ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३२८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ३ ]
प्राणि=प्राणिसमुदाय है; तत् सर्वम्=वह सब; प्रज्ञानेत्रम्=प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्यमें समर्थ होनेवाले हैं (और); प्रज्ञाने=उस प्रज्ञानस्वरूप परमात्मामें ही; प्रतिष्ठितम्=स्थित हैं; लोकः=(यह समस्त) ब्रह्माण्ड; प्रज्ञानेत्रः=प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे ही ज्ञान-शक्तियुक्त है; प्रज्ञा=प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही; प्रतिष्ठा=इस स्थितिका आधार है; प्रज्ञानम्=यह प्रज्ञान ही; ब्रह्म=ब्रह्म है॥३॥
व्याख्या —इस प्रकार विचार करके उन्होंने निश्चय किया कि सबको उत्पन्न करके सब प्रकारकी शक्ति प्रदान करनेवाले और उनकी रक्षा करनेवाले स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही उपास्यदेव हैं। ये ही ब्रह्म हैं, ये ही पहले अध्यायमें वर्णित इन्द्र हैं। ये ही सबकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले समस्त प्रजाओंके स्वामी प्रजापति हैं। ये सब इन्द्रादि देवता, ये पाँचों महाभूत—जो पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेजके रूपमें प्रकट हैं—तथा ये छोटे-छोटे मिले हुए—से बीजरूपमें स्थित समस्त प्राणी तथा उनसे भिन्न दूसरे भी— अर्थात् अंडेसे उत्पन्न होनेवाले, जेरसे उत्पन्न होनेवाले, पसीनेसे अर्थात् शरीरके मैलसे उत्पन्न होनेवाले और जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले तथा घोड़े, गाय, हाथी, मनुष्य—ये सब मिलकर जो कुछ यह जगत् है; जो भी कोई पंखोंवाले तथा चलने-फिरनेवाले और नहीं चलनेवाले जीवोंके समुदाय हैं—वे सब-के-सब प्राणी प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्यमें समर्थ होते हैं और उन प्रज्ञानस्वरूप परमात्मामें ही स्थित हैं। यह समस्त ब्रह्माण्ड प्रज्ञानस्वरूप परमात्माकी शक्तिसे ही ज्ञान-शक्तियुक्त है। इसकी स्थितिके आधार प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही हैं। अतः जिनको पहले इन्द्र और प्रजापतिके नामसे कहा गया है, जो सबकी रचना और रक्षा करनेवाले तथा सबको सब प्रकारकी शक्ति देनेवाले प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा हैं, वे ही हमारे उपास्यदेव ब्रह्म हैं—यह निश्चय हुआ॥३॥
स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुक्तम्यामुष्विन्स्वर्गं लोके सर्वां कामानाप्लवामृतः समभवत्समभवत्॥४॥
सः=वह; अस्मात्=इस; लोकात्=लोकसे; उक्तम्य=ऊपर उठकर; अमुष्विन्=उस;
खण्ड १ ]
ऐतरेयोपनिषद्
३२९
स्वर्गं लोके=परम धाममें; एतेन=इस; प्रज्ञेन आत्मना=प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके सहित; सर्वात्=सम्पूर्ण; कामान्=दिव्य भोगोंको; आप्त्वा=प्राप्त होकर; अमृतः=अमर; समभवत्=हो गया; समभवत्=हो गया ॥ ४ ॥
व्याख्या —जिसने इस प्रकार प्रज्ञानस्वरूप परमेश्वरको जान लिया, वह इस लोकसे ऊपर उठकर अर्थात् शरीरका त्याग करके उस परमानन्दमय परम धाममें, जिसके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमें वर्णन किया गया है, इस प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके साथ सम्पूर्ण दिव्य अलौकिक भोगरूप परम आनन्दको प्राप्त होकर अमर हो गया अर्थात् सदाके लिये जन्म-मृत्युसे छूट गया। 'समभवत्' (हो गया)—इस वाक्यकी पुनरुक्ति उपनिषद्की समाप्ति सूचित करनेके लिये की गयी है ॥ ४ ॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥
—✥✥✥— ऋग्वेदीय ऐतरेयोपनिषद् समाप्त
—✥✥✥— शान्तिपाठ
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्नामवतु। तद्वाक्कारमवतु। अवतु मामवतु वक्कारमवतु वक्कारम् ॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
इसका अर्थ इस उपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।
—✥✥✥—
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
तैत्तिरीयोपनिषद्
यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीय शाखाके अन्तर्गत तैत्तिरीय आरण्यकका अङ्ग है। तैत्तिरीय आरण्यकके दस अध्याय हैं। उनमेंसे सातवें, आठवें और नवें अध्यायोंको ही तैत्तिरीय उपनिषद् कहा जाता है।
शान्तिपाठ
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्नामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्।
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
इसका अर्थ आगे प्रथम अनुवाकमें दिया गया है।
शीक्षा-वल्ली *
प्रथम अनुवाक
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। ऋतं
- इस प्रकरणमें दी हुई शिक्षाके अनुसार अपना जीवन बना लेनेवाला मनुष्य इस लोक और परलोकके सर्वोत्तम फलको पा सकता है और ब्रह्मविद्याको ग्रहण करनेमें समर्थ हो जाता है—इस भावको समझानेके लिये इस प्रकरणका नाम शीक्षा-वल्ली रखा गया है।
अनु० १]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३३१
वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्नामवतु। तद्भक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।*
ॐ इस परमेश्वरके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है। नः=हमारे लिये; मित्रः=(दिन और प्राणके अधिष्ठाता) मित्र देवता; शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों (तथा); वरुणः=(रात्रि और अपनानेके अधिष्ठाता) वरुण (भी); शम् [ भवतु ]=कल्याणप्रद हों; अर्यमा=(चक्षु और सूर्य-मण्डलके अधिष्ठाता) अर्यमा; नः=हमारे लिये; शम् भवतु=कल्याणकारी हों; इन्द्रः=(बल और भुजाओंके अधिष्ठाता) इन्द्र (तथा); बृहस्पतिः=(वाणी और बुद्धिके अधिष्ठाता) बृहस्पति (दोनों); नः=हमारे लिये; शम् [ भवताम् ]=शान्ति प्रदान करनेवाले हों; उरुक्रमः=त्रिविक्रमरूपसे विशाल डगोंवाले; विष्णुः=विष्णु (जो पैरोके अधिष्ठाता है); नः=हमारे लिये; शम् [ भवतु ]=कल्याणकारी हों; ब्रह्मणे=(उपर्युक्त सभी देवताओंके आत्मस्वरूप) ब्रह्मके लिये; नमः=नमस्कार है; वायो=हे वायुदेव; ते=तुम्हारे लिये; नमः=नमस्कार है; त्वम् एव=तुम ही; प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष (प्राणरूपसे प्रतीत होनेवाले); ब्रह्म अस्मि=ब्रह्म हो (इसलिये मैं); त्वाम् एव=तुमको ही; प्रत्यक्षम्=प्रत्यक्ष; ब्रह्म=ब्रह्म; वदिष्यामि=कहूँगा; ऋतम्=(तुम ऋतके अधिष्ठाता हो, इसलिये मैं तुम्हें) ऋत नामसे; वदिष्यामि=पुकारूँगा; सत्यम्=(तुम सत्यके अधिष्ठाता हो, अतः मैं तुम्हें) सत्य नामसे; वदिष्यामि=कहूँगा; तत्=वह (सर्वशक्तिमान् परमेश्वर); माम् अवतु=मेरी रक्षा करे; तत्=वह; वक्तारम् अवतु=वक्ताकी अर्थात् आचार्यकी रक्षा करे; अवतु माम्=रक्षा करे मेरी (और); अवतु वक्तारम्=रक्षा करे मेरे आचार्यकी; ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः=भगवान् शान्तिस्वरूप हैं, शान्तिस्वरूप हैं, शान्तिस्वरूप हैं।
व्याख्या —इस प्रथम अनुवाकमें भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता परब्रह्म परमेश्वरकी भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंमें स्तुति करते हुए उनसे प्रार्थना की गयी
- यह मन्त्र ऋग्वेद १।१०।९, अथर्ववेद १९।९।६ और यजुर्वेद ३६।९ में भी आया है।
३३२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
है। भाव यह है कि समस्त आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक शक्तियोंके रूपमें तथा उनके अधिष्ठाता मित्र, वरुण आदि देवताओंके रूपमें जो सबके आत्मा—अन्तर्यामी परमेश्वर हैं, वे सब प्रकारसे हमारे लिये कल्याणमय हों। हमारी उन्नतिके मार्गमें और अपनी प्राप्तिके मार्गमें किसी प्रकारका विघ्न न आने दें। सबके अन्तर्यामी उन ब्रह्मको हम नमस्कार करते हैं।
इस प्रकार परमात्मासे शान्तिकी प्रार्थना करके सूत्रात्मा प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंमें व्याप्त उन परमेश्वरकी वायुके नामसे स्तुति करते हैं—हे सर्वशक्तिमान् सबके प्राणस्वरूप वायुमय परमेश्वर! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप प्रत्यक्ष ब्रह्म हो, अतः मैं तुम्होंको प्रत्यक्ष ब्रह्मके नामसे पुकारूँगा। मैं ‘ऋत’ नामसे भी तुम्हें पुकारूँगा; क्योंकि सारे प्राणियोंके लिये जो कल्याणकारी नियम है, उस नियमरूप ऋतके तुम्हीं अधिष्ठाता हो। तथा मैं तुम्हें ‘सत्य’ नामसे पुकारा करूँगा; क्योंकि सत्य (यथार्थ भाषण) के अधिष्ठातृ देवता तुम्हीं हो। वे सर्वव्यापी अन्तर्यामी परमेश्वर मुझे सत्-आचरण एवं सत्य-भाषण करनेकी और सत्-विद्याको ग्रहण करनेकी शक्ति प्रदान करके इस जन्म-मरणरूप संसारचक्रसे मेरी रक्षा करें तथा मेरे आचार्यको इन सबका उपदेश देकर सर्वत्र उस सत्यका प्रचार करनेकी शक्ति प्रदान करके उनकी रक्षा करें। यहाँ ‘मेरी रक्षा करें’, ‘वक्ताकी रक्षा करें’—इन वाक्योंको दुबारा कहनेका अभिप्राय शान्तिपाठकी समाप्तिको सूचित करना है।
ओम् शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः —इस प्रकार तीन बार कहनेका भाव यह है कि आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—तीनों प्रकारके विघ्नोंका सर्वथा उपशमन हो जाय। भगवान् शान्तिस्वरूप हैं, अतः उनके स्मरणसे सब प्रकारकी शान्ति निश्चित है।
॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥
अनु० २]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३३३
द्वितीय अनुवाक
शीक्षां व्याख्यास्यामः। वर्णः स्वरः। मात्रा बलम्। साम संतानः। इत्युक्तः शीक्षाध्यायः।
शीक्षाम् व्याख्यास्यामः=अब हम शिक्षाका वर्णन करेंगे; वर्णः=वर्ण; स्वरः=स्वर; मात्राः=मात्रा; बलम्=प्रयत्न; साम=वर्णोंका समवृत्तिसे उच्चारण अथवा गान करनेकी रीति (और); संतानः=संधि; इति=इस प्रकार; शीक्षाध्यायः=वेदके उच्चारणकी शिक्षाका अध्याय; उक्तः=कहा गया।
व्याख्या—इस मन्त्रमें वेदके उच्चारणके नियमोंका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करके उनका संकेतमात्र किया गया है। इससे मालूम होता है कि उस समय जो शिष्य परमात्माकी रहस्यविद्याका जिज्ञासु होता था, वह इन नियमोंको पहलेसे ही पूर्णतया जाननेवाला होता था; अतः उसे सावधान करनेके लिये संकेतमात्र ही यथेष्ट था। इन संकेतोंका भाव यह प्रतीत होता है कि मनुष्यको वैसे तो प्रत्येक शब्दके उच्चारणमें सावधानीके साथ शुद्ध बोलनेका अभ्यास रखना चाहिये। पर यदि लौकिक शब्दोंमें नियमोंका पालन नहीं भी किया जा सके तो कम-से-कम वेदमन्त्रोंका उच्चारण तो अवश्य ही शिक्षाके नियमानुसार होना चाहिये। क, ख आदि व्यञ्जन-वर्णों और अ, आ आदि स्वरवर्णोंका स्पष्ट उच्चारण करना चाहिये। दन्त्य ‘स’ के स्थानमें तालव्य ‘श’ या मूर्धन्य ‘ष’ का उच्चारण नहीं करना चाहिये। ‘व’ के स्थानमें ‘ब’ का उच्चारण नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार अन्य वर्णोंके उच्चारणमें भी विशेष ध्यान रखना चाहिये। इसी प्रकार बोलते समय किस वर्णका किस जगह क्या भाव प्रकट करनेके लिये उच्च स्वरसे उच्चारण करना उचित है, किसका मध्य स्वरसे और किसका निम्न स्वरसे उच्चारण करना उचित है—इस बातका भी पूरा-पूरा ध्यान रखकर यथोचित स्वरसे बोलना चाहिये। वेदमन्त्रोंके उच्चारणमें उदात्त आदि स्वरोंका ध्यान रखना और कहाँ कौन स्वर है—इसका यथार्थ ज्ञान होना विशेष आवश्यक है; क्योंकि मन्त्रोंमें स्वरभेद
३३४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
होनेसे उनका अर्थ बदल जाता है तथा अशुद्ध स्वरका उच्चारण करनेवालेको अनिष्टका भागी होना पड़ता है*। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत—इस प्रकार मात्राओंके भेदोंको भी समझकर यथायोग्य उच्चारण करना चाहिये; क्योंकि ह्रस्वके स्थानमें दीर्घ और दीर्घके स्थानमें ह्रस्व उच्चारण करनेमें अर्थका बहुत अन्तर हो जाता है—जैसे ‘सिता और सीता’। बलका अर्थ है प्रयत्न। वर्णोंके उच्चारणमें उनकी ध्वनिको व्यक्त करनेमें जो प्रयास करना पड़ता है, वही प्रयत्न कहलाता है। प्रयत्न दो प्रकारके होते हैं—आभ्यन्तर और बाह्य। आभ्यन्तरके पाँच और बाह्यके ग्यारह भेद माने गये हैं। स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट, विवृत, ईषद्-विवृत, संवृत—ये आभ्यन्तर प्रयत्न हैं। विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त और स्वरित—ये बाह्य प्रयत्न हैं। उदाहरणके लिये ‘क’ से लेकर ‘म’ तकके अक्षरोंका आभ्यन्तर प्रयत्न स्पृष्ट है; क्योंकि कण्ठ आदि स्थानोंमें प्राणवायुके स्पर्शसे इनका उच्चारण होता है। ‘क’ का बाह्य प्रयत्न विवार, श्वास, अघोष तथा अल्पप्राण है— इस विषयका विशद ज्ञान प्राप्त करनेके लिये व्याकरण देखना चाहिये। वर्णोंका समवृत्तिसे उच्चारण या सामगानकी रीति ही साम है। इसका भी ज्ञान और तदनुसार उच्चारण आवश्यक है। संतानका अर्थ है संहिता—संधि। स्वर, व्यञ्जन, विसर्ग अथवा अनुस्वार आदि अपने परवर्ती वर्णके संयोगसे कहीं-कहीं नूतन रूप धारण कर लेते हैं; इस प्रकार वर्णोंका यह संयोगजनित विकृतिभाव—‘संधि’ कहलाता है। किसी विशेष स्थलमें जहाँ संधि बाधिता होती है, वहाँ वर्णमें विकार नहीं
- महर्षि पतञ्जलिनै महाभाष्यमें कहा है—
दृष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात्॥
अर्थात् स्वर या वर्णको अशुद्धिसे दूषित शब्द ठीक-ठीक प्रयोग न होनेके कारण अभीष्ट अर्थका वाचक नहीं होता। इतना ही नहीं, वह वचनरूपी वज्र यजमानको हानि भी पहुँचाता है। जैसे ‘इन्द्रशत्रु’ शब्दमें स्वरको अशुद्धि हो जानेके कारण ‘वृत्रासुर’ स्वयं ही इन्द्रके हाथसे मारा गया।
अनु० ३ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३३५
आता, अतः उसे 'प्रकृतिभाव' कहते हैं। कहनेका तात्पर्य यह है कि वर्णोंके उच्चारणमें उक्त छहों नियमोंका पालन आवश्यक है।
॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय अनुवाक
सम्बन्ध— अब आचार्य अपने और शिष्यके अभ्युदयकी इच्छा प्रकट करते हुए संहिताविषयक उपासनाविधि आरम्भ करते हैं—
सह नौ यशः। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्। अथातः संहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः। पञ्चस्वधिकरणेषु। अधिलोक-मधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम्। ता महा संहिता इत्याचक्षते। अथाधिलोकम्। पृथिवी पूर्वरूपम्। द्यौ उत्तररूपम्। आकाशः संधिः। वायुः संधानम्। इत्यधिलोकम्।
नौ=हम (आचार्य और शिष्य) दोनोंका; यशः=यश; सह=एक साथ बढे (तथा); सह=एक साथ ही; नौ=हम दोनोंका; ब्रह्मवर्चसम्=ब्रह्मतेज भी बढे; अथ=इस प्रकार शुभ इच्छा प्रकट करनेके अनन्तर; अतः=यहाँसे (हम); अधिलोकम्=लोकोंके विषयमें; अधिज्यौतिषम्=ज्योतियोंके विषयमें; अधिविद्यम्=विद्याके विषयमें; अधिप्रजम्=प्रजाके विषयमें; (और) अध्यात्मम्=शरीरके विषयमें; (इस तरह) पञ्चसु=पाँच; अधिकरणेषु=स्थानोंमें; संहितायाः=संहिताके; उपनिषदम् व्याख्यास्यामः=रहस्यका वर्णन करेंगे; ताः=इन सबको; महासंहिताः=महासंहिता; इति=इस नामसे; आचक्षते=कहते हैं; अथ=उनमेंसे (यह पहली); अधिलोकम्=लोकविषयक संहिता है; पृथिवी=पृथ्वी; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; द्यौः=स्वर्गलोक; उत्तररूपम्=उत्तररूप (परवर्ण) है; आकाशः=आकाश; संधिः=संधि—मेलसे बना हुआ रूप (तथा); वायुः=वायु; संधानम्=दोनोंका संयोजक है; इति=इस प्रकार (यह); अधिलोकम्=लोकविषयक संहिताकी उपासनाविधि पूरी हुई।
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
व्याख्या —इस अनुवाकमें पहले समदर्शी आचार्यके द्वारा अपने लिये और शिष्यके लिये भी यश और तेजकी वृद्धिके उद्देश्यसे शुभ आकाङ्क्षा की गयी है। आचार्यकी अभिलाषा यह है कि हमको तथा हमारे श्रद्धालु और विनयी शिष्यको भी ज्ञान और उपासनासे उपलब्ध होनेवाले यश और ब्रह्मतेजकी प्राप्ति हो। इसके पश्चात् आचार्य संहिताविषयक उपनिषद्की व्याख्या करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उसका निरूपण करते हैं। वर्णोंमें जो संधि होती है, उसको 'संहिता' कहते हैं। वही संहिता-दृष्टि जब व्यापकरूप धारण करके लोक आदिको अपना विषय बनाती है, तब उसे 'महासंहिता' कहते हैं। संहिता या संधि पाँच प्रकारकी होती है, यह प्रसिद्ध है। स्वर, व्यञ्जन, स्वादि, विसर्ग और अनुस्वार—ये ही संधिके अधिष्ठान बननेपर पञ्चसंधिके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। वस्तुतः ये संधिके पाँच आश्रय हैं। इसी प्रकार पूर्वोक्त महासंहिता या महासंधिके भी पाँच आश्रय हैं—लोक, ज्योति, विद्या, प्रजा और आत्मा (शरीर)। तात्पर्य यह कि जैसे वर्णोंमें संधिका दर्शन किया जाता है, उसी प्रकार इन लोक आदिमें भी संहिता-दृष्टि करनी चाहिये। वह किस प्रकार हो, यह बात समझायी जाती है। प्रत्येक संधिके चार भाग होते हैं—पूर्ववर्ण, परवर्ण, दोनोंके मेलसे होनेवाला रूप तथा दोनोंका संयोजक नियम। इसी प्रकार यहाँ जो लोक आदिमें संहिता-दृष्टि बतायी जाती है, उसके भी चार विभाग होंगे—पूर्वरूप, उत्तररूप, संधि (दोनोंके मिलनेसे होनेवाला रूप) और संधान (संयोजक)।
इस मन्त्रमें लोकविषयक संहिता-दृष्टिका निरूपण किया गया है। पृथ्वी अर्थात् यह लोक ही पूर्वरूप है। तात्पर्य यह कि लोकविषयक महासंहितामें पूर्ववर्णके स्थानपर पृथ्वीको देखना चाहिये। इसी प्रकार स्वर्ग ही संहिताका उत्तररूप (परवर्ण) है। आकाश यानी अन्तरिक्ष ही इन दोनोंकी संधि है और वायु इनका संधान (संयोजक) है। जैसे पूर्व और उत्तरवर्ण संधिमें मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार प्राणवायुके द्वारा पूर्ववर्णस्थानीय इस भूतलका प्राणी उत्तरवर्णस्थानीय स्वर्गलोकसे मिलताया जाता है। (सम्बद्ध किया जाता है)—यह भाव हो सकता है।
अनु० ३ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३३७
यहाँ यह अनुमान होता है कि इस वर्णनमें यथेष्ट लोकोंकी प्राप्तिका उपाय बताया गया है; क्योंकि फलश्रुतिमें इस विद्याको जाननेका फल स्वर्गलोकसे सम्बद्ध हो जाना बताया है; परन्तु इस विद्याकी परम्परा नष्ट हो जानेके कारण इस संकेतमात्रके वर्णनसे यह बात समझमें नहीं आती कि किस प्रकार कौन-से लोककी प्राप्ति की जा सकती है। इतना तो समझमें आता है कि लोकोंकी प्राप्तिमें प्राणोंकी प्रधानता है। प्राणोंके द्वारा ही मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्माका प्रत्येक लोकमें गमन होता है—यह बात उपनिषदोंमें जगह-जगह कही गयी है; किंतु यहाँ जो यह कहा गया है कि पृथ्वी पहला वर्ण है और घुल्लोक दूसरा वर्ण है एवं आकाश संधि (इनका संयुक्तरूप) है—इस कथनका क्या भाव है, यह ठीक-ठीक समझमें नहीं आता।
अथाध्व्यौतिषम्। अग्निः पूर्वरूपम्। आदित्य उत्तररूपम्। आपः संधिः। वैद्युतः संधानम्। इत्यध्व्यौतिषम्।
अथ=अब; अध्व्यौतिषम्=ज्योतिविषयक संहिताका वर्णन करते हैं; अग्निः=अग्नि; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; आदित्यः=सूर्य; उत्तररूपम्=उत्तररूप (परवर्ण) है; आपः=जल—मेघ; संधिः=इन दोनोंकी संधि—मेलसे बना हुआ रूप है (और); वैद्युतः=बिजली; (इनका) संधानम्=संधान (जोड़नेका हेतु) है; इति=इस प्रकार; अध्व्यौतिषम्=ज्योतिविषयक संहिता कही गयी।
व्याख्या —अग्नि इस भूतलपर सुलभ है; अतः उसे संहिताका 'पूर्ववर्ण' माना है; और सूर्य घुल्लोकमें—ऊपरके लोकमें प्रकाशित होता है, अतः वह उत्तररूप (परवर्ण) बताया गया है। इन दोनोंसे उत्पन्न होनेके कारण मेघ ही संधि है तथा विद्युत्-शक्ति ही संधिकी हेतु (संधान) बतायी गयी है।
इस मन्त्रमें ज्योतिविषयक संहिताका वर्णन करके ज्योतियोंके संयोगसे नाना प्रकारके भौतिक पदार्थोंकी विभिन्न अभिव्यक्तियोंके विज्ञानका रहस्य समझाया गया है। उन ज्योतियोंके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाले भोग्य पदार्थोंको जलका नाम दिया गया है और उन सबकी उत्पत्तिमें बिजलीको संयोजक
३३८
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
बताया गया है, ऐसा अनुमान होता है; क्योंकि आजकलके वैज्ञानिकों भी बिजलीके सम्बन्धसे नाना प्रकारके भौतिक विकास करके दिखाये हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि वेदमें यह भौतिक उन्नतिका साधन भी भलीभाँति बताया गया है; परंतु परम्परा नष्ट हो जानेके कारण उसको समझने और समझानेवाले दुर्लभ हो गये हैं।
अथाधिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् । अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या संधिः । प्रवचनः संधानम् । इत्यधिविद्यम् ।
अथ=अब; अधिविद्यम्=विद्याविषयक संहिताका आरम्भ करते हैं; आचार्यः=गुरु; पूर्वरूपम्=पहला वर्ण है; अन्तेवासी=समीप निवास करनेवाला शिष्य; उत्तररूपम्=दूसरा वर्ण है; विद्या=(दोनोंके मिलनेसे उत्पन्न) विद्या; संधिः=मिला हुआ रूप है; प्रवचनम्=गुरुद्वारा दिया हुआ उपदेश ही; संधानम्=संधिका हेतु है; इति=इस प्रकार (यह); अधिविद्यम्=विद्याविषयक संहिता कही गयी।
व्याख्या —इस मन्त्रमें विद्याके विषयमें संहिता-दृष्टिका उपदेश दिया गया है। इसके द्वारा विद्याप्राप्तिका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि जिस प्रकार वर्णोंकी संधिमें एक पूर्ववर्ण और एक परवर्ण होता है, उसी प्रकार यहाँ विद्यारूप संहितामें गुरु तो मानो पूर्ववर्ण है और श्रद्धा-भक्तिपूर्वक गुरुकी सेवा करनेवाला विद्याभिलाषी शिष्य परवर्ण है; तथा संधिमें दो वर्णोंके मिलनेपर जैसे एक तीसरा नया वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार गुरु और शिष्यके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाली विद्या—ज्ञान ही यहाँ संधि है। इस विद्यारूप संधिके प्रकट होनेका कारण है—प्रवचन अर्थात् गुरुका उपदेश देना और शिष्यद्वारा उसको श्रद्धापूर्वक सुन-समझकर धारण करना—यही संधान है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर विद्वान् गुरुकी सेवा करता है, वह अवश्य ही विद्या प्राप्त करके विद्वान् हो जाता है।
अथाधिप्रजम् । माता पूर्वरूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजा संधिः । प्रजननः संधानम् । इत्यधिप्रजम् ।
अनु० ३ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३३९
अथ=अब; अधिप्रजम्=प्रजाविषयक संहिता कहते हैं; माता=माता; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; पिता=पिता; उत्तररूपम्=उत्तररूप (परवर्ण) है; प्रजा=(उन दोनोंके मेलसे उत्पन्न) संतान; संधि:=संधि है (तथा); प्रजननम्=प्रजनन (संतानोत्पत्तिके अनुकूल व्यापार); संधानम्=संधान (संधिका कारण) है; इति=इस प्रकार (यह); अधिप्रजम्=प्रजाविषयक संहिता कही गयी।
व्याख्या —इस मन्त्रमें संहिताके रूपमें प्रजाका वर्णन करके संतानप्राप्तिका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि इस प्रजाविषयक संहितामें माता तो मानो पूर्ववर्ण है और पिता परवर्ण है। जिस प्रकार दोनों वर्णोंकी संधिसे एक नया वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार माता-पिताके संयोगसे उत्पन्न होनेवाली संतान ही इस संहितामें दोनोंकी संधि (संयुक्तस्वरूप) है। तथा माता और पिताका जो ऋतुकालमें शास्त्रविधिके अनुसार यथोचित नियमपूर्वक संतानोत्पत्तिके उद्देश्यसे सहवास करना है, यही संधान (संतानोत्पत्तिका कारण) है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर संतानोत्पत्तिके उद्देश्यसे ऋतुकालमें धर्मयुक्त स्त्रीसहवास करता है, वह अवश्य ही अपनी इच्छाके अनुसार श्रेष्ठ संतान प्राप्त कर लेता है।
अथाध्यात्मम्। अधरा हनुः पूर्वरूपम्। उत्तरा हनुः उत्तररूपम्। वाक् संधिः। जिह्वा संधानम्। इत्यध्यात्मम्।
अथ=अब; अध्यात्मम्=आत्मविषयक संहिताका वर्णन करते हैं; अधरा हनुः=नीचेका जबड़ा; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; उत्तरा हनुः=ऊपरका जबड़ा; उत्तररूपम्=दूसरा रूप (परवर्ण) है; वाक्=(दोनोंके मिलनेसे उत्पन्न) वाणी; संधि:=संधि है (और); जिह्वा=जिह्वा; संधानम्=संधान (वाणीरूप संधिको उत्पत्तिका कारण) है; इति=इस प्रकार (यह); अध्यात्मम्=आत्मविषयक संहिता कही गयी।
व्याख्या —इस मन्त्रमें शरीरविषयक संहिता-दृष्टिका उपदेश किया गया है। शरीरमें प्रधान अङ्ग मुख है, अतः मुखके ही अवयवोंमें संहिताका विभाग
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
दिखाया गया है। तात्पर्य यह कि नीचेका जबड़ा मानो संहिताका पूर्ववर्ण है, ऊपरका जबड़ा परवर्ण है; इन दोनोंके संयोगसे इनके मध्यभागमें अभिव्यक्त होनेवाली वाणी ही संधि है और जिह्वा ही संधान (वाणीरूप संधिके प्रकट होनेका कारण) है; क्योंकि जिह्वाके बिना मनुष्य कोई भी शब्द नहीं बोल सकता। वाणीमें विलक्षण शक्ति है। वाणीद्वारा प्रार्थना करके मनुष्य शरीरके पोषण और उसे उन्नत करनेकी सभी सामग्री प्राप्त कर सकता है तथा आंकाररूप परमेश्वरके नाम-जपसे परमात्माको भी प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार वाणीमें शारीरिक और आत्मविषयक—दोनों तरहकी उन्नति करनेकी सामर्थ्य भरी हुई है। इस रहस्यको समझकर जो मनुष्य अपनी वाणीका यथायोग्य उपयोग करता है, वह वाक्शक्ति पाकर उसके द्वारा अभीष्ट फल प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाता है।
इतीमा महासः हिता य एवमेता महासः हिता व्याख्याता वेद। संधीयते प्रजया पशुभिः। ब्रह्मवर्चसेनात्राघेन सुवर्गेण लोकेन।
इति=इस प्रकार; इमाः=ये; महासंहिताः=पाँच महासंहिताएँ कही गयी हैं; यः=जो मनुष्य; एवम्=इस प्रकार; एताः=इन; व्याख्याताः=ऊपर बतायी हुई; महासंहिताः=महासंहिताओंको; वेद=जान लेता है; (वह) प्रजया=संतानसे; पशुभिः=पशुओंसे; ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्मतेजसे; अत्राघेन=अन्न आदि भोग्यपदार्थोंसे (और); सुवर्गेण लोकेन=स्वर्गरूप लोकसे; संधीयते=सम्पन्न हो जाता है।
व्याख्या —इस मन्त्रमें पाँच प्रकारसे कही हुई महासंहिताओंके यथार्थ ज्ञानका फल बताया गया है। इनको जाननेवाला अपनी इच्छाके अनुकूल संतान प्राप्त कर सकता है, विद्याके द्वारा ब्रह्मतेजसम्पन्न हो जाता है, अपनी इच्छाके अनुसार नाना प्रकारके पशुओंको और अन्न आदि आवश्यक भोग्यपदार्थोंको प्राप्त कर सकता है। इतना ही नहीं, उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति भी हो जाती है। इनमेंसे लोकविषयक संहिताके ज्ञानसे स्वर्ग आदि उत्तम लोक, ज्योतिविषयक संहिताके ज्ञानसे नाना प्रकारकी भौतिक सामग्री, प्रजाविषयक संधिके ज्ञानसे
अनु० ४ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३४१
संतान, विद्याविषयक संहिताके ज्ञानसे विद्या और ब्रह्मतेज तथा अध्यात्मसंहिताके विज्ञानसे वाक्शक्तिकी प्राप्ति—इस प्रकार पृथक्-पृथक् फल समझना चाहिये। श्रुतिमें समस्त संहिताओंके ज्ञानका सामूहिक फल बतलाया गया है। श्रुति ईश्वरकी वाणी है; अतः इसका रहस्य समझकर ब्रह्मा और विश्वासके साथ उपर्युक्त उपासना करनेसे निस्संदेह वे सभी फल प्राप्त हो सकते हैं, जिनकी चर्चा ऊपर की गयी है।
॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥
चतुर्थ अनुवाक
यश्छन्दसामूषभो विश्वरूपः छन्दोभ्योऽध्मृतात् सम्बभूव। स मेन्द्रो मेधया सृणोतु। अमृतस्य देव धारणो भूयासम्। शरीरं मे विचर्षणम्। जिह्वा मे मधुमत्तमा। कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्। ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः। श्रुतं मे गोपाय।
यः=जो; छन्दसाम्=वेदोंमें; ऋषभः=सर्वश्रेष्ठ है; विश्वरूपः=सर्वरूप है (और); अमृतात्=अमृतस्वरूप; छन्दोभ्यः=वेदोंसे; अधि=प्रधानरूपमें; सम्बभूव=प्रकट हुआ है; सः=वह (ओंकारस्वरूप); इन्द्रः=सबका स्वामी (परमेश्वर); मा=मुझे; मेधया=धारणायुक्त बुद्धिसे; सृणोतु=सम्पन्न करे; देव=हे देव! (मैं आपकी कृपासे); अमृतस्य धारणः=अमृतमय परमात्माको (अपने हृदयमें) धारण करनेवाला; भूयासम्=बन जाऊँ; मे=मेरा; शरीरम्=शरीर; विचर्षणम्=विशेष फुर्तीला—सब प्रकारसे रोगरहित हो (और); मे=मेरी; जिह्वा=जिह्वा; मधुमत्तमा=अतिशयमधुमती (मधुरभाषिणी); [ भूतात् ]=हो जाय; कर्णाभ्याम्=(मैं) दोनों कानोंद्वारा; भूरि=अधिक; विश्रुवम्=सुनता रहूँ; (हे प्रणव ! तू) मेधया=लौकिक बुद्धिसे; पिहितः=ढकी हुई; ब्रह्मणः=परमात्माकी; कोशः=निधि; असि=है; (तू) मे=मेरे; श्रुतम् गोपाय=सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर।
३४२
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
व्याख्या —इस चतुर्थ अनुवाकमें ‘मे श्रुतम् गोपाय’ इस वाक्यतक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये आवश्यक बुद्धिबल और शारीरिक बलकी प्राप्तिके उद्देश्यसे परमेश्वरसे उनके नाम ओंकारद्वारा प्रार्थना करनेका प्रकार बताया गया है। भाव यह है कि ‘ओम्’ यह परमेश्वरका नाम वेदोंक जितने भी मन्त्र हैं, उन सबमें श्रेष्ठ है और सर्वरूप है; क्योंकि प्रत्येक मन्त्रके आदिमें ओंकारका उच्चारण किया जाता है और ओंकारके उच्चारणसे सम्पूर्ण वेदोंके उच्चारणका फल प्राप्त होता है। तथा अविनाशी वेदोंसे यह ओंकार प्रधानरूपमें प्रकट हुआ है। ओंकार नाम है और परमेश्वर नामी; अतः दोनों परस्पर अभिन्न हैं। वे प्रणवरूप परमात्मा सबके परमेश्वर होनेके कारण ‘इन्द्र’ नामसे प्रसिद्ध हैं। वे इन्द्र मुझे मेधासे सम्पन्न करें। ‘धीर्धारणावती मेधा’ इस कोषवाक्यके अनुसार धारणशक्तिसे सम्पन्न बुद्धिका नाम मेधा है। तात्पर्य यह कि परमात्मा मुझे पढ़े और समझे हुए भावोंको धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न करें। हे देव! मैं आपकी अहेतुकी कृपासे आपके अमृतमय स्वरूपको अपने हृदयमें धारण करनेवाला बन जाऊँ। मेरा शरीर रोगरहित रहे, जिससे आपकी उपासनामें किसी प्रकारका विघ्न न पड़े। मेरी जिह्वा अतिशय मधुमती अर्थात् मधुर स्वरसे आपके अत्यन्त मधुर नाम और गुणोंका कीर्तन करके उनके मधुर रसका आस्वाद करनेवाली बन जाय। मैं अपने दोनों कानोंद्वारा कल्याणमय बहुत-से शब्दोंको सुना रहा हूँ, अर्थात् मेरे कानोंमें आचार्यद्वारा वर्णन किये हुए रहस्यको पूर्णतया सुननेकी शक्ति आ जाय और मुझे आपका कल्याणमय यश सुननेको मिलता रहे। हे ओंकार! तू परमेश्वरकी निधि है, अर्थात् वे पूर्णब्रह्म परमेश्वर तुझमें भरे हुए हैं; क्योंकि नामी नामके ही आश्रित रहता है। ऐसा होते हुए भी तू मनुष्योंकी लौकिक बुद्धिसे ढका हुआ है—लौकिक तर्कसे अनुसंधान करनेवालोंकी बुद्धिमें तेरा प्रभाव व्यक्त नहीं होता। हे देव! तू सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर अर्थात् ऐसी कृपा कर कि मुझे जो उपदेश सुननेको मिले, उसे मैं स्मरण रखता हुआ उसके अनुसार अपना जीवन बना सकूँ।
सम्बन्ध —अब ऐश्वर्यकी कामनावालेके लिये हवन करनेके मन्त्रोंका आरम्भ करते हैं—
अनु० ४ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३४३
आवहन्ती वितन्वाना कुर्वाणाचीरमात्मनः। वासाः सि मम गावश्च। अन्नपाने च सर्वदा। ततो मे श्रियमावह। लोमशां पशुभिः सह स्वाहा।
ततः=उसके बाद (अब ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी रीति बताते हैं—हे देव!); [ या श्रीः ]=जो श्री; मम=मेरे; आत्मनः=अपने लिये; अचीरम्=तत्काल ही; वासांसि=नाना प्रकारके वस्त्र; च=और; गावः=गौएँ; च=तथा; अन्नपाने=खाने-पीनेके पदार्थ; सर्वदा=सदैव; आवहन्ती=ला देनेवाली; वितन्वाना=उनका विस्तार करनेवाली; (तथा) कुर्वाणा=उन्हें बनानेवाली है; लोमशाम्=रोएँवाले—भेड़-बकरी आदि; पशुभिः सह=पशुओंके सहित; [ ताम् ] श्रियम्=उस श्रीको; मे=मेरे लिये (तू); आवह=ले आ; स्वाहा=स्वाहा (इसी उद्देश्यसे तुझे यह आहुति समर्पित की जाती है)।
व्याख्या—चतुर्थ अनुवाकके इस उपर्युक्त अंशमें ऐश्वर्यकी कामनावाले सकाम मनुष्योंके लिये, परमेश्वरसे प्रार्थना करते हुए अग्निमें आहुति देनेकी रीति बतायी गयी है। प्रार्थनाका भाव यह है कि 'हे अग्निके अधिष्ठाता परमेश्वर! जो मेरे निजके लिये आवश्यकता होनेपर बिना विलम्ब तत्काल ही नाना प्रकारके वस्त्र, गौएँ और खाने-पीनेकी विविध सामग्री सदैव प्रस्तुत कर दे, उन्हें बढ़ाती रहे तथा उन्हें नवीनरूपसे रच दे, ऐसी श्रीको तू मेरे लिये भेड़-बकरी आदि रोएँवाले एवं अन्य प्रकारके पशुओंसहित ला दे। अर्थात् समस्त भोग-सामग्रीका साधनरूप धन मुझे प्रदान कर।' इस मन्त्रका उच्चारण करके 'स्वाहा' इस शब्दके साथ अग्निमें आहुति देनी चाहिये, यह ऐश्वर्यकी प्राप्तिका साधन है।
सम्बन्ध—आचार्यको ब्रह्मचारियोंके हितार्थ किस प्रकार हवन करना चाहिये, इसकी विधि बतायी जाती है—
आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा।
ब्रह्मचारिणः=ब्रह्मचारीलोग; मा=मेरे पास; आयन्तु=आयें; स्वाहा=स्वाहा
३४४
ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
(इस उद्देश्यसे यह आहुति दी जाती है); ब्रह्मचारिणः =ब्रह्मचारीलोग; विमयन्तु =कपटशून्य हों; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः =ब्रह्मचारीलोग; प्रमायन्तु =प्रमाणिक ज्ञानको ग्रहण करनेवाले हों; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः =ब्रह्मचारीलोग; दमायन्तु =इन्द्रियोंका दमन करनेवाले हों; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः =ब्रह्मचारीलोग; शमायन्तु =मनको वशमें करनेवाले हों; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है)।
व्याख्या —चतुर्थ अनुवाकके इस अंशमें शिष्योंके हितार्थ आचार्यको जिन मन्त्रोंद्वारा हवन करना चाहिये, उनका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि आचार्य 'उत्तम' ब्रह्मचारीलोग मेरे पास विद्या पढ़नेके लिये आयें, इस उद्देश्यसे मन्त्र पढ़कर 'स्वाहा' शब्दके साथ पहली आहुति दे; 'मेरे ब्रह्मचारी कपटशून्य हों' इस उद्देश्यसे मन्त्र पढ़कर 'स्वाहा' शब्दके साथ दूसरी आहुति दे; 'ब्रह्मचारीलोग उत्तम ज्ञानको ग्रहण करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ तीसरी आहुति दे; 'ब्रह्मचारीलोग इन्द्रियोंका दमन करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ चौथी आहुति दे तथा 'ब्रह्मचारीलोग मनको वशमें करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ पाँचवीं आहुति दे।
सम्बन्ध —आचार्यको अपने लौकिक और पारलौकिक हितके लिये किस प्रकार हवन करना चाहिये, इसकी विधि बतायी जाती है—
यशो जनेऽसानि स्वाहा। श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा। तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा। स मा भग प्रविश स्वाहा। तस्मिन् सहस्त्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा।
जने =लोगोंमें (मैं); यशः =यशस्वी; असानि =होऊँ; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); वस्यसः =महान् धनवानोंकी अपेक्षा भी; श्रेयान् =अधिक धनवान्; असानि =हो जाऊँ; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); भग =हे भगवन्!; तम् त्वा =उस आपमें; प्रविशानि =मैं प्रविष्ट हो जाऊँ; स्वाहा =स्वाहा (इस
अनु० ४ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३४५
उद्देश्यसे यह आहुति है); भग=हे भगवन्!; सः=वह (तु); मा=मुझमें; प्रविश=प्रविष्ट हो जा; स्वाहा=स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); भग=हे भगवन्!; तस्मिन्=उस; सहस्त्रशरणे=हजारों शाखावाले; त्वधि=आपमें; (ध्यानद्वारा निमग्न होकर) अहम्=मैं; निमूज्जे=अपनेको विशुद्ध कर लूँ; स्वाहा=स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है)।
व्याख्या —चतुर्थ अनुवाकके इस अंशमें आचार्यको अपने हितके लिये जिन मन्त्रोंद्वारा हवन करना चाहिये, उनका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि 'लोगोंमें मैं यशस्वी बन्तूँ, जगत्में मेरा यश-सौरभ सर्वत्र फैल जाय, मुझसे कोई भी ऐसा आचरण न बने, जो मेरे यशमें धब्बा लगानेवाला हो, इस उद्देश्यसे 'यशो जनेऽसानि' इस मन्त्रका उच्चारण करके 'स्वाहा' शब्दके साथ पहली आहुति डालनी चाहिये। 'महान् धनवानोंकी अपेक्षा भी मैं अधिक सम्पत्तिशाली बन जाऊँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ दूसरी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! आपके उस दिव्य स्वरूपमें मैं प्रविष्ट हो जाऊँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ तीसरी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! वह आपका दिव्य स्वरूप मुझमें प्रविष्ट हो जाय—मेरे मनमें बस जाय' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ चौथी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! हजारों शाखावाले आपके उस दिव्यरूपमें ध्यानद्वारा निमग्न होकर मैं अपने-आपको विशुद्ध बना लूँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ पाँचवीं आहुति अग्निमें डालनी चाहिये।
यथाऽऽपः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम्। एवं मां ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा। प्रतिवेशोऽसि प्र मा भाहि प्र मा पद्यस्व॥
यथा=जिस प्रकार; आपः=(नदी आदिके) जल; प्रवता=निम्नस्थानसे होकर; यन्ति=समुद्रमें चले जाते हैं; यथा=जिस प्रकार; मासाः=महीने; अहर्जरम्=दिनोंका अन्त करनेवाले संवत्सररूप कालमें; [ यन्ति ]=चले जाते हैं; धातः=हे विधाता!;
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
एवम्=इसी प्रकार; माम्=मेरे पास; सर्वतः=सब ओरसे; ब्रह्मचारिणः=ब्रह्मचारीलोग; आयन्तु=आयें; स्वाहा=स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); प्रतिवेशः=(तू) सबका विश्राम स्थान; अस्मि=है; मा=मेरे लिये; प्रभाहि=अपनेको प्रकाशित कर; मा=मुझे; प्रपद्यस्व=प्राप्त हो जा।
व्याख्या— ‘जिस प्रकार समस्त जल-प्रवाह नीचेकी ओर बहते हुए समुद्रमें मिल जाते हैं तथा जिस प्रकार महीने दिनोंका अन्त करनेवाले संवत्सररूप कालमें जा रहे हैं, हे विधाता! उसी प्रकार मेरे पास सब ओरसे ब्रह्मचारीलोग आयें और मैं उनको विद्याभ्यास कराकर तथा कल्याणका उपदेश देकर अपने कर्तव्यका एवं आपकी आज्ञाका पालन करता रहूँ।’ इस उद्देश्यसे मनोच्चारण करके ‘स्वाहा’ शब्दके साथ छठी आहुति अग्रिममें डालनी चाहिये। ‘हे परमात्मन्। आप सबके विश्राम-स्थान हैं, अब मेरे लिये अपने दिव्य स्वरूपको प्रकाशित कर दीजिये और मुझे प्राप्त हो जाइये’ इस उद्देश्यसे मनोच्चारणपूर्वक ‘स्वाहा’ शब्दके साथ सातवीं आहुति अग्रिममें डाले।
इस प्रकार इस चौथे अनुवाकमें इस लोक और परलोककी उन्नतिका उपाय परमात्माकी प्रार्थना और उसके साथ-साथ हवनको बताया गया है। प्रकरण बड़ा ही सुन्दर और श्रेयस्कर है। अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको इसमें बताये हुए प्रकारसे अपने लिये जिस अंशकी आवश्यकता प्रतीत हो, उस अंशके अनुसार अनुष्ठान आरम्भ कर देना चाहिये।
॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥
पञ्चम अनुवाक
भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्त्रो व्याहतयः। तासामु ह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते। मह इति। तद्ब्रह्म। स आत्मा। अज्ञान्यन्या देवताः। भूरिति वा अयं लोकः। भुव इत्यन्तरिक्षम्। सुवरित्यसौ लोकः। मह इत्यादित्यः। आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते।
अनु० ५ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
३४७
भूः=भूः; भुवः=भुवः; सुवः=स्वः; इति=इस प्रकार; एताः=ये; वै=प्रसिद्ध; तिस्रः=तीन; व्याहतयः=व्याहतियाँ हैं; तासाम् उ=उन तीनोंकी अपेक्षासे; चतुर्थीम्=जो चौथी व्याहति; महः इति='मह' इस नामसे; ह=प्रसिद्ध है; एताम्=इसको; माहाचमस्यः=माहाचमसके पुत्रने; प्रवेदयते स्म=सबसे पहले जाना था; तत्=वह चौथी व्याहति ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; सः=वह; आत्मा=(ऊपर कही हुई व्याहतियोंका) आत्मा है; अन्धाः=अन्ध; देवताः=सब देवता; अङ्गनिः=(उसके) अङ्ग हैं; भूः='भूः'; इति=यह व्याहति; वै=ही; अयम् लोकः=यह पृथ्वीलोक है; भुवः='भुवः'; इति=यह; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्ष-लोक है; सुवः='स्वः'; इति=यह; असौ लोकः=वह प्रसिद्ध स्वर्गलोक है; महः='महः'; इति=यह; आदित्यः=आदित्य—सूर्य है; आदित्येन=(क्योंकि) आदित्यसे; वावः=ही; सर्वे=समस्त; लोकाः=लोक; महीयन्ते=महिमान्वित होते हैं।
व्याख्या —इस पञ्चम अनुवाकमें भूः, भुवः, स्वः और महः—इन चारों व्याहतियोंकी उपासनाका रहस्य बताकर उसके फलका वर्णन किया गया है। पहले तो इसमें यह बात कही गयी है कि भूः, भुवः और स्वः—ये तीन व्याहतियाँ तो प्रसिद्ध हैं; परंतु इनके अतिरिक्त जो चौथी व्याहति 'महः' है, इसकी उपासनाका रहस्य सबसे पहले माहाचमसके पुत्रने जाना था। भाव यह है कि इन चारों व्याहतियोंको चार प्रकारसे प्रयोग करके उपासना करनेकी विधि, जो आगे बतायी गयी है, तभीसे प्रचलित हुई है। इसके बाद उन चार व्याहतियोंमें किस प्रकारकी भावना करके उपासना करनी चाहिये, यह समझाया गया है। इन चारों व्याहतियोंमें 'महः' यह चौथी व्याहति सर्वप्रधान है। अतः उपास्य देवोंमें 'महः' व्याहतिको ब्रह्मका स्वरूप समझना चाहिये—यह भाव समझानेके लिये कहा गया है कि वह चौथी व्याहति 'महः' ब्रह्मका नाम होनेसे ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्म सबके आत्मा हैं, सर्वरूप हैं और अन्य सब देवता उनके अङ्ग हैं; अतः जिस किसी भी देवताकी इन व्याहतियोंके द्वारा उपासना की जाय, उसमें इस बातको नहीं भूलना चाहिये कि यह सर्वरूप परमेश्वरकी ही उपासना है। सब देवता उन्हींके अङ्ग होनेसे अन्य देवोंकी उपासना भी उन्हींकी उपासना है।