ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 355, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ]
तैत्तिरीयोपनिषद्
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आज्नेति स्वाराज्यम् । आज्नेति मनसस्पतिम् । वाक्यतिश्वशुष्यतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः । एतन्ततो भवति ।
स्वाराज्यम्—(वह) स्वराज्यको; आज्नेति=प्राप्त कर लेता है; मनसस्पतिम्=मनके स्वामीको; आज्नेति=पा लेता है; वाक्यतिः [ भवति ]=वाणीका स्वामी हो जाता है; चशुष्यतिः=नेत्रोंका स्वामी; श्रोत्रपतिः=कानोंका स्वामी; (और) विज्ञानपतिः=विज्ञानका स्वामी हो जाता है; ततः=उस पहले बताये हुए साधनसे; एतत्=यह फल; भवति=होता है ।
व्याख्या—वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित महापुरुष कैसा हो जाता है—यह बात इस अनुवाकके तीसरे अंशमें बतलायी गयी है। अनुवाकके इस अंशका अभिप्राय यह है कि वह स्वराट् बन जाता है। अर्थात् उसपर प्रकृतिका अधिकार नहीं रहता, अपितु वह स्वयं ही प्रकृतिका अधिष्ठाता बन जाता है; क्योंकि वह मनके अर्थात् समस्त अन्तःकरणसमुदायके स्वामी परमात्माको प्राप्त कर लेता है, इसलिये वह वाणी, चक्षु, श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों और उनके देवताओंका तथा विज्ञानस्वरूप बुद्धिका भी स्वामी हो जाता है। अर्थात् ये सब उसके अधीन हो जाते हैं। उस पहले बताये हुए साधनसे यह उपर्युक्त फल मिलता है।
आकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्म प्राणारामं मनआनन्दम् । शान्तिसमृद्धममृतम् । इति प्राचीनयोग्योपास्त्व ।
ब्रह्म=वह ब्रह्म; आकाशशरीरम्=आकाशके सदृश शरीरवाला; सत्यात्म=सतारूप; प्राणारामम्=इन्द्रियादि समस्त प्राणोंको विश्राम देनेवाला; मनआनन्दम्=मनको आनन्द देनेवाला; शान्तिसमृद्धम्=शान्तिसे सम्पन्न; (तथा) अमृतम्=अविनाशी है; इति=यों मानकर; प्राचीनयोग्य=हे प्राचीनयोग्य!; उपास्त्व=तू उसकी उपासना कर ।
व्याख्या—वे प्राप्तव्य ब्रह्म कैसे हैं, उनका किस प्रकार चिन्तन और ध्यान करना चाहिये—यह बात इस अनुवाकके चौथे अंशमें बतायी गयी है। अभिप्राय यह है कि वे ब्रह्म आकाशके सदृश निराकार, सर्वव्यापी और अतिशय सूक्ष्म शरीरवाले हैं। एकमात्र सतारूप हैं। समस्त इन्द्रियोंको विश्राम