ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
(वहाँ) शीर्षकपाले=सिरके दोनों कपालोंको; व्यपोह्य=भेदन करके; [ विनिःसृता या ]=निकली हुई जो सुषुम्णा नाड़ी है; सा=वह; इन्द्रयोनिः=इन्द्रयोनि (परमात्माकी प्राप्तिका द्वार) है; (अन्तकालमें साधक) भूः इति='भूः' इस व्याहृतिके अर्थरूप; अग्नी=अग्निमें; प्रतितिष्ठति=प्रतिष्ठित होता है; भुवः इति='भुवः' इस व्याहृतिके अर्थरूप; वायो=वायुदेवतामें स्थित होता है; (फिर) सुवः इति='स्वः' इस व्याहृतिके अर्थरूप; आदित्ये=सूर्यमें स्थित होता है; (उसके बाद) महः इति='महः' इस व्याहृतिके अर्थस्वरूप; ब्रह्मणि=ब्रह्ममें स्थित होता है।
व्याख्या —उन परब्रह्म परमेश्वरको अपने हृदयमें प्रत्यक्ष देखनेवाला महापुरुष इस शरीरका त्याग करके जब जाता है, तब किस प्रकार किस मार्गसे बाहर निकलकर किस क्रमसे भूः, भुवः और स्वः रूप समस्त लोकोंमें परिपूर्ण सबके आत्मरूप परमेश्वरमें स्थित होता है—यह बात इस अनुवाकके दूसरे अंशमें समझायी गयी है। भाव यह है कि मनुष्योंके मुखमें तालुओंके बीचोबीच जो एक थनके आकारका मांस-पिण्ड लटकता है, जिसे बोलचालकी भाषामें 'घाँटी' कहते हैं, उसके आगे केशोंका मूलस्थान ब्रह्मरन्ध्र है; वहाँ हृदय-देशसे निकलकर घाँटीके भीतरसे होती हुई दोनों कपोलोंको भेदकर गयी हुई जो सुषुम्णा नामसे प्रसिद्ध नाड़ी है, वही उन इन्द्र नामसे कहे जानेवाले परमेश्वरकी प्राप्तिका द्वार है। अन्तकालमें वह महापुरुष उस मार्गसे शरीरके बाहर निकलकर 'भूः' इस नामसे अभिहित अग्निमें स्थित होता है। गीतामें भी यही बात कही गयी है कि ब्रह्मवेत्ता जब ब्रह्मलोकमें जाता है, तब वह सर्वप्रथम ज्योतिर्मय अग्निके अभिमानी देवताके अधिकारमें आता है (गीता ८।२४)। उसके बाद वायुमें स्थित होता है। अर्थात् पृथ्वीसे लेकर सूर्यलोकतक समस्त आकाशमें जिसका अधिकार है, जो सर्वत्र विचरनेवाली वायुका अभिमानी देवता है और जो 'भुवः' नामसे पञ्चम अनुवाकमें कहा गया है, उसीके अधिकारमें वह आता है। वह देवता उसे 'स्वः' इस नामसे कहे हुए सूर्यलोकमें पहुँचा देता है, वहाँसे फिर वह 'महः' इस नामसे कहे हुए 'ब्रह्म' में स्थित हो जाता है।