ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 349, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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भूः=भूः; भुवः=भुवः; सुवः=स्वः; इति=इस प्रकार; एताः=ये; वै=प्रसिद्ध; तिस्रः=तीन; व्याहतयः=व्याहतियाँ हैं; तासाम् उ=उन तीनोंकी अपेक्षासे; चतुर्थीम्=जो चौथी व्याहति; महः इति='मह' इस नामसे; ह=प्रसिद्ध है; एताम्=इसको; माहाचमस्यः=माहाचमसके पुत्रने; प्रवेदयते स्म=सबसे पहले जाना था; तत्=वह चौथी व्याहति ही; ब्रह्म=ब्रह्म है; सः=वह; आत्मा=(ऊपर कही हुई व्याहतियोंका) आत्मा है; अन्धाः=अन्ध; देवताः=सब देवता; अङ्गनिः=(उसके) अङ्ग हैं; भूः='भूः'; इति=यह व्याहति; वै=ही; अयम् लोकः=यह पृथ्वीलोक है; भुवः='भुवः'; इति=यह; अन्तरिक्षम्=अन्तरिक्ष-लोक है; सुवः='स्वः'; इति=यह; असौ लोकः=वह प्रसिद्ध स्वर्गलोक है; महः='महः'; इति=यह; आदित्यः=आदित्य—सूर्य है; आदित्येन=(क्योंकि) आदित्यसे; वावः=ही; सर्वे=समस्त; लोकाः=लोक; महीयन्ते=महिमान्वित होते हैं।
व्याख्या —इस पञ्चम अनुवाकमें भूः, भुवः, स्वः और महः—इन चारों व्याहतियोंकी उपासनाका रहस्य बताकर उसके फलका वर्णन किया गया है। पहले तो इसमें यह बात कही गयी है कि भूः, भुवः और स्वः—ये तीन व्याहतियाँ तो प्रसिद्ध हैं; परंतु इनके अतिरिक्त जो चौथी व्याहति 'महः' है, इसकी उपासनाका रहस्य सबसे पहले माहाचमसके पुत्रने जाना था। भाव यह है कि इन चारों व्याहतियोंको चार प्रकारसे प्रयोग करके उपासना करनेकी विधि, जो आगे बतायी गयी है, तभीसे प्रचलित हुई है। इसके बाद उन चार व्याहतियोंमें किस प्रकारकी भावना करके उपासना करनी चाहिये, यह समझाया गया है। इन चारों व्याहतियोंमें 'महः' यह चौथी व्याहति सर्वप्रधान है। अतः उपास्य देवोंमें 'महः' व्याहतिको ब्रह्मका स्वरूप समझना चाहिये—यह भाव समझानेके लिये कहा गया है कि वह चौथी व्याहति 'महः' ब्रह्मका नाम होनेसे ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्म सबके आत्मा हैं, सर्वरूप हैं और अन्य सब देवता उनके अङ्ग हैं; अतः जिस किसी भी देवताकी इन व्याहतियोंके द्वारा उपासना की जाय, उसमें इस बातको नहीं भूलना चाहिये कि यह सर्वरूप परमेश्वरकी ही उपासना है। सब देवता उन्हींके अङ्ग होनेसे अन्य देवोंकी उपासना भी उन्हींकी उपासना है।