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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

व्याख्या —इस अनुवाकमें पहले समदर्शी आचार्यके द्वारा अपने लिये और शिष्यके लिये भी यश और तेजकी वृद्धिके उद्देश्यसे शुभ आकाङ्क्षा की गयी है। आचार्यकी अभिलाषा यह है कि हमको तथा हमारे श्रद्धालु और विनयी शिष्यको भी ज्ञान और उपासनासे उपलब्ध होनेवाले यश और ब्रह्मतेजकी प्राप्ति हो। इसके पश्चात् आचार्य संहिताविषयक उपनिषद्की व्याख्या करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उसका निरूपण करते हैं। वर्णोंमें जो संधि होती है, उसको 'संहिता' कहते हैं। वही संहिता-दृष्टि जब व्यापकरूप धारण करके लोक आदिको अपना विषय बनाती है, तब उसे 'महासंहिता' कहते हैं। संहिता या संधि पाँच प्रकारकी होती है, यह प्रसिद्ध है। स्वर, व्यञ्जन, स्वादि, विसर्ग और अनुस्वार—ये ही संधिके अधिष्ठान बननेपर पञ्चसंधिके नामसे प्रसिद्ध होते हैं। वस्तुतः ये संधिके पाँच आश्रय हैं। इसी प्रकार पूर्वोक्त महासंहिता या महासंधिके भी पाँच आश्रय हैं—लोक, ज्योति, विद्या, प्रजा और आत्मा (शरीर)। तात्पर्य यह कि जैसे वर्णोंमें संधिका दर्शन किया जाता है, उसी प्रकार इन लोक आदिमें भी संहिता-दृष्टि करनी चाहिये। वह किस प्रकार हो, यह बात समझायी जाती है। प्रत्येक संधिके चार भाग होते हैं—पूर्ववर्ण, परवर्ण, दोनोंके मेलसे होनेवाला रूप तथा दोनोंका संयोजक नियम। इसी प्रकार यहाँ जो लोक आदिमें संहिता-दृष्टि बतायी जाती है, उसके भी चार विभाग होंगे—पूर्वरूप, उत्तररूप, संधि (दोनोंके मिलनेसे होनेवाला रूप) और संधान (संयोजक)।

इस मन्त्रमें लोकविषयक संहिता-दृष्टिका निरूपण किया गया है। पृथ्वी अर्थात् यह लोक ही पूर्वरूप है। तात्पर्य यह कि लोकविषयक महासंहितामें पूर्ववर्णके स्थानपर पृथ्वीको देखना चाहिये। इसी प्रकार स्वर्ग ही संहिताका उत्तररूप (परवर्ण) है। आकाश यानी अन्तरिक्ष ही इन दोनोंकी संधि है और वायु इनका संधान (संयोजक) है। जैसे पूर्व और उत्तरवर्ण संधिमें मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार प्राणवायुके द्वारा पूर्ववर्णस्थानीय इस भूतलका प्राणी उत्तरवर्णस्थानीय स्वर्गलोकसे मिलताया जाता है। (सम्बद्ध किया जाता है)—यह भाव हो सकता है।

अनु० ३ ]

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यहाँ यह अनुमान होता है कि इस वर्णनमें यथेष्ट लोकोंकी प्राप्तिका उपाय बताया गया है; क्योंकि फलश्रुतिमें इस विद्याको जाननेका फल स्वर्गलोकसे सम्बद्ध हो जाना बताया है; परन्तु इस विद्याकी परम्परा नष्ट हो जानेके कारण इस संकेतमात्रके वर्णनसे यह बात समझमें नहीं आती कि किस प्रकार कौन-से लोककी प्राप्ति की जा सकती है। इतना तो समझमें आता है कि लोकोंकी प्राप्तिमें प्राणोंकी प्रधानता है। प्राणोंके द्वारा ही मन और इन्द्रियोंके सहित जीवात्माका प्रत्येक लोकमें गमन होता है—यह बात उपनिषदोंमें जगह-जगह कही गयी है; किंतु यहाँ जो यह कहा गया है कि पृथ्वी पहला वर्ण है और घुल्लोक दूसरा वर्ण है एवं आकाश संधि (इनका संयुक्तरूप) है—इस कथनका क्या भाव है, यह ठीक-ठीक समझमें नहीं आता।

अथाध्व्यौतिषम्। अग्निः पूर्वरूपम्। आदित्य उत्तररूपम्। आपः संधिः। वैद्युतः संधानम्। इत्यध्व्यौतिषम्।

अथ=अब; अध्व्यौतिषम्=ज्योतिविषयक संहिताका वर्णन करते हैं; अग्निः=अग्नि; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; आदित्यः=सूर्य; उत्तररूपम्=उत्तररूप (परवर्ण) है; आपः=जल—मेघ; संधिः=इन दोनोंकी संधि—मेलसे बना हुआ रूप है (और); वैद्युतः=बिजली; (इनका) संधानम्=संधान (जोड़नेका हेतु) है; इति=इस प्रकार; अध्व्यौतिषम्=ज्योतिविषयक संहिता कही गयी।

व्याख्या —अग्नि इस भूतलपर सुलभ है; अतः उसे संहिताका 'पूर्ववर्ण' माना है; और सूर्य घुल्लोकमें—ऊपरके लोकमें प्रकाशित होता है, अतः वह उत्तररूप (परवर्ण) बताया गया है। इन दोनोंसे उत्पन्न होनेके कारण मेघ ही संधि है तथा विद्युत्-शक्ति ही संधिकी हेतु (संधान) बतायी गयी है।

इस मन्त्रमें ज्योतिविषयक संहिताका वर्णन करके ज्योतियोंके संयोगसे नाना प्रकारके भौतिक पदार्थोंकी विभिन्न अभिव्यक्तियोंके विज्ञानका रहस्य समझाया गया है। उन ज्योतियोंके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाले भोग्य पदार्थोंको जलका नाम दिया गया है और उन सबकी उत्पत्तिमें बिजलीको संयोजक

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[ वल्ली १ ]

बताया गया है, ऐसा अनुमान होता है; क्योंकि आजकलके वैज्ञानिकों भी बिजलीके सम्बन्धसे नाना प्रकारके भौतिक विकास करके दिखाये हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि वेदमें यह भौतिक उन्नतिका साधन भी भलीभाँति बताया गया है; परंतु परम्परा नष्ट हो जानेके कारण उसको समझने और समझानेवाले दुर्लभ हो गये हैं।

अथाधिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् । अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या संधिः । प्रवचनः संधानम् । इत्यधिविद्यम् ।

अथ=अब; अधिविद्यम्=विद्याविषयक संहिताका आरम्भ करते हैं; आचार्यः=गुरु; पूर्वरूपम्=पहला वर्ण है; अन्तेवासी=समीप निवास करनेवाला शिष्य; उत्तररूपम्=दूसरा वर्ण है; विद्या=(दोनोंके मिलनेसे उत्पन्न) विद्या; संधिः=मिला हुआ रूप है; प्रवचनम्=गुरुद्वारा दिया हुआ उपदेश ही; संधानम्=संधिका हेतु है; इति=इस प्रकार (यह); अधिविद्यम्=विद्याविषयक संहिता कही गयी।

व्याख्या —इस मन्त्रमें विद्याके विषयमें संहिता-दृष्टिका उपदेश दिया गया है। इसके द्वारा विद्याप्राप्तिका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि जिस प्रकार वर्णोंकी संधिमें एक पूर्ववर्ण और एक परवर्ण होता है, उसी प्रकार यहाँ विद्यारूप संहितामें गुरु तो मानो पूर्ववर्ण है और श्रद्धा-भक्तिपूर्वक गुरुकी सेवा करनेवाला विद्याभिलाषी शिष्य परवर्ण है; तथा संधिमें दो वर्णोंके मिलनेपर जैसे एक तीसरा नया वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार गुरु और शिष्यके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाली विद्या—ज्ञान ही यहाँ संधि है। इस विद्यारूप संधिके प्रकट होनेका कारण है—प्रवचन अर्थात् गुरुका उपदेश देना और शिष्यद्वारा उसको श्रद्धापूर्वक सुन-समझकर धारण करना—यही संधान है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर विद्वान् गुरुकी सेवा करता है, वह अवश्य ही विद्या प्राप्त करके विद्वान् हो जाता है।

अथाधिप्रजम् । माता पूर्वरूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजा संधिः । प्रजननः संधानम् । इत्यधिप्रजम् ।

अनु० ३ ]

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अथ=अब; अधिप्रजम्=प्रजाविषयक संहिता कहते हैं; माता=माता; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; पिता=पिता; उत्तररूपम्=उत्तररूप (परवर्ण) है; प्रजा=(उन दोनोंके मेलसे उत्पन्न) संतान; संधि:=संधि है (तथा); प्रजननम्=प्रजनन (संतानोत्पत्तिके अनुकूल व्यापार); संधानम्=संधान (संधिका कारण) है; इति=इस प्रकार (यह); अधिप्रजम्=प्रजाविषयक संहिता कही गयी।

व्याख्या —इस मन्त्रमें संहिताके रूपमें प्रजाका वर्णन करके संतानप्राप्तिका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि इस प्रजाविषयक संहितामें माता तो मानो पूर्ववर्ण है और पिता परवर्ण है। जिस प्रकार दोनों वर्णोंकी संधिसे एक नया वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार माता-पिताके संयोगसे उत्पन्न होनेवाली संतान ही इस संहितामें दोनोंकी संधि (संयुक्तस्वरूप) है। तथा माता और पिताका जो ऋतुकालमें शास्त्रविधिके अनुसार यथोचित नियमपूर्वक संतानोत्पत्तिके उद्देश्यसे सहवास करना है, यही संधान (संतानोत्पत्तिका कारण) है। जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर संतानोत्पत्तिके उद्देश्यसे ऋतुकालमें धर्मयुक्त स्त्रीसहवास करता है, वह अवश्य ही अपनी इच्छाके अनुसार श्रेष्ठ संतान प्राप्त कर लेता है।

अथाध्यात्मम्। अधरा हनुः पूर्वरूपम्। उत्तरा हनुः उत्तररूपम्। वाक् संधिः। जिह्वा संधानम्। इत्यध्यात्मम्।

अथ=अब; अध्यात्मम्=आत्मविषयक संहिताका वर्णन करते हैं; अधरा हनुः=नीचेका जबड़ा; पूर्वरूपम्=पूर्वरूप (पूर्ववर्ण) है; उत्तरा हनुः=ऊपरका जबड़ा; उत्तररूपम्=दूसरा रूप (परवर्ण) है; वाक्=(दोनोंके मिलनेसे उत्पन्न) वाणी; संधि:=संधि है (और); जिह्वा=जिह्वा; संधानम्=संधान (वाणीरूप संधिको उत्पत्तिका कारण) है; इति=इस प्रकार (यह); अध्यात्मम्=आत्मविषयक संहिता कही गयी।

व्याख्या —इस मन्त्रमें शरीरविषयक संहिता-दृष्टिका उपदेश किया गया है। शरीरमें प्रधान अङ्ग मुख है, अतः मुखके ही अवयवोंमें संहिताका विभाग

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[ वल्ली १ ]

दिखाया गया है। तात्पर्य यह कि नीचेका जबड़ा मानो संहिताका पूर्ववर्ण है, ऊपरका जबड़ा परवर्ण है; इन दोनोंके संयोगसे इनके मध्यभागमें अभिव्यक्त होनेवाली वाणी ही संधि है और जिह्वा ही संधान (वाणीरूप संधिके प्रकट होनेका कारण) है; क्योंकि जिह्वाके बिना मनुष्य कोई भी शब्द नहीं बोल सकता। वाणीमें विलक्षण शक्ति है। वाणीद्वारा प्रार्थना करके मनुष्य शरीरके पोषण और उसे उन्नत करनेकी सभी सामग्री प्राप्त कर सकता है तथा आंकाररूप परमेश्वरके नाम-जपसे परमात्माको भी प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार वाणीमें शारीरिक और आत्मविषयक—दोनों तरहकी उन्नति करनेकी सामर्थ्य भरी हुई है। इस रहस्यको समझकर जो मनुष्य अपनी वाणीका यथायोग्य उपयोग करता है, वह वाक्शक्ति पाकर उसके द्वारा अभीष्ट फल प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाता है।

इतीमा महासः हिता य एवमेता महासः हिता व्याख्याता वेद। संधीयते प्रजया पशुभिः। ब्रह्मवर्चसेनात्राघेन सुवर्गेण लोकेन।

इति=इस प्रकार; इमाः=ये; महासंहिताः=पाँच महासंहिताएँ कही गयी हैं; यः=जो मनुष्य; एवम्=इस प्रकार; एताः=इन; व्याख्याताः=ऊपर बतायी हुई; महासंहिताः=महासंहिताओंको; वेद=जान लेता है; (वह) प्रजया=संतानसे; पशुभिः=पशुओंसे; ब्रह्मवर्चसेन=ब्रह्मतेजसे; अत्राघेन=अन्न आदि भोग्यपदार्थोंसे (और); सुवर्गेण लोकेन=स्वर्गरूप लोकसे; संधीयते=सम्पन्न हो जाता है।

व्याख्या —इस मन्त्रमें पाँच प्रकारसे कही हुई महासंहिताओंके यथार्थ ज्ञानका फल बताया गया है। इनको जाननेवाला अपनी इच्छाके अनुकूल संतान प्राप्त कर सकता है, विद्याके द्वारा ब्रह्मतेजसम्पन्न हो जाता है, अपनी इच्छाके अनुसार नाना प्रकारके पशुओंको और अन्न आदि आवश्यक भोग्यपदार्थोंको प्राप्त कर सकता है। इतना ही नहीं, उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति भी हो जाती है। इनमेंसे लोकविषयक संहिताके ज्ञानसे स्वर्ग आदि उत्तम लोक, ज्योतिविषयक संहिताके ज्ञानसे नाना प्रकारकी भौतिक सामग्री, प्रजाविषयक संधिके ज्ञानसे

अनु० ४ ]

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संतान, विद्याविषयक संहिताके ज्ञानसे विद्या और ब्रह्मतेज तथा अध्यात्मसंहिताके विज्ञानसे वाक्शक्तिकी प्राप्ति—इस प्रकार पृथक्-पृथक् फल समझना चाहिये। श्रुतिमें समस्त संहिताओंके ज्ञानका सामूहिक फल बतलाया गया है। श्रुति ईश्वरकी वाणी है; अतः इसका रहस्य समझकर ब्रह्मा और विश्वासके साथ उपर्युक्त उपासना करनेसे निस्संदेह वे सभी फल प्राप्त हो सकते हैं, जिनकी चर्चा ऊपर की गयी है।

॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥

चतुर्थ अनुवाक

यश्छन्दसामूषभो विश्वरूपः छन्दोभ्योऽध्मृतात् सम्बभूव। स मेन्द्रो मेधया सृणोतु। अमृतस्य देव धारणो भूयासम्। शरीरं मे विचर्षणम्। जिह्वा मे मधुमत्तमा। कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्। ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः। श्रुतं मे गोपाय।

यः=जो; छन्दसाम्=वेदोंमें; ऋषभः=सर्वश्रेष्ठ है; विश्वरूपः=सर्वरूप है (और); अमृतात्=अमृतस्वरूप; छन्दोभ्यः=वेदोंसे; अधि=प्रधानरूपमें; सम्बभूव=प्रकट हुआ है; सः=वह (ओंकारस्वरूप); इन्द्रः=सबका स्वामी (परमेश्वर); मा=मुझे; मेधया=धारणायुक्त बुद्धिसे; सृणोतु=सम्पन्न करे; देव=हे देव! (मैं आपकी कृपासे); अमृतस्य धारणः=अमृतमय परमात्माको (अपने हृदयमें) धारण करनेवाला; भूयासम्=बन जाऊँ; मे=मेरा; शरीरम्=शरीर; विचर्षणम्=विशेष फुर्तीला—सब प्रकारसे रोगरहित हो (और); मे=मेरी; जिह्वा=जिह्वा; मधुमत्तमा=अतिशयमधुमती (मधुरभाषिणी); [ भूतात् ]=हो जाय; कर्णाभ्याम्=(मैं) दोनों कानोंद्वारा; भूरि=अधिक; विश्रुवम्=सुनता रहूँ; (हे प्रणव ! तू) मेधया=लौकिक बुद्धिसे; पिहितः=ढकी हुई; ब्रह्मणः=परमात्माकी; कोशः=निधि; असि=है; (तू) मे=मेरे; श्रुतम् गोपाय=सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर।

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[ वल्ली १ ]

व्याख्या —इस चतुर्थ अनुवाकमें ‘मे श्रुतम् गोपाय’ इस वाक्यतक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये आवश्यक बुद्धिबल और शारीरिक बलकी प्राप्तिके उद्देश्यसे परमेश्वरसे उनके नाम ओंकारद्वारा प्रार्थना करनेका प्रकार बताया गया है। भाव यह है कि ‘ओम्’ यह परमेश्वरका नाम वेदोंक जितने भी मन्त्र हैं, उन सबमें श्रेष्ठ है और सर्वरूप है; क्योंकि प्रत्येक मन्त्रके आदिमें ओंकारका उच्चारण किया जाता है और ओंकारके उच्चारणसे सम्पूर्ण वेदोंके उच्चारणका फल प्राप्त होता है। तथा अविनाशी वेदोंसे यह ओंकार प्रधानरूपमें प्रकट हुआ है। ओंकार नाम है और परमेश्वर नामी; अतः दोनों परस्पर अभिन्न हैं। वे प्रणवरूप परमात्मा सबके परमेश्वर होनेके कारण ‘इन्द्र’ नामसे प्रसिद्ध हैं। वे इन्द्र मुझे मेधासे सम्पन्न करें। ‘धीर्धारणावती मेधा’ इस कोषवाक्यके अनुसार धारणशक्तिसे सम्पन्न बुद्धिका नाम मेधा है। तात्पर्य यह कि परमात्मा मुझे पढ़े और समझे हुए भावोंको धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न करें। हे देव! मैं आपकी अहेतुकी कृपासे आपके अमृतमय स्वरूपको अपने हृदयमें धारण करनेवाला बन जाऊँ। मेरा शरीर रोगरहित रहे, जिससे आपकी उपासनामें किसी प्रकारका विघ्न न पड़े। मेरी जिह्वा अतिशय मधुमती अर्थात् मधुर स्वरसे आपके अत्यन्त मधुर नाम और गुणोंका कीर्तन करके उनके मधुर रसका आस्वाद करनेवाली बन जाय। मैं अपने दोनों कानोंद्वारा कल्याणमय बहुत-से शब्दोंको सुना रहा हूँ, अर्थात् मेरे कानोंमें आचार्यद्वारा वर्णन किये हुए रहस्यको पूर्णतया सुननेकी शक्ति आ जाय और मुझे आपका कल्याणमय यश सुननेको मिलता रहे। हे ओंकार! तू परमेश्वरकी निधि है, अर्थात् वे पूर्णब्रह्म परमेश्वर तुझमें भरे हुए हैं; क्योंकि नामी नामके ही आश्रित रहता है। ऐसा होते हुए भी तू मनुष्योंकी लौकिक बुद्धिसे ढका हुआ है—लौकिक तर्कसे अनुसंधान करनेवालोंकी बुद्धिमें तेरा प्रभाव व्यक्त नहीं होता। हे देव! तू सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर अर्थात् ऐसी कृपा कर कि मुझे जो उपदेश सुननेको मिले, उसे मैं स्मरण रखता हुआ उसके अनुसार अपना जीवन बना सकूँ।

सम्बन्ध —अब ऐश्वर्यकी कामनावालेके लिये हवन करनेके मन्त्रोंका आरम्भ करते हैं—

अनु० ४ ]

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आवहन्ती वितन्वाना कुर्वाणाचीरमात्मनः। वासाः सि मम गावश्च। अन्नपाने च सर्वदा। ततो मे श्रियमावह। लोमशां पशुभिः सह स्वाहा।

ततः=उसके बाद (अब ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी रीति बताते हैं—हे देव!); [ या श्रीः ]=जो श्री; मम=मेरे; आत्मनः=अपने लिये; अचीरम्=तत्काल ही; वासांसि=नाना प्रकारके वस्त्र; च=और; गावः=गौएँ; च=तथा; अन्नपाने=खाने-पीनेके पदार्थ; सर्वदा=सदैव; आवहन्ती=ला देनेवाली; वितन्वाना=उनका विस्तार करनेवाली; (तथा) कुर्वाणा=उन्हें बनानेवाली है; लोमशाम्=रोएँवाले—भेड़-बकरी आदि; पशुभिः सह=पशुओंके सहित; [ ताम् ] श्रियम्=उस श्रीको; मे=मेरे लिये (तू); आवह=ले आ; स्वाहा=स्वाहा (इसी उद्देश्यसे तुझे यह आहुति समर्पित की जाती है)।

व्याख्या—चतुर्थ अनुवाकके इस उपर्युक्त अंशमें ऐश्वर्यकी कामनावाले सकाम मनुष्योंके लिये, परमेश्वरसे प्रार्थना करते हुए अग्निमें आहुति देनेकी रीति बतायी गयी है। प्रार्थनाका भाव यह है कि 'हे अग्निके अधिष्ठाता परमेश्वर! जो मेरे निजके लिये आवश्यकता होनेपर बिना विलम्ब तत्काल ही नाना प्रकारके वस्त्र, गौएँ और खाने-पीनेकी विविध सामग्री सदैव प्रस्तुत कर दे, उन्हें बढ़ाती रहे तथा उन्हें नवीनरूपसे रच दे, ऐसी श्रीको तू मेरे लिये भेड़-बकरी आदि रोएँवाले एवं अन्य प्रकारके पशुओंसहित ला दे। अर्थात् समस्त भोग-सामग्रीका साधनरूप धन मुझे प्रदान कर।' इस मन्त्रका उच्चारण करके 'स्वाहा' इस शब्दके साथ अग्निमें आहुति देनी चाहिये, यह ऐश्वर्यकी प्राप्तिका साधन है।

सम्बन्ध—आचार्यको ब्रह्मचारियोंके हितार्थ किस प्रकार हवन करना चाहिये, इसकी विधि बतायी जाती है—

आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा।

ब्रह्मचारिणः=ब्रह्मचारीलोग; मा=मेरे पास; आयन्तु=आयें; स्वाहा=स्वाहा

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

(इस उद्देश्यसे यह आहुति दी जाती है); ब्रह्मचारिणः =ब्रह्मचारीलोग; विमयन्तु =कपटशून्य हों; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः =ब्रह्मचारीलोग; प्रमायन्तु =प्रमाणिक ज्ञानको ग्रहण करनेवाले हों; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः =ब्रह्मचारीलोग; दमायन्तु =इन्द्रियोंका दमन करनेवाले हों; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); ब्रह्मचारिणः =ब्रह्मचारीलोग; शमायन्तु =मनको वशमें करनेवाले हों; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है)।

व्याख्या —चतुर्थ अनुवाकके इस अंशमें शिष्योंके हितार्थ आचार्यको जिन मन्त्रोंद्वारा हवन करना चाहिये, उनका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि आचार्य 'उत्तम' ब्रह्मचारीलोग मेरे पास विद्या पढ़नेके लिये आयें, इस उद्देश्यसे मन्त्र पढ़कर 'स्वाहा' शब्दके साथ पहली आहुति दे; 'मेरे ब्रह्मचारी कपटशून्य हों' इस उद्देश्यसे मन्त्र पढ़कर 'स्वाहा' शब्दके साथ दूसरी आहुति दे; 'ब्रह्मचारीलोग उत्तम ज्ञानको ग्रहण करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ तीसरी आहुति दे; 'ब्रह्मचारीलोग इन्द्रियोंका दमन करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ चौथी आहुति दे तथा 'ब्रह्मचारीलोग मनको वशमें करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ पाँचवीं आहुति दे।

सम्बन्ध —आचार्यको अपने लौकिक और पारलौकिक हितके लिये किस प्रकार हवन करना चाहिये, इसकी विधि बतायी जाती है—

यशो जनेऽसानि स्वाहा। श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा। तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा। स मा भग प्रविश स्वाहा। तस्मिन् सहस्त्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा।

जने =लोगोंमें (मैं); यशः =यशस्वी; असानि =होऊँ; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); वस्यसः =महान् धनवानोंकी अपेक्षा भी; श्रेयान् =अधिक धनवान्; असानि =हो जाऊँ; स्वाहा =स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); भग =हे भगवन्!; तम् त्वा =उस आपमें; प्रविशानि =मैं प्रविष्ट हो जाऊँ; स्वाहा =स्वाहा (इस

अनु० ४ ]

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उद्देश्यसे यह आहुति है); भग=हे भगवन्!; सः=वह (तु); मा=मुझमें; प्रविश=प्रविष्ट हो जा; स्वाहा=स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); भग=हे भगवन्!; तस्मिन्=उस; सहस्त्रशरणे=हजारों शाखावाले; त्वधि=आपमें; (ध्यानद्वारा निमग्न होकर) अहम्=मैं; निमूज्जे=अपनेको विशुद्ध कर लूँ; स्वाहा=स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है)।

व्याख्या —चतुर्थ अनुवाकके इस अंशमें आचार्यको अपने हितके लिये जिन मन्त्रोंद्वारा हवन करना चाहिये, उनका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि 'लोगोंमें मैं यशस्वी बन्तूँ, जगत्में मेरा यश-सौरभ सर्वत्र फैल जाय, मुझसे कोई भी ऐसा आचरण न बने, जो मेरे यशमें धब्बा लगानेवाला हो, इस उद्देश्यसे 'यशो जनेऽसानि' इस मन्त्रका उच्चारण करके 'स्वाहा' शब्दके साथ पहली आहुति डालनी चाहिये। 'महान् धनवानोंकी अपेक्षा भी मैं अधिक सम्पत्तिशाली बन जाऊँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ दूसरी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! आपके उस दिव्य स्वरूपमें मैं प्रविष्ट हो जाऊँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ तीसरी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! वह आपका दिव्य स्वरूप मुझमें प्रविष्ट हो जाय—मेरे मनमें बस जाय' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ चौथी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! हजारों शाखावाले आपके उस दिव्यरूपमें ध्यानद्वारा निमग्न होकर मैं अपने-आपको विशुद्ध बना लूँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ पाँचवीं आहुति अग्निमें डालनी चाहिये।

यथाऽऽपः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम्। एवं मां ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा। प्रतिवेशोऽसि प्र मा भाहि प्र मा पद्यस्व॥

यथा=जिस प्रकार; आपः=(नदी आदिके) जल; प्रवता=निम्नस्थानसे होकर; यन्ति=समुद्रमें चले जाते हैं; यथा=जिस प्रकार; मासाः=महीने; अहर्जरम्=दिनोंका अन्त करनेवाले संवत्सररूप कालमें; [ यन्ति ]=चले जाते हैं; धातः=हे विधाता!;

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[ वल्ली १ ]

एवम्=इसी प्रकार; माम्=मेरे पास; सर्वतः=सब ओरसे; ब्रह्मचारिणः=ब्रह्मचारीलोग; आयन्तु=आयें; स्वाहा=स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); प्रतिवेशः=(तू) सबका विश्राम स्थान; अस्मि=है; मा=मेरे लिये; प्रभाहि=अपनेको प्रकाशित कर; मा=मुझे; प्रपद्यस्व=प्राप्त हो जा।

व्याख्या— ‘जिस प्रकार समस्त जल-प्रवाह नीचेकी ओर बहते हुए समुद्रमें मिल जाते हैं तथा जिस प्रकार महीने दिनोंका अन्त करनेवाले संवत्सररूप कालमें जा रहे हैं, हे विधाता! उसी प्रकार मेरे पास सब ओरसे ब्रह्मचारीलोग आयें और मैं उनको विद्याभ्यास कराकर तथा कल्याणका उपदेश देकर अपने कर्तव्यका एवं आपकी आज्ञाका पालन करता रहूँ।’ इस उद्देश्यसे मनोच्चारण करके ‘स्वाहा’ शब्दके साथ छठी आहुति अग्रिममें डालनी चाहिये। ‘हे परमात्मन्। आप सबके विश्राम-स्थान हैं, अब मेरे लिये अपने दिव्य स्वरूपको प्रकाशित कर दीजिये और मुझे प्राप्त हो जाइये’ इस उद्देश्यसे मनोच्चारणपूर्वक ‘स्वाहा’ शब्दके साथ सातवीं आहुति अग्रिममें डाले।

इस प्रकार इस चौथे अनुवाकमें इस लोक और परलोककी उन्नतिका उपाय परमात्माकी प्रार्थना और उसके साथ-साथ हवनको बताया गया है। प्रकरण बड़ा ही सुन्दर और श्रेयस्कर है। अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको इसमें बताये हुए प्रकारसे अपने लिये जिस अंशकी आवश्यकता प्रतीत हो, उस अंशके अनुसार अनुष्ठान आरम्भ कर देना चाहिये।

॥ चतुर्थ अनुवाक समाप्त ॥ ४ ॥

पञ्चम अनुवाक

भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्त्रो व्याहतयः। तासामु ह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते। मह इति। तद्ब्रह्म। स आत्मा। अज्ञान्यन्या देवताः। भूरिति वा अयं लोकः। भुव इत्यन्तरिक्षम्। सुवरित्यसौ लोकः। मह इत्यादित्यः। आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते।

अनु० ५ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३४७

भूः=भूः; भुवः=भुवः; सुवः=स्वः; इति=इस प्रकार; एताः=ये; वै=प्रसिद्ध; तिस्रः=तीन; व्याहतयः=व्याहतियाँ हैं; तासाम् उ=उन तीनोंकी अपेक्षासे; चतुर्थीम्=जो चौथी व्याहति; महः इति='मह' इस नामसे; ह=प्रसिद्ध है; एताम्=इसको; माहाचमस्यः=माहाचमसके पुत्रने; प्रवेदयते स्म=सबसे पहले जाना था; तत्=वह चौथी व्याहति ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; सः=वह; आत्मा=(ऊपर कही हुई व्याहतियोंका) आत्मा है; अन्धाः=अन्ध; देवताः=सब देवता; अङ्गनिः=(उसके) अङ्ग हैं; भूः='भूः'; इति=यह व्याहति; वै=ही; अयम् लोकः=यह पृथ्वीलोक है; भुवः='भुवः'; इति=यह; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्ष-लोक है; सुवः='स्वः'; इति=यह; असौ लोकः=वह प्रसिद्ध स्वर्गलोक है; महः='महः'; इति=यह; आदित्यः=आदित्य—सूर्य है; आदित्येन=(क्योंकि) आदित्यसे; वावः=ही; सर्वे=समस्त; लोकाः=लोक; महीयन्ते=महिमान्वित होते हैं।

व्याख्या —इस पञ्चम अनुवाकमें भूः, भुवः, स्वः और महः—इन चारों व्याहतियोंकी उपासनाका रहस्य बताकर उसके फलका वर्णन किया गया है। पहले तो इसमें यह बात कही गयी है कि भूः, भुवः और स्वः—ये तीन व्याहतियाँ तो प्रसिद्ध हैं; परंतु इनके अतिरिक्त जो चौथी व्याहति 'महः' है, इसकी उपासनाका रहस्य सबसे पहले माहाचमसके पुत्रने जाना था। भाव यह है कि इन चारों व्याहतियोंको चार प्रकारसे प्रयोग करके उपासना करनेकी विधि, जो आगे बतायी गयी है, तभीसे प्रचलित हुई है। इसके बाद उन चार व्याहतियोंमें किस प्रकारकी भावना करके उपासना करनी चाहिये, यह समझाया गया है। इन चारों व्याहतियोंमें 'महः' यह चौथी व्याहति सर्वप्रधान है। अतः उपास्य देवोंमें 'महः' व्याहतिको ब्रह्मका स्वरूप समझना चाहिये—यह भाव समझानेके लिये कहा गया है कि वह चौथी व्याहति 'महः' ब्रह्मका नाम होनेसे ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्म सबके आत्मा हैं, सर्वरूप हैं और अन्य सब देवता उनके अङ्ग हैं; अतः जिस किसी भी देवताकी इन व्याहतियोंके द्वारा उपासना की जाय, उसमें इस बातको नहीं भूलना चाहिये कि यह सर्वरूप परमेश्वरकी ही उपासना है। सब देवता उन्हींके अङ्ग होनेसे अन्य देवोंकी उपासना भी उन्हींकी उपासना है।

३४८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

(गीता ९।२३-२४) उसके पश्चात् इन व्याहितियोंमें लोकोंका चिन्तन करनेकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है—‘भूः’ यह तो मानो पृथ्वीलोक है, ‘भुवः’ यह अन्तरिक्षलोक है, ‘स्वः’ यह सुप्रसिद्ध स्वर्गलोक है और ‘महः’ यह सूर्य है; क्योंकि सूर्यसे ही सब लोक महिमान्वित हो रहे हैं। तात्पर्य यह कि भूः भुवः, स्वः—ये तीनों व्याहितियाँ तो उन परमेश्वरके विराट् शरीररूप इस स्थूल ब्रह्माण्डको बतानेवाली—अर्थात् परमेश्वरके अङ्गोंके नाम हैं तथा ‘महः’ यह चौथी व्याहिति इस विराट् शरीरको प्रकाशित करनेवाले उसके आत्मारूप परमेश्वरको बतानेवाली है। ‘महः’ यह सूर्यका नाम है, सूर्यके भी आत्मा हैं परमेश्वर; अतः सूर्यरूपसे सब लोकोंको वे ही प्रकाशित करते हैं। इसलिये यहाँ सूर्यके उपलक्षणसे इस विराट् शरीरको प्रकाशित करनेवाले इसके आत्मारूप परमेश्वरकी ही उपासनाका लक्ष्य कराया गया है।

भूरिति वा अग्निः। भुव इति वायुः। सुवरित्यादित्यः। मह इति चन्द्रमाः। चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतीः५ षि महीयन्ते। भूरिति वा ऋचः। भुव इति सामानि। सुवरिति यजूः५ षि। मह इति ब्रह्म। ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते।

भूः=‘भूः’; इति=यह व्याहिति; वै=ही; अग्निः=अग्नि है; भुवः=‘भुवः’; इति=यह; वायुः=वायु है; सुवः=‘स्वः’; इति=यह; आदित्यः=आदित्य है; महः=‘महः’; इति=यह; चन्द्रमाः=चन्द्रमा है; (क्योंकि) चन्द्रमसा=चन्द्रमासे; वाव=ही; सर्वाणि=समस्त; ज्योतीषि=ज्योतियाँ; महीयन्ते=महिमावाली होती हैं; भूः=‘भूः’; इति=यह व्याहिति; वै=ही; ऋचः=ऋग्वेद है; भुवः=‘भुवः’; इति=यह; सामानि=सामवेद है; सुवः=‘स्वः’; इति=यह; यजूषि=यजुर्वेद है; महः=‘महः’; इति=यह; ब्रह्म=ब्रह्म है; (क्योंकि) ब्रह्मणा=ब्रह्मसे; वाव=ही; सर्वे=समस्त; वेदाः=वेद; महीयन्ते=महिमावान् होते हैं।

व्याख्या —इसी प्रकार फिर ज्योतियोंमें इन व्याहितियोंद्वारा परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार बताया गया है। भाव यह है कि ‘भूः’ यह व्याहिति अग्निका

अनु० ५ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३४९

नाम होनेसे मानो अग्नि ही है। अग्निदेवता वाणीका अधिष्ठाता है और वाणी भी प्रत्येक विषयको व्यक्त करके प्रकाशित करनेवाली होनेसे ज्योति है; अतः वह भी ज्योतियोंकी उपासनामें मानो ‘भूः’ है। ‘भुवः’ यह वायु है। वायुदेवता त्वक्-इन्द्रियका अधिष्ठाता है और त्वक्-इन्द्रिय स्पर्शको प्रकाशित करनेवाली ज्योति है; अतः ज्योतिविषयक उपासनामें वायु और त्वचाको ‘भुवः’ रूप समझना चाहिये। ‘स्वः’ यह सूर्य है। सूर्य चक्षु-इन्द्रियका अधिष्ठातृ देवता है, चक्षु-इन्द्रिय भी सूर्यकी सहायतासे रूपको प्रकाशित करनेवाली ज्योति है; अतः ज्योतिविषयक उपासनामें सूर्य और चक्षु-इन्द्रियको ‘स्वः’ व्याहृतिस्वरूप समझना चाहिये। ‘महः’ यह चौथी व्याहृति ही मानो चन्द्रमा है, चन्द्रमा मनका अधिष्ठातृ देवता है। मनकी सहायतासे मनके साथ रहनेपर ही समस्त इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको प्रकाशित कर सकती हैं, मनके बिना नहीं कर सकतीं; अतः सब ज्योतियोंमें प्रधान चन्द्रमा और मनको ही ‘महः’ व्याहृतिरूप समझना चाहिये; क्योंकि चन्द्रमासे अर्थात् मनसे ही समस्त ज्योतिरूप इन्द्रियाँ महिमान्वित होती हैं। इस प्रकार मनके रूपमें परमेश्वरकी उपासना करनेकी विधि समझायी गयी है। फिर इसी भाँति वेदोंके विषयमें व्याहृतियोंके प्रयोगद्वारा परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार बताया गया है। भाव यह है कि ‘भूः’ यह ऋग्वेद है, ‘भुवः’ यह सामवेद है, ‘स्वः’ यह यजुर्वेद है और ‘महः’ यह ब्रह्म है; क्योंकि ब्रह्मसे ही समस्त वेद महिमायुक्त होते हैं। तात्पर्य यह कि सम्पूर्ण वेदोंमें वर्णित समस्त ज्ञान परब्रह्म परमेश्वरसे ही प्रकट और उन्हींसे व्याप्त है तथा उन परमेश्वरके तत्त्वका इन वेदोंमें वर्णन है, इसीलिये इनकी महिमा है। इस प्रकार वेदोंमें इन व्याहृतियोंका प्रयोग करके उपासना करनी चाहिये।

भूरिति वै प्राणः। भुव इत्यपानः। सुवरिति व्यानः। मह इत्यन्नम्। अत्रेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते। ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा। चतस्रश्चतस्रो व्याहतयः। ता यो वेद। स वेद ब्रह्म। सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति।

३५०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

भूः='भूः'; इति=यह व्याहृति; वै=ही; प्राणः=प्राण है; भुवः='भुवः'; इति=यह; अपानः=अपान है; सुवः='स्वः'; इति=यह; व्यानः=व्यान है; महः='महः'; इति=यह; अत्रम्=अत्र है; (क्योंकि) अत्रेन=अत्रसे; वावः=ही; सर्वे=समस्त; प्राणाः=प्राण; महीयन्ते=महिमायुक्त होते हैं; ताः=वे; वै=ही; एताः=ये; चतस्त्रः=चारों व्याहृतियाँ; चतुर्धा=चार प्रकारकी हैं; (अतएव) चतस्त्रः चतस्त्रः=एक-एकके चार-चार भेद होनेसे कुल सोलह; व्याहृतयः=व्याहृतियाँ हैं; ताः=उनको; यः=जो; वेद=तत्त्वसे जानता है; सः=वह; ब्रह्म=ब्रह्मको; वेद=जानता है; अस्मै=इस ब्रह्मवेताके लिये; सर्वे=समस्त; देवाः=देवता; बलिम्=भेंट; आवहन्ति=समर्पण करते हैं।

व्याख्या —उसके बाद प्राणोंके विषयमें इन व्याहृतियोंका प्रयोग करके उपासनाका प्रकार समझाया गया है। भाव यह है कि 'भूः' यही मानो प्राण है, 'भुवः' यह अपान है, 'स्वः' यह व्यान है। इस प्रकार जगद्वापी समस्त प्राण ही मानो ये तीनों व्याहृतियाँ हैं और अत्र 'महः' रूप चतुर्थ व्याहृति है; क्योंकि जिस प्रकार व्याहृतियोंमें 'महः' प्रधान है, उसी प्रकार समस्त प्राणोंका पोषण करके उनकी महिमाको बनाये रखने और बढ़ानेके कारण उनकी अपेक्षा अत्र प्रधान है; अतः प्राणोंके अन्तर््यामी परमेश्वरकी अत्रके रूपमें उपासना करनी चाहिये।

इस तरह चारों व्याहृतियोंको चार प्रकारसे प्रयुक्त करके उपासना करने-की रीति बताकर फिर उसे समझकर उपासना करनेका फल बताया गया है। भाव यह कि चार प्रकारसे प्रयुक्त इन चारों व्याहृतियोंकी उपासनाके भेदको जो कोई जान लेता है, अर्थात् समझकर उसके अनुसार परब्रह्म परमात्माकी उपासना करता है, वह ब्रह्मको जान लेता है और समस्त देव उसको भेंट समर्पण करते हैं—उसे परमेश्वरका प्यारा समझकर उसका आदर-सत्कार करते हैं।

॥ पञ्चम अनुवाक समाप्त ॥ ५ ॥

अनु० ६ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३५१

षष्ठ अनुवाक

स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः। तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः। अमृतो हिरण्मयः।

सः=वह (पहले बताया हुआ); यः=जो; एषः=यह; अन्तर्हृदये=हृदयके भीतर; आकाशः=आकाश है; तस्मिन्=उसमें; अयम्=यह; हिरण्मयः=विशुद्ध प्रकाशस्वरूप; अमृतः=अविनाशी; मनोमयः=मनोमय; पुरुषः=पुरुष (परमेश्वर) रहता है।

व्याख्या—इस अनुवाकमें चार बातें कही गयी हैं, उनका पूर्व अनुवाकमें बतलाये हुए उपदेशसे अलग-अलग सम्बन्ध है और उस उपदेशकी पूर्तिके लिये ही यह आरम्भ किया गया है, ऐसा अनुमान होता है।

पूर्व अनुवाकमें मनके अधिष्ठातृ-देवता चन्द्रमाको इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंका प्रकाशक बताया गया है और उसकी ब्रह्मरूपसे उपासना करनेकी युक्ति समझायी गयी है; वे मनोमय परब्रह्म—सबके अन्तर्यामी पुरुष कहाँ हैं; उनकी उपलब्धि कहाँ होती है—यह बात इस अनुवाकके पहले अंशमें समझायी गयी है। अनुवाकके इस अंशका अभिप्राय यह है कि पहले बतलाया हुआ जो यह हृदयके भीतर अद्भुतमात्र परिमाणवाला आकाश है, उसीमें ये विशुद्ध प्रकाशस्वरूप अविनाशी मनोमय अन्तर्यामी परम पुरुष परमेश्वर विराजमान हैं; वहीं उनका साक्षात्कार हो जाता है, उन्हें पानेके लिये कहीं दूसरी जगह नहीं जाना पड़ता।

अन्तरेण तालुके। य एष स्तन इवावलम्बते। सेन्द्रयोनिः। यत्रासौ केशान्तो विवर्तते। व्यपोह्य शीर्षकपाले। भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति। भुव इति वायौ। सुवरित्यादित्ये। मह इति ब्रह्मणि।

अन्तरेण तालुके=दोनों तालुओंके बीचमें; यः=जो; एषः=यह; स्तनः=इव=स्तनके सदृश; अवलम्बते=लटक रहा है; [तम् अपि अन्तरेण]=उसके भी भीतर; यत्र=जहाँ; असौ=वह; केशान्तः=केशोंका मूलस्थान (ब्रह्मरन्ध्र); विवर्तते=स्थित है;

३५२

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

(वहाँ) शीर्षकपाले=सिरके दोनों कपालोंको; व्यपोह्य=भेदन करके; [ विनिःसृता या ]=निकली हुई जो सुषुम्णा नाड़ी है; सा=वह; इन्द्रयोनिः=इन्द्रयोनि (परमात्माकी प्राप्तिका द्वार) है; (अन्तकालमें साधक) भूः इति='भूः' इस व्याहृतिके अर्थरूप; अग्नी=अग्निमें; प्रतितिष्ठति=प्रतिष्ठित होता है; भुवः इति='भुवः' इस व्याहृतिके अर्थरूप; वायो=वायुदेवतामें स्थित होता है; (फिर) सुवः इति='स्वः' इस व्याहृतिके अर्थरूप; आदित्ये=सूर्यमें स्थित होता है; (उसके बाद) महः इति='महः' इस व्याहृतिके अर्थस्वरूप; ब्रह्मणि=ब्रह्ममें स्थित होता है।

व्याख्या —उन परब्रह्म परमेश्वरको अपने हृदयमें प्रत्यक्ष देखनेवाला महापुरुष इस शरीरका त्याग करके जब जाता है, तब किस प्रकार किस मार्गसे बाहर निकलकर किस क्रमसे भूः, भुवः और स्वः रूप समस्त लोकोंमें परिपूर्ण सबके आत्मरूप परमेश्वरमें स्थित होता है—यह बात इस अनुवाकके दूसरे अंशमें समझायी गयी है। भाव यह है कि मनुष्योंके मुखमें तालुओंके बीचोबीच जो एक थनके आकारका मांस-पिण्ड लटकता है, जिसे बोलचालकी भाषामें 'घाँटी' कहते हैं, उसके आगे केशोंका मूलस्थान ब्रह्मरन्ध्र है; वहाँ हृदय-देशसे निकलकर घाँटीके भीतरसे होती हुई दोनों कपोलोंको भेदकर गयी हुई जो सुषुम्णा नामसे प्रसिद्ध नाड़ी है, वही उन इन्द्र नामसे कहे जानेवाले परमेश्वरकी प्राप्तिका द्वार है। अन्तकालमें वह महापुरुष उस मार्गसे शरीरके बाहर निकलकर 'भूः' इस नामसे अभिहित अग्निमें स्थित होता है। गीतामें भी यही बात कही गयी है कि ब्रह्मवेत्ता जब ब्रह्मलोकमें जाता है, तब वह सर्वप्रथम ज्योतिर्मय अग्निके अभिमानी देवताके अधिकारमें आता है (गीता ८।२४)। उसके बाद वायुमें स्थित होता है। अर्थात् पृथ्वीसे लेकर सूर्यलोकतक समस्त आकाशमें जिसका अधिकार है, जो सर्वत्र विचरनेवाली वायुका अभिमानी देवता है और जो 'भुवः' नामसे पञ्चम अनुवाकमें कहा गया है, उसीके अधिकारमें वह आता है। वह देवता उसे 'स्वः' इस नामसे कहे हुए सूर्यलोकमें पहुँचा देता है, वहाँसे फिर वह 'महः' इस नामसे कहे हुए 'ब्रह्म' में स्थित हो जाता है।

अनु० ६ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३५३

आज्नेति स्वाराज्यम् । आज्नेति मनसस्पतिम् । वाक्यतिश्वशुष्यतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः । एतन्ततो भवति ।

स्वाराज्यम्—(वह) स्वराज्यको; आज्नेति=प्राप्त कर लेता है; मनसस्पतिम्=मनके स्वामीको; आज्नेति=पा लेता है; वाक्यतिः [ भवति ]=वाणीका स्वामी हो जाता है; चशुष्यतिः=नेत्रोंका स्वामी; श्रोत्रपतिः=कानोंका स्वामी; (और) विज्ञानपतिः=विज्ञानका स्वामी हो जाता है; ततः=उस पहले बताये हुए साधनसे; एतत्=यह फल; भवति=होता है ।

व्याख्या—वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित महापुरुष कैसा हो जाता है—यह बात इस अनुवाकके तीसरे अंशमें बतलायी गयी है। अनुवाकके इस अंशका अभिप्राय यह है कि वह स्वराट् बन जाता है। अर्थात् उसपर प्रकृतिका अधिकार नहीं रहता, अपितु वह स्वयं ही प्रकृतिका अधिष्ठाता बन जाता है; क्योंकि वह मनके अर्थात् समस्त अन्तःकरणसमुदायके स्वामी परमात्माको प्राप्त कर लेता है, इसलिये वह वाणी, चक्षु, श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों और उनके देवताओंका तथा विज्ञानस्वरूप बुद्धिका भी स्वामी हो जाता है। अर्थात् ये सब उसके अधीन हो जाते हैं। उस पहले बताये हुए साधनसे यह उपर्युक्त फल मिलता है।

आकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्म प्राणारामं मनआनन्दम् । शान्तिसमृद्धममृतम् । इति प्राचीनयोग्योपास्त्व ।

ब्रह्म=वह ब्रह्म; आकाशशरीरम्=आकाशके सदृश शरीरवाला; सत्यात्म=सतारूप; प्राणारामम्=इन्द्रियादि समस्त प्राणोंको विश्राम देनेवाला; मनआनन्दम्=मनको आनन्द देनेवाला; शान्तिसमृद्धम्=शान्तिसे सम्पन्न; (तथा) अमृतम्=अविनाशी है; इति=यों मानकर; प्राचीनयोग्य=हे प्राचीनयोग्य!; उपास्त्व=तू उसकी उपासना कर ।

व्याख्या—वे प्राप्तव्य ब्रह्म कैसे हैं, उनका किस प्रकार चिन्तन और ध्यान करना चाहिये—यह बात इस अनुवाकके चौथे अंशमें बतायी गयी है। अभिप्राय यह है कि वे ब्रह्म आकाशके सदृश निराकार, सर्वव्यापी और अतिशय सूक्ष्म शरीरवाले हैं। एकमात्र सतारूप हैं। समस्त इन्द्रियोंको विश्राम

३५४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

देनेवाले और मनके लिये परम आनन्ददायक हैं। अखण्ड शान्तिके भण्डार हैं और सर्वथा अविनाशी हैं। परम विश्वासके साथ यों मानकर साधकको उनकी प्राप्तिके लिये उनके चिन्तन और ध्यानमें तत्परताके साथ लग जाना चाहिये, यह भाव दिखलानेके लिये अन्तमें श्रुतिकी वाणीमें ऋषि अपने शिष्यसे कहते हैं—‘हे प्राचीनयोग्य!* तू उन ब्रह्मका स्वरूप इस प्रकारका मानकर उनकी उपासना कर।’

॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥

सप्तम अनुवाक

पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशः। अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि। आप ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मा। इत्यधिभूतम्। अथाध्यात्मम्। प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः। चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक्। चर्म माः संस्त्रावारिस्थ मज्जा। एतदधिविधाय ऋषिर्वोचत्। पादुक्ते वा इदः सर्वम्। पादुक्तेनैव पादुक्तः स्युणोतीति।

पृथिवी=पृथ्वीलोक; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्षलोक; द्यौः=स्वर्गलोक; दिशः=दिशाएँ; अवान्तरदिशः=अवान्तर दिशाएँ—दिशाओंके बीचके कोण (यह पाँच लोकोंकी पड़्क्ति है); अग्निः=अग्नि; वायुः=वायु; आदित्यः=सूर्य; चन्द्रमाः=चन्द्रमा; नक्षत्राणि=(तथा) समस्त नक्षत्र (यह पाँच ज्योतिः-समुदायकी पड़्क्ति है); आपः=जल; ओषधयः=ओषधियाँ; वनस्पतयः=वनस्पतियाँ; आकाशः=आकाश; आत्मा=(तथा) इनका संघातस्वरूप अन्नमय स्थूलशरीर (ये पाँचों मिलकर स्थूल पदार्थोंकी पड़्क्ति है); इति=यह; अधिभूतम्=आधिभौतिक दृष्टिसे वर्णन हुआ; अथ=अब; अध्यात्मम्=आध्यात्मिक दृष्टिसे बतलाते हैं; प्राणः=प्राण; व्यानः=व्यान;

  • पहलेसे ही जिसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता हो, वह 'प्राचीनयोग्य' है। अथवा यह शिष्यका नाम है।

अनु० ७ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

३५५

अपानः=अपान; उदानः=उदान; (और) समानः=समान (यह पाँचों प्राणोंकी पड़क्ति है); चक्षुः=नेत्र; श्रोत्रम्=कान; मनः=मन; वाक्=वाणी; (और) त्वक्=त्वचा; (यह पाँचों करणोंकी पड़क्ति है); चर्म=चर्म; मांसम्=मांस; स्नावा=नाड़ी; अस्थि=हड्डी; (और) मज्जा=मज्जा (यह पाँच शरीरगत धातुओंकी पड़क्ति है); एतत्=यह (इस प्रकार); अधिविधाय=सम्यक् कल्पना करके; ऋषिः=ऋषिने; अवोचत्=कहा; इदम्=यह; सर्वम्=सब; वै=निश्चय ही; पाङ्क्तम्=पाङ्क्त है;* पाङ्क्तेन एव पाङ्क्तम्=(साधक) इस आध्यात्मिक पाङ्क्तसे ही बाह्य पाङ्क्तको और बाह्यसे अध्यात्म पाङ्क्तको; स्मृणोति इति=पूर्ण करता है।

व्याख्या—इस अनुवाकके दो भाग हैं। पहले भागमें मुख्य-मुख्य आधिभौतिक पदार्थोंको लोक, ज्योति और स्थूल पदार्थ—इन तीन पड़क्तियोंमें विभक्त करके उनका वर्णन किया है और दूसरे भागमें मुख्य-मुख्य आध्यात्मिक (शरीरस्थित) पदार्थोंको प्राण, कारण और धातु—इन तीन पड़क्तियोंमें विभक्त करके उनका वर्णन किया है। अन्तमें उनका उपयोग करनेकी युक्ति बतायी गयी है।

भाव यह है कि पृथ्वीलोक, अन्तरिक्षलोक, स्वर्गलोक, पूर्व-पश्चिम आदि दिशाएँ और आग्रेय, नैऋत्य आदि अवान्तर दिशाएँ—इस प्रकार यह लोकोंकी आधिभौतिक पड़क्ति है। अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र—इस प्रकार यह ज्योतियोंकी आधिभौतिक पड़क्ति है तथा जल, ओषधियाँ, वनस्पति, आकाश और पाञ्चभौतिक स्थूल शरीर—इस प्रकार यह स्थूल जड पदार्थोंकी आधिभौतिक पड़क्ति है। यह सब मिलकर आधिभौतिक पाङ्क्त अर्थात् भौतिक पड़क्तियोंका समूह है। इसी प्रकार यह आगे बताया हुआ आध्यात्मिक शरीरके भीतर रहनेवाला पाङ्क्त है। इसमें प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान—इस प्रकार यह प्राणोंकी पड़क्ति है। नेत्र, कान, मन, वाणी और त्वचा—इस प्रकार यह करण-समुदायकी पड़क्ति है; तथा चर्म, मांस, नाड़ी, हड्डी और मज्जा—इस प्रकार यह शरीरगत धातुओंकी पड़क्ति है। इस प्रकार प्रधान-प्रधान आधिभौतिक

  • पड़क्तियोंके समूहको ही 'पाङ्क्त' कहते हैं।