भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अनु० ७ ]

तैत्तिरीयोपनिषद्

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अपानः=अपान; उदानः=उदान; (और) समानः=समान (यह पाँचों प्राणोंकी पड़क्ति है); चक्षुः=नेत्र; श्रोत्रम्=कान; मनः=मन; वाक्=वाणी; (और) त्वक्=त्वचा; (यह पाँचों करणोंकी पड़क्ति है); चर्म=चर्म; मांसम्=मांस; स्नावा=नाड़ी; अस्थि=हड्डी; (और) मज्जा=मज्जा (यह पाँच शरीरगत धातुओंकी पड़क्ति है); एतत्=यह (इस प्रकार); अधिविधाय=सम्यक् कल्पना करके; ऋषिः=ऋषिने; अवोचत्=कहा; इदम्=यह; सर्वम्=सब; वै=निश्चय ही; पाङ्क्तम्=पाङ्क्त है;* पाङ्क्तेन एव पाङ्क्तम्=(साधक) इस आध्यात्मिक पाङ्क्तसे ही बाह्य पाङ्क्तको और बाह्यसे अध्यात्म पाङ्क्तको; स्मृणोति इति=पूर्ण करता है।

व्याख्या—इस अनुवाकके दो भाग हैं। पहले भागमें मुख्य-मुख्य आधिभौतिक पदार्थोंको लोक, ज्योति और स्थूल पदार्थ—इन तीन पड़क्तियोंमें विभक्त करके उनका वर्णन किया है और दूसरे भागमें मुख्य-मुख्य आध्यात्मिक (शरीरस्थित) पदार्थोंको प्राण, कारण और धातु—इन तीन पड़क्तियोंमें विभक्त करके उनका वर्णन किया है। अन्तमें उनका उपयोग करनेकी युक्ति बतायी गयी है।

भाव यह है कि पृथ्वीलोक, अन्तरिक्षलोक, स्वर्गलोक, पूर्व-पश्चिम आदि दिशाएँ और आग्रेय, नैऋत्य आदि अवान्तर दिशाएँ—इस प्रकार यह लोकोंकी आधिभौतिक पड़क्ति है। अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र—इस प्रकार यह ज्योतियोंकी आधिभौतिक पड़क्ति है तथा जल, ओषधियाँ, वनस्पति, आकाश और पाञ्चभौतिक स्थूल शरीर—इस प्रकार यह स्थूल जड पदार्थोंकी आधिभौतिक पड़क्ति है। यह सब मिलकर आधिभौतिक पाङ्क्त अर्थात् भौतिक पड़क्तियोंका समूह है। इसी प्रकार यह आगे बताया हुआ आध्यात्मिक शरीरके भीतर रहनेवाला पाङ्क्त है। इसमें प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान—इस प्रकार यह प्राणोंकी पड़क्ति है। नेत्र, कान, मन, वाणी और त्वचा—इस प्रकार यह करण-समुदायकी पड़क्ति है; तथा चर्म, मांस, नाड़ी, हड्डी और मज्जा—इस प्रकार यह शरीरगत धातुओंकी पड़क्ति है। इस प्रकार प्रधान-प्रधान आधिभौतिक

  • पड़क्तियोंके समूहको ही 'पाङ्क्त' कहते हैं।