ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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यहाँ यह अनुमान होता है कि इस वर्णनमें यथेष्ट लोकोंकी प्राप्तिका उपाय बताया गया है; क्योंकि फलश्रुतिमें इस विद्याको जाननेका फल स्वर्गलोकसे सम्बद्ध हो जाना बताया है; परन्तु इस विद्याकी परम्परा नष्ट हो जानेके कारण इस संकेतमात्रके वर्णनसे यह बात समझमें नहीं आती कि किस प्रकार कौन-से लोककी प्राप्ति की जा सकती है। इतना तो समझमें आता है कि लोकोंकी प्राप्तिमें प्राणोंकी प्रधानता है। प्राणोंके द्वारा ही मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्माका प्रत्येक लोकमें गमन होता है—यह बात उपनिषदोंमें जगह-जगह कही गयी है; किंतु यहाँ जो यह कहा गया है कि पृथ्वी पहला वर्ण है और घुल्लोक दूसरा वर्ण है एवं आकाश संधि (इनका संयुक्तरूप) है—इस कथनका क्या भाव है, यह ठीक-ठीक समझमें नहीं आता।
अथाध्व्यौतिषम्। अग्निः पूर्वरूपम्। आदित्य उत्तररूपम्। आपः संधिः। वैद्युतः संधानम्। इत्यध्व्यौतिषम्।
अथ=अब; अध्व्यौतिषम्=ज्योतिविषयक संहिताका वर्णन करते हैं; अग्निः=अग्नि; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; आदित्यः=सूर्य; उत्तररूपम्=उत्तररूप (परवर्ण) है; आपः=जल—मेघ; संधिः=इन दोनोंकी संधि—मेलसे बना हुआ रूप है (और); वैद्युतः=बिजली; (इनका) संधानम्=संधान (जोड़नेका हेतु) है; इति=इस प्रकार; अध्व्यौतिषम्=ज्योतिविषयक संहिता कही गयी।
व्याख्या —अग्नि इस भूतलपर सुलभ है; अतः उसे संहिताका 'पूर्ववर्ण' माना है; और सूर्य घुल्लोकमें—ऊपरके लोकमें प्रकाशित होता है, अतः वह उत्तररूप (परवर्ण) बताया गया है। इन दोनोंसे उत्पन्न होनेके कारण मेघ ही संधि है तथा विद्युत्-शक्ति ही संधिकी हेतु (संधान) बतायी गयी है।
इस मन्त्रमें ज्योतिविषयक संहिताका वर्णन करके ज्योतियोंके संयोगसे नाना प्रकारके भौतिक पदार्थोंकी विभिन्न अभिव्यक्तियोंके विज्ञानका रहस्य समझाया गया है। उन ज्योतियोंके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाले भोग्य पदार्थोंको जलका नाम दिया गया है और उन सबकी उत्पत्तिमें बिजलीको संयोजक