ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
बताया गया है, ऐसा अनुमान होता है; क्योंकि आजकलके वैज्ञानिकों भी बिजलीके सम्बन्धसे नाना प्रकारके भौतिक विकास करके दिखाये हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि वेदमें यह भौतिक उन्नतिका साधन भी भलीभाँति बताया गया है; परंतु परम्परा नष्ट हो जानेके कारण उसको समझने और समझानेवाले दुर्लभ हो गये हैं।
अथाधिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् । अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या संधिः । प्रवचनः संधानम् । इत्यधिविद्यम् ।
अथ=अब; अधिविद्यम्=विद्याविषयक संहिताका आरम्भ करते हैं; आचार्यः=गुरु; पूर्वरूपम्=पहला वर्ण है; अन्तेवासी=समीप निवास करनेवाला शिष्य; उत्तररूपम्=दूसरा वर्ण है; विद्या=(दोनोंके मिलनेसे उत्पन्न) विद्या; संधिः=मिला हुआ रूप है; प्रवचनम्=गुरुद्वारा दिया हुआ उपदेश ही; संधानम्=संधिका हेतु है; इति=इस प्रकार (यह); अधिविद्यम्=विद्याविषयक संहिता कही गयी।
व्याख्या —इस मन्त्रमें विद्याके विषयमें संहिता-दृष्टिका उपदेश दिया गया है। इसके द्वारा विद्याप्राप्तिका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि जिस प्रकार वर्णोंकी संधिमें एक पूर्ववर्ण और एक परवर्ण होता है, उसी प्रकार यहाँ विद्यारूप संहितामें गुरु तो मानो पूर्ववर्ण है और श्रद्धा-भक्तिपूर्वक गुरुकी सेवा करनेवाला विद्याभिलाषी शिष्य परवर्ण है; तथा संधिमें दो वर्णोंके मिलनेपर जैसे एक तीसरा नया वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार गुरु और शिष्यके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाली विद्या—ज्ञान ही यहाँ संधि है। इस विद्यारूप संधिके प्रकट होनेका कारण है—प्रवचन अर्थात् गुरुका उपदेश देना और शिष्यद्वारा उसको श्रद्धापूर्वक सुन-समझकर धारण करना—यही संधान है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर विद्वान् गुरुकी सेवा करता है, वह अवश्य ही विद्या प्राप्त करके विद्वान् हो जाता है।
अथाधिप्रजम् । माता पूर्वरूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजा संधिः । प्रजननः संधानम् । इत्यधिप्रजम् ।