ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
व्याख्या —इस अनुवाकमें पहले समदर्शी आचार्यके द्वारा अपने लिये और शिष्यके लिये भी यश और तेजकी वृद्धिके उद्देश्यसे शुभ आकाङ्क्षा की गयी है। आचार्यकी अभिलाषा यह है कि हमको तथा हमारे श्रद्धालु और विनयी शिष्यको भी ज्ञान और उपासनासे उपलब्ध होनेवाले यश और ब्रह्मतेजकी प्राप्ति हो। इसके पश्चात् आचार्य संहिताविषयक उपनिषद्की व्याख्या करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उसका निरूपण करते हैं। वर्णोंमें जो संधि होती है, उसको 'संहिता' कहते हैं। वही संहिता-दृष्टि जब व्यापकरूप धारण करके लोक आदिको अपना विषय बनाती है, तब उसे 'महासंहिता' कहते हैं। संहिता या संधि पाँच प्रकारकी होती है, यह प्रसिद्ध है। स्वर, व्यञ्जन, स्वादि, विसर्ग और अनुस्वार—ये ही संधिके अधिष्ठान बननेपर पञ्चसंधिके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। वस्तुतः ये संधिके पाँच आश्रय हैं। इसी प्रकार पूर्वोक्त महासंहिता या महासंधिके भी पाँच आश्रय हैं—लोक, ज्योति, विद्या, प्रजा और आत्मा (शरीर)। तात्पर्य यह कि जैसे वर्णोंमें संधिका दर्शन किया जाता है, उसी प्रकार इन लोक आदिमें भी संहिता-दृष्टि करनी चाहिये। वह किस प्रकार हो, यह बात समझायी जाती है। प्रत्येक संधिके चार भाग होते हैं—पूर्ववर्ण, परवर्ण, दोनोंके मेलसे होनेवाला रूप तथा दोनोंका संयोजक नियम। इसी प्रकार यहाँ जो लोक आदिमें संहिता-दृष्टि बतायी जाती है, उसके भी चार विभाग होंगे—पूर्वरूप, उत्तररूप, संधि (दोनोंके मिलनेसे होनेवाला रूप) और संधान (संयोजक)।
इस मन्त्रमें लोकविषयक संहिता-दृष्टिका निरूपण किया गया है। पृथ्वी अर्थात् यह लोक ही पूर्वरूप है। तात्पर्य यह कि लोकविषयक महासंहितामें पूर्ववर्णके स्थानपर पृथ्वीको देखना चाहिये। इसी प्रकार स्वर्ग ही संहिताका उत्तररूप (परवर्ण) है। आकाश यानी अन्तरिक्ष ही इन दोनोंकी संधि है और वायु इनका संधान (संयोजक) है। जैसे पूर्व और उत्तरवर्ण संधिमें मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार प्राणवायुके द्वारा पूर्ववर्णस्थानीय इस भूतलका प्राणी उत्तरवर्णस्थानीय स्वर्गलोकसे मिलताया जाता है। (सम्बद्ध किया जाता है)—यह भाव हो सकता है।