ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 331, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३२९
स्वर्गं लोके=परम धाममें; एतेन=इस; प्रज्ञेन आत्मना=प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके सहित; सर्वात्=सम्पूर्ण; कामान्=दिव्य भोगोंको; आप्त्वा=प्राप्त होकर; अमृतः=अमर; समभवत्=हो गया; समभवत्=हो गया ॥ ४ ॥
व्याख्या —जिसने इस प्रकार प्रज्ञानस्वरूप परमेश्वरको जान लिया, वह इस लोकसे ऊपर उठकर अर्थात् शरीरका त्याग करके उस परमानन्दमय परम धाममें, जिसके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमें वर्णन किया गया है, इस प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके साथ सम्पूर्ण दिव्य अलौकिक भोगरूप परम आनन्दको प्राप्त होकर अमर हो गया अर्थात् सदाके लिये जन्म-मृत्युसे छूट गया। 'समभवत्' (हो गया)—इस वाक्यकी पुनरुक्ति उपनिषद्की समाप्ति सूचित करनेके लिये की गयी है ॥ ४ ॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥
—✥✥✥— ऋग्वेदीय ऐतरेयोपनिषद् समाप्त
—✥✥✥— शान्तिपाठ
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्नामवतु। तद्वाक्कारमवतु। अवतु मामवतु वक्कारमवतु वक्कारम् ॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
इसका अर्थ इस उपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।
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