ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 341, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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अथ=अब; अधिप्रजम्=प्रजाविषयक संहिता कहते हैं; माता=माता; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; पिता=पिता; उत्तररूपम्=उत्तररूप (परवर्ण) है; प्रजा=(उन दोनोंके मेलसे उत्पन्न) संतान; संधि:=संधि है (तथा); प्रजननम्=प्रजनन (संतानोत्पत्तिके अनुकूल व्यापार); संधानम्=संधान (संधिका कारण) है; इति=इस प्रकार (यह); अधिप्रजम्=प्रजाविषयक संहिता कही गयी।
व्याख्या —इस मन्त्रमें संहिताके रूपमें प्रजाका वर्णन करके संतानप्राप्तिका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि इस प्रजाविषयक संहितामें माता तो मानो पूर्ववर्ण है और पिता परवर्ण है। जिस प्रकार दोनों वर्णोंकी संधिसे एक नया वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार माता-पिताके संयोगसे उत्पन्न होनेवाली संतान ही इस संहितामें दोनोंकी संधि (संयुक्तस्वरूप) है। तथा माता और पिताका जो ऋतुकालमें शास्त्रविधिके अनुसार यथोचित नियमपूर्वक संतानोत्पत्तिके उद्देश्यसे सहवास करना है, यही संधान (संतानोत्पत्तिका कारण) है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर संतानोत्पत्तिके उद्देश्यसे ऋतुकालमें धर्मयुक्त स्त्रीसहवास करता है, वह अवश्य ही अपनी इच्छाके अनुसार श्रेष्ठ संतान प्राप्त कर लेता है।
अथाध्यात्मम्। अधरा हनुः पूर्वरूपम्। उत्तरा हनुः उत्तररूपम्। वाक् संधिः। जिह्वा संधानम्। इत्यध्यात्मम्।
अथ=अब; अध्यात्मम्=आत्मविषयक संहिताका वर्णन करते हैं; अधरा हनुः=नीचेका जबड़ा; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; उत्तरा हनुः=ऊपरका जबड़ा; उत्तररूपम्=दूसरा रूप (परवर्ण) है; वाक्=(दोनोंके मिलनेसे उत्पन्न) वाणी; संधि:=संधि है (और); जिह्वा=जिह्वा; संधानम्=संधान (वाणीरूप संधिको उत्पत्तिका कारण) है; इति=इस प्रकार (यह); अध्यात्मम्=आत्मविषयक संहिता कही गयी।
व्याख्या —इस मन्त्रमें शरीरविषयक संहिता-दृष्टिका उपदेश किया गया है। शरीरमें प्रधान अङ्ग मुख है, अतः मुखके ही अवयवोंमें संहिताका विभाग