भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

देनेवाले और मनके लिये परम आनन्ददायक हैं। अखण्ड शान्तिके भण्डार हैं और सर्वथा अविनाशी हैं। परम विश्वासके साथ यों मानकर साधकको उनकी प्राप्तिके लिये उनके चिन्तन और ध्यानमें तत्परताके साथ लग जाना चाहिये, यह भाव दिखलानेके लिये अन्तमें श्रुतिकी वाणीमें ऋषि अपने शिष्यसे कहते हैं—‘हे प्राचीनयोग्य!* तू उन ब्रह्मका स्वरूप इस प्रकारका मानकर उनकी उपासना कर।’

॥ षष्ठ अनुवाक समाप्त ॥ ६ ॥

सप्तम अनुवाक

पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशः। अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि। आप ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मा। इत्यधिभूतम्। अथाध्यात्मम्। प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः। चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक्। चर्म माः संस्त्रावारिस्थ मज्जा। एतदधिविधाय ऋषिर्वोचत्। पादुक्ते वा इदः सर्वम्। पादुक्तेनैव पादुक्तः स्युणोतीति।

पृथिवी=पृथ्वीलोक; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्षलोक; द्यौः=स्वर्गलोक; दिशः=दिशाएँ; अवान्तरदिशः=अवान्तर दिशाएँ—दिशाओंके बीचके कोण (यह पाँच लोकोंकी पड़्क्ति है); अग्निः=अग्नि; वायुः=वायु; आदित्यः=सूर्य; चन्द्रमाः=चन्द्रमा; नक्षत्राणि=(तथा) समस्त नक्षत्र (यह पाँच ज्योतिः-समुदायकी पड़्क्ति है); आपः=जल; ओषधयः=ओषधियाँ; वनस्पतयः=वनस्पतियाँ; आकाशः=आकाश; आत्मा=(तथा) इनका संघातस्वरूप अन्नमय स्थूलशरीर (ये पाँचों मिलकर स्थूल पदार्थोंकी पड़्क्ति है); इति=यह; अधिभूतम्=आधिभौतिक दृष्टिसे वर्णन हुआ; अथ=अब; अध्यात्मम्=आध्यात्मिक दृष्टिसे बतलाते हैं; प्राणः=प्राण; व्यानः=व्यान;

  • पहलेसे ही जिसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता हो, वह 'प्राचीनयोग्य' है। अथवा यह शिष्यका नाम है।