ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 330, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
प्राणि=प्राणिसमुदाय है; तत् सर्वम्=वह सब; प्रज्ञानेत्रम्=प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्यमें समर्थ होनेवाले हैं (और); प्रज्ञाने=उस प्रज्ञानस्वरूप परमात्मामें ही; प्रतिष्ठितम्=स्थित हैं; लोकः=(यह समस्त) ब्रह्माण्ड; प्रज्ञानेत्रः=प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे ही ज्ञान-शक्तियुक्त है; प्रज्ञा=प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही; प्रतिष्ठा=इस स्थितिका आधार है; प्रज्ञानम्=यह प्रज्ञान ही; ब्रह्म=ब्रह्म है॥३॥
व्याख्या —इस प्रकार विचार करके उन्होंने निश्चय किया कि सबको उत्पन्न करके सब प्रकारकी शक्ति प्रदान करनेवाले और उनकी रक्षा करनेवाले स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही उपास्यदेव हैं। ये ही ब्रह्म हैं, ये ही पहले अध्यायमें वर्णित इन्द्र हैं। ये ही सबकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले समस्त प्रजाओंके स्वामी प्रजापति हैं। ये सब इन्द्रादि देवता, ये पाँचों महाभूत—जो पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेजके रूपमें प्रकट हैं—तथा ये छोटे-छोटे मिले हुए—से बीजरूपमें स्थित समस्त प्राणी तथा उनसे भिन्न दूसरे भी— अर्थात् अंडेसे उत्पन्न होनेवाले, जेरसे उत्पन्न होनेवाले, पसीनेसे अर्थात् शरीरके मैलसे उत्पन्न होनेवाले और जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले तथा घोड़े, गाय, हाथी, मनुष्य—ये सब मिलकर जो कुछ यह जगत् है; जो भी कोई पंखोंवाले तथा चलने-फिरनेवाले और नहीं चलनेवाले जीवोंके समुदाय हैं—वे सब-के-सब प्राणी प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्यमें समर्थ होते हैं और उन प्रज्ञानस्वरूप परमात्मामें ही स्थित हैं। यह समस्त ब्रह्माण्ड प्रज्ञानस्वरूप परमात्माकी शक्तिसे ही ज्ञान-शक्तियुक्त है। इसकी स्थितिके आधार प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही हैं। अतः जिनको पहले इन्द्र और प्रजापतिके नामसे कहा गया है, जो सबकी रचना और रक्षा करनेवाले तथा सबको सब प्रकारकी शक्ति देनेवाले प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा हैं, वे ही हमारे उपास्यदेव ब्रह्म हैं—यह निश्चय हुआ॥३॥
स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुक्तम्यामुष्विन्स्वर्गं लोके सर्वां कामानाप्लवामृतः समभवत्समभवत्॥४॥
सः=वह; अस्मात्=इस; लोकात्=लोकसे; उक्तम्य=ऊपर उठकर; अमुष्विन्=उस;