भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 350

३४८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ वल्ली १ ]

(गीता ९।२३-२४) उसके पश्चात् इन व्याहितियोंमें लोकोंका चिन्तन करनेकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है—‘भूः’ यह तो मानो पृथ्वीलोक है, ‘भुवः’ यह अन्तरिक्षलोक है, ‘स्वः’ यह सुप्रसिद्ध स्वर्गलोक है और ‘महः’ यह सूर्य है; क्योंकि सूर्यसे ही सब लोक महिमान्वित हो रहे हैं। तात्पर्य यह कि भूः भुवः, स्वः—ये तीनों व्याहितियाँ तो उन परमेश्वरके विराट् शरीररूप इस स्थूल ब्रह्माण्डको बतानेवाली—अर्थात् परमेश्वरके अङ्गोंके नाम हैं तथा ‘महः’ यह चौथी व्याहिति इस विराट् शरीरको प्रकाशित करनेवाले उसके आत्मारूप परमेश्वरको बतानेवाली है। ‘महः’ यह सूर्यका नाम है, सूर्यके भी आत्मा हैं परमेश्वर; अतः सूर्यरूपसे सब लोकोंको वे ही प्रकाशित करते हैं। इसलिये यहाँ सूर्यके उपलक्षणसे इस विराट् शरीरको प्रकाशित करनेवाले इसके आत्मारूप परमेश्वरकी ही उपासनाका लक्ष्य कराया गया है।

भूरिति वा अग्निः। भुव इति वायुः। सुवरित्यादित्यः। मह इति चन्द्रमाः। चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतीः५ षि महीयन्ते। भूरिति वा ऋचः। भुव इति सामानि। सुवरिति यजूः५ षि। मह इति ब्रह्म। ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते।

भूः=‘भूः’; इति=यह व्याहिति; वै=ही; अग्निः=अग्नि है; भुवः=‘भुवः’; इति=यह; वायुः=वायु है; सुवः=‘स्वः’; इति=यह; आदित्यः=आदित्य है; महः=‘महः’; इति=यह; चन्द्रमाः=चन्द्रमा है; (क्योंकि) चन्द्रमसा=चन्द्रमासे; वाव=ही; सर्वाणि=समस्त; ज्योतीषि=ज्योतियाँ; महीयन्ते=महिमावाली होती हैं; भूः=‘भूः’; इति=यह व्याहिति; वै=ही; ऋचः=ऋग्वेद है; भुवः=‘भुवः’; इति=यह; सामानि=सामवेद है; सुवः=‘स्वः’; इति=यह; यजूषि=यजुर्वेद है; महः=‘महः’; इति=यह; ब्रह्म=ब्रह्म है; (क्योंकि) ब्रह्मणा=ब्रह्मसे; वाव=ही; सर्वे=समस्त; वेदाः=वेद; महीयन्ते=महिमावान् होते हैं।

व्याख्या —इसी प्रकार फिर ज्योतियोंमें इन व्याहितियोंद्वारा परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार बताया गया है। भाव यह है कि ‘भूः’ यह व्याहिति अग्निका

ईशादि नौ उपनिषद् · पृष्ठ 350, कुल 548 में से · BharatKosha