊपर उठकर; अमुष्विन्=उस;

खण्ड १ ]

ऐतरेयोपनिषद्

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स्वर्गं लोके=परम धाममें; एतेन=इस; प्रज्ञेन आत्मना=प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके सहित; सर्वात्=सम्पूर्ण; कामान्=दिव्य भोगोंको; आप्त्वा=प्राप्त होकर; अमृतः=अमर; समभवत्=हो गया; समभवत्=हो गया ॥ ४ ॥

व्याख्या —जिसने इस प्रकार प्रज्ञानस्वरूप परमेश्वरको जान लिया, वह इस लोकसे ऊपर उठकर अर्थात् शरीरका त्याग करके उस परमानन्दमय परम धाममें, जिसके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमें वर्णन किया गया है, इस प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके साथ सम्पूर्ण दिव्य अलौकिक भोगरूप परम आनन्दको प्राप्त होकर अमर हो गया अर्थात् सदाके लिये जन्म-मृत्युसे छूट गया। 'समभवत्' (हो गया)—इस वाक्यकी पुनरुक्ति उपनिषद्की समाप्ति सूचित करनेके लिये की गयी है ॥ ४ ॥

॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥

॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥

—✥✥✥— ऋग्वेदीय ऐतरेयोपनिषद् समाप्त

—✥✥✥— शान्तिपाठ

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्नामवतु। तद्वाक्कारमवतु। अवतु मामवतु वक्कारमवतु वक्कारम् ॥

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

इसका अर्थ इस उपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।

—✥✥✥—

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

तैत्तिरीयोपनिषद्

यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीय शाखाके अन्तर्गत तैत्तिरीय आरण्यकका अङ्ग है। तैत्तिरीय आरण्यकके दस अध्याय हैं। उनमेंसे सातवें, आठवें और नवें अध्यायोंको ही तैत्तिरीय उपनिषद् कहा जाता है।

शान्तिपाठ

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्नामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्।

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

इसका अर्थ आगे प्रथम अनुवाकमें दिया गया है।

शीक्षा-वल्ली *

प्रथम अनुवाक

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। ऋतं


  • इस प्रकरणमें दी हुई शिक्षाके अनुसार अपना जीवन बना लेनेवाला मनुष्य इस लोक और परलोकके सर्वोत्तम फलको पा सकता है और ब्रह्मविद्याको ग्रहण करनेमें समर्थ हो जाता है—इस भावको समझानेके लिये इस प्रकरणका नाम शीक्षा-वल्ली रखा गया है।

अनु० १]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३३१

वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्नामवतु। तद्भक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।*

ॐ इस परमेश्वरके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है। नः=हमारे लिये; मित्रः=(दिन और प्राणके अधिष्ठाता) मित्र देवता; शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों (तथा); वरुणः=(रात्रि और अपनानेके अधिष्ठाता) वरुण (भी); शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों; अर्यमा=(चक्षु और सूर्य-मण्डलके अधिष्ठाता) अर्यमा; नः=हमारे लिये; शम् भवतु=कल्याणकारी हों; इन्द्रः=(बल और भुजाओंके अधिष्ठाता) इन्द्र (तथा); बृहस्पतिः=(वाणी और बुद्धिके अधिष्ठाता) बृहस्पति (दोनों); नः=हमारे लिये; शम् [ भवताम् ]=शान्ति प्रदान करनेवाले हों; उरुक्रमः=त्रिविक्रमरूपसे विशाल डगोंवाले; विष्णुः=विष्णु (जो पैरोके अधिष्ठाता है); नः=हमारे लिये; शम् [ भवतु ]=कल्याणकारी हों; ब्रह्मणे=(उपर्युक्त सभी देवताओंके आत्मस्वरूप) ब्रह्मके लिये; नमः=नमस्कार है; वायो=हे वायुदेव; ते=तुम्हारे लिये; नमः=नमस्कार है; त्वम् एव=तुम ही; प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष (प्राणरूपसे प्रतीत होनेवाले); ब्रह्म अस्मि=ब्रह्म हो (इसलिये मैं); त्वाम् एव=तुमको ही; प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष; ब्रह्म=ब्रह्म; वदिष्यामि=कहूँगा; ऋतम्=(तुम ऋतके अधिष्ठाता हो, इसलिये मैं तुम्हें) ऋत नामसे; वदिष्यामि=पुकारूँगा; सत्यम्=(तुम सत्यके अधिष्ठाता हो, अतः मैं तुम्हें) सत्य नामसे; वदिष्यामि=कहूँगा; तत्=वह (सर्वशक्तिमान् परमेश्वर); माम् अवतु=मेरी रक्षा करे; तत्=वह; वक्तारम् अवतु=वक्ताकी अर्थात् आचार्यकी रक्षा करे; अवतु माम्=रक्षा करे मेरी (और); अवतु वक्तारम्=रक्षा करे मेरे आचार्यकी; ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः=भगवान् शान्तिस्वरूप हैं, शान्तिस्वरूप हैं, शान्तिस्वरूप हैं।

व्याख्या —इस प्रथम अनुवाकमें भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता परब्रह्म परमेश्वरकी भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंमें स्तुति करते हुए उनसे प्रार्थना की गयी

  • यह मन्त्र ऋग्वेद १।१०।९, अथर्ववेद १९।९।६ और यजुर्वेद ३६।९ में भी आया है।

३३२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

है। भाव यह है कि समस्त आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक शक्तियोंके रूपमें तथा उनके अधिष्ठाता मित्र, वरुण आदि देवताओंके रूपमें जो सबके आत्मा—अन्तर्यामी परमेश्वर हैं, वे सब प्रकारसे हमारे लिये कल्याणमय हों। हमारी उन्नतिके मार्गमें और अपनी प्राप्तिके मार्गमें किसी प्रकारका विघ्न न आने दें। सबके अन्तर्यामी उन ब्रह्मको हम नमस्कार करते हैं।

इस प्रकार परमात्मासे शान्तिकी प्रार्थना करके सूत्रात्मा प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंमें व्याप्त उन परमेश्वरकी वायुके नामसे स्तुति करते हैं—हे सर्वशक्तिमान् सबके प्राणस्वरूप वायुमय परमेश्वर! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप प्रत्यक्ष ब्रह्म हो, अतः मैं तुम्होंको प्रत्यक्ष ब्रह्मके नामसे पुकारूँगा। मैं ‘ऋत’ नामसे भी तुम्हें पुकारूँगा; क्योंकि सारे प्राणियोंके लिये जो कल्याणकारी नियम है, उस नियमरूप ऋतके तुम्हीं अधिष्ठाता हो। तथा मैं तुम्हें ‘सत्य’ नामसे पुकारा करूँगा; क्योंकि सत्य (यथार्थ भाषण) के अधिष्ठातृ देवता तुम्हीं हो। वे सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वर मुझे सत्-आचरण एवं सत्य-भाषण करनेकी और सत्-विद्याको ग्रहण करनेकी शक्ति प्रदान करके इस जन्म-मरणरूप संसारचक्रसे मेरी रक्षा करें तथा मेरे आचार्यको इन सबका उपदेश देकर सर्वत्र उस सत्यका प्रचार करनेकी शक्ति प्रदान करके उनकी रक्षा करें। यहाँ ‘मेरी रक्षा करें’, ‘वक्ताकी रक्षा करें’—इन वाक्योंको दुबारा कहनेका अभिप्राय शान्तिपाठकी समाप्तिको सूचित करना है।

ओम् शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः —इस प्रकार तीन बार कहनेका भाव यह है कि आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—तीनों प्रकारके विघ्नोंका सर्वथा उपशमन हो जाय। भगवान् शान्तिस्वरूप हैं, अतः उनके स्मरणसे सब प्रकारकी शान्ति निश्चित है।

॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥

अनु० २]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३३३

द्वितीय अनुवाक

शीक्षां व्याख्यास्यामः। वर्णः स्वरः। मात्रा बलम्। साम संतानः। इत्युक्तः शीक्षाध्यायः।

शीक्षाम् व्याख्यास्यामः=अब हम शिक्षाका वर्णन करेंगे; वर्णः=वर्ण; स्वरः=स्वर; मात्राः=मात्रा; बलम्=प्रयत्न; साम=वर्णोंका समवृत्तिसे उच्चारण अथवा गान करनेकी रीति (और); संतानः=संधि; इति=इस प्रकार; शीक्षाध्यायः=वेदके उच्चारणकी शिक्षाका अध्याय; उक्तः=कहा गया।

व्याख्या—इस मन्त्रमें वेदके उच्चारणके नियमोंका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करके उनका संकेतमात्र किया गया है। इससे मालूम होता है कि उस समय जो शिष्य परमात्माकी रहस्यविद्याका जिज्ञासु होता था, वह इन नियमोंको पहलेसे ही पूर्णतया जाननेवाला होता था; अतः उसे सावधान करनेके लिये संकेतमात्र ही यथेष्ट था। इन संकेतोंका भाव यह प्रतीत होता है कि मनुष्यको वैसे तो प्रत्येक शब्दके उच्चारणमें सावधानीके साथ शुद्ध बोलनेका अभ्यास रखना चाहिये। पर यदि लौकिक शब्दोंमें नियमोंका पालन नहीं भी किया जा सके तो कम-से-कम वेदमन्त्रोंका उच्चारण तो अवश्य ही शिक्षाके नियमानुसार होना चाहिये। क, ख आदि व्यञ्जन-वर्णों और अ, आ आदि स्वरवर्णोंका स्पष्ट उच्चारण करना चाहिये। दन्त्य ‘स’ के स्थानमें तालव्य ‘श’ या मूर्धन्य ‘ष’ का उच्चारण नहीं करना चाहिये। ‘व’ के स्थानमें ‘ब’ का उच्चारण नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार अन्य वर्णोंके उच्चारणमें भी विशेष ध्यान रखना चाहिये। इसी प्रकार बोलते समय किस वर्णका किस जगह क्या भाव प्रकट करनेके लिये उच्च स्वरसे उच्चारण करना उचित है, किसका मध्य स्वरसे और किसका निम्न स्वरसे उच्चारण करना उचित है—इस बातका भी पूरा-पूरा ध्यान रखकर यथोचित स्वरसे बोलना चाहिये। वेदमन्त्रोंके उच्चारणमें उदात्त आदि स्वरोंका ध्यान रखना और कहाँ कौन स्वर है—इसका यथार्थ ज्ञान होना विशेष आवश्यक है; क्योंकि मन्त्रोंमें स्वरभेद

३३४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

होनेसे उनका अर्थ बदल जाता है तथा अशुद्ध स्वरका उच्चारण करनेवालेको अनिष्टका भागी होना पड़ता है*। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत—इस प्रकार मात्राओंके भेदोंको भी समझकर यथायोग्य उच्चारण करना चाहिये; क्योंकि ह्रस्वके स्थानमें दीर्घ और दीर्घके स्थानमें ह्रस्व उच्चारण करनेमें अर्थका बहुत अन्तर हो जाता है—जैसे ‘सिता और सीता’। बलका अर्थ है प्रयत्न। वर्णोंके उच्चारणमें उनकी ध्वनिको व्यक्त करनेमें जो प्रयास करना पड़ता है, वही प्रयत्न कहलाता है। प्रयत्न दो प्रकारके होते हैं—आभ्यन्तर और बाह्य। आभ्यन्तरके पाँच और बाह्यके ग्यारह भेद माने गये हैं। स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट, विवृत, ईषद्-विवृत, संवृत—ये आभ्यन्तर प्रयत्न हैं। विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त और स्वरित—ये बाह्य प्रयत्न हैं। उदाहरणके लिये ‘क’ से लेकर ‘म’ तकके अक्षरोंका आभ्यन्तर प्रयत्न स्पृष्ट है; क्योंकि कण्ठ आदि स्थानोंमें प्राणवायुके स्पर्शसे इनका उच्चारण होता है। ‘क’ का बाह्य प्रयत्न विवार, श्वास, अघोष तथा अल्पप्राण है— इस विषयका विशद ज्ञान प्राप्त करनेके लिये व्याकरण देखना चाहिये। वर्णोंका समवृत्तिसे उच्चारण या सामगानकी रीति ही साम है। इसका भी ज्ञान और तदनुसार उच्चारण आवश्यक है। संतानका अर्थ है संहिता—संधि। स्वर, व्यञ्जन, विसर्ग अथवा अनुस्वार आदि अपने परवर्ती वर्णके संयोगसे कहीं-कहीं नूतन रूप धारण कर लेते हैं; इस प्रकार वर्णोंका यह संयोगजनित विकृतिभाव—‘संधि’ कहलाता है। किसी विशेष स्थलमें जहाँ संधि बाधिता होती है, वहाँ वर्णमें विकार नहीं

  • महर्षि पतञ्जलिनै महाभाष्यमें कहा है—

दृष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह।

स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात्॥

अर्थात् स्वर या वर्णको अशुद्धिसे दूषित शब्द ठीक-ठीक प्रयोग न होनेके कारण अभीष्ट अर्थका वाचक नहीं होता। इतना ही नहीं, वह वचनरूपी वज्र यजमानको हानि भी पहुँचाता है। जैसे ‘इन्द्रशत्रु’ शब्दमें स्वरको अशुद्धि हो जानेके कारण ‘वृत्रासुर’ स्वयं ही इन्द्रके हाथसे मारा गया।

अनु० ३ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३३५

आता, अतः उसे 'प्रकृतिभाव' कहते हैं। कहनेका तात्पर्य यह है कि वर्णोंके उच्चारणमें उक्त छहों नियमोंका पालन आवश्यक है।

॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥

तृतीय अनुवाक

सम्बन्ध— अब आचार्य अपने और शिष्यके अभ्युदयकी इच्छा प्रकट करते हुए संहिताविषयक उपासनाविधि आरम्भ करते हैं—

सह नौ यशः। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्। अथातः संहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः। पञ्चस्वधिकरणेषु। अधिलोक-मधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम्। ता महा संहिता इत्याचक्षते। अथाधिलोकम्। पृथिवी पूर्वरूपम्। द्यौ उत्तररूपम्। आकाशः संधिः। वायुः संधानम्। इत्यधिलोकम्।

नौ=हम (आचार्य और शिष्य) दोनोंका; यशः=यश; सह=एक साथ बढे (तथा); सह=एक साथ ही; नौ=हम दोनोंका; ब्रह्मवर्चसम्=ब्रह्मतेज भी बढे; अथ=इस प्रकार शुभ इच्छा प्रकट करनेके अनन्तर; अतः=यहाँसे (हम); अधिलोकम्=लोकोंके विषयमें; अधिज्यौतिषम्=ज्योतियोंके विषयमें; अधिविद्यम्=विद्याके विषयमें; अधिप्रजम्=प्रजाके विषयमें; (और) अध्यात्मम्=शरीरके विषयमें; (इस तरह) पञ्चसु=पाँच; अधिकरणेषु=स्थानोंमें; संहितायाः=संहिताके; उपनिषदम् व्याख्यास्यामः=रहस्यका वर्णन करेंगे; ताः=इन सबको; महासंहिताः=महासंहिता; इति=इस नामसे; आचक्षते=कहते हैं; अथ=उनमेंसे (यह पहली); अधिलोकम्=लोकविषयक संहिता है; पृथिवी=पृथ्वी; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; द्यौः=स्वर्गलोक; उत्तररूपम्=उत्तररूप (परवर्ण) है; आकाशः=आकाश; संधिः=संधि—मेलसे बना हुआ रूप (तथा); वायुः=वायु; संधानम्=दोनोंका संयोजक है; इति=इस प्रकार (यह); अधिलोकम्=लोकविषयक संहिताकी उपासनाविधि पूरी हुई।

३३६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

व्याख्या —इस अनुवाकमें पहले समदर्शी आचार्यके द्वारा अपने लिये और शिष्यके लिये भी यश और तेजकी वृद्धिके उद्देश्यसे शुभ आकाङ्क्षा की गयी है। आचार्यकी अभिलाषा यह है कि हमको तथा हमारे श्रद्धालु और विनयी शिष्यको भी ज्ञान और उपासनासे उपलब्ध होनेवाले यश और ब्रह्मतेजकी प्राप्ति हो। इसके पश्चात् आचार्य संहिताविषयक उपनिषद्की व्याख्या करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उसका निरूपण करते हैं। वर्णोंमें जो संधि होती है, उसको 'संहिता' कहते हैं। वही संहिता-दृष्टि जब व्यापकरूप धारण करके लोक आदिको अपना विषय बनाती है, तब उसे 'महासंहिता' कहते हैं। संहिता या संधि पाँच प्रकारकी होती है, यह प्रसिद्ध है। स्वर, व्यञ्जन, स्वादि, विसर्ग और अनुस्वार—ये ही संधिके अधिष्ठान बननेपर पञ्चसंधिके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। वस्तुतः ये संधिके पाँच आश्रय हैं। इसी प्रकार पूर्वोक्त महासंहिता या महासंधिके भी पाँच आश्रय हैं—लोक, ज्योति, विद्या, प्रजा और आत्मा (शरीर)। तात्पर्य यह कि जैसे वर्णोंमें संधिका दर्शन किया जाता है, उसी प्रकार इन लोक आदिमें भी संहिता-दृष्टि करनी चाहिये। वह किस प्रकार हो, यह बात समझायी जाती है। प्रत्येक संधिके चार भाग होते हैं—पूर्ववर्ण, परवर्ण, दोनोंके मेलसे होनेवाला रूप तथा दोनोंका संयोजक नियम। इसी प्रकार यहाँ जो लोक आदिमें संहिता-दृष्टि बतायी जाती है, उसके भी चार विभाग होंगे—पूर्वरूप, उत्तररूप, संधि (दोनोंके मिलनेसे होनेवाला रूप) और संधान (संयोजक)।

इस मन्त्रमें लोकविषयक संहिता-दृष्टिका निरूपण किया गया है। पृथ्वी अर्थात् यह लोक ही पूर्वरूप है। तात्पर्य यह कि लोकविषयक महासंहितामें पूर्ववर्णके स्थानपर पृथ्वीको देखना चाहिये। इसी प्रकार स्वर्ग ही संहिताका उत्तररूप (परवर्ण) है। आकाश यानी अन्तरिक्ष ही इन दोनोंकी संधि है और वायु इनका संधान (संयोजक) है। जैसे पूर्व और उत्तरवर्ण संधिमें मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार प्राणवायुके द्वारा पूर्ववर्णस्थानीय इस भूतलका प्राणी उत्तरवर्णस्थानीय स्वर्गलोकसे मिलताया जाता है। (सम्बद्ध किया जाता है)—यह भाव हो सकता है।

अनु० ३ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३३७

यहाँ यह अनुमान होता है कि इस वर्णनमें यथेष्ट लोकोंकी प्राप्तिका उपाय बताया गया है; क्योंकि फलश्रुतिमें इस विद्याको जाननेका फल स्वर्गलोकसे सम्बद्ध हो जाना बताया है; परन्तु इस विद्याकी परम्परा नष्ट हो जानेके कारण इस संकेतमात्रके वर्णनसे यह बात समझमें नहीं आती कि किस प्रकार कौन-से लोककी प्राप्ति की जा सकती है। इतना तो समझमें आता है कि लोकोंकी प्राप्तिमें प्राणोंकी प्रधानता है। प्राणोंके द्वारा ही मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्माका प्रत्येक लोकमें गमन होता है—यह बात उपनिषदोंमें जगह-जगह कही गयी है; किंतु यहाँ जो यह कहा गया है कि पृथ्वी पहला वर्ण है और घुल्लोक दूसरा वर्ण है एवं आकाश संधि (इनका संयुक्तरूप) है—इस कथनका क्या भाव है, यह ठीक-ठीक समझमें नहीं आता।

अथाध्व्यौतिषम्। अग्निः पूर्वरूपम्। आदित्य उत्तररूपम्। आपः संधिः। वैद्युतः संधानम्। इत्यध्व्यौतिषम्।

अथ=अब; अध्व्यौतिषम्=ज्योतिविषयक संहिताका वर्णन करते हैं; अग्निः=अग्नि; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; आदित्यः=सूर्य; उत्तररूपम्=उत्तररूप (परवर्ण) है; आपः=जल—मेघ; संधिः=इन दोनोंकी संधि—मेलसे बना हुआ रूप है (और); वैद्युतः=बिजली; (इनका) संधानम्=संधान (जोड़नेका हेतु) है; इति=इस प्रकार; अध्व्यौतिषम्=ज्योतिविषयक संहिता कही गयी।

व्याख्या —अग्नि इस भूतलपर सुलभ है; अतः उसे संहिताका 'पूर्ववर्ण' माना है; और सूर्य घुल्लोकमें—ऊपरके लोकमें प्रकाशित होता है, अतः वह उत्तररूप (परवर्ण) बताया गया है। इन दोनोंसे उत्पन्न होनेके कारण मेघ ही संधि है तथा विद्युत्-शक्ति ही संधिकी हेतु (संधान) बतायी गयी है।

इस मन्त्रमें ज्योतिविषयक संहिताका वर्णन करके ज्योतियोंके संयोगसे नाना प्रकारके भौतिक पदार्थोंकी विभिन्न अभिव्यक्तियोंके विज्ञानका रहस्य समझाया गया है। उन ज्योतियोंके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाले भोग्य पदार्थोंको जलका नाम दिया गया है और उन सबकी उत्पत्तिमें बिजलीको संयोजक