ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 351, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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नाम होनेसे मानो अग्नि ही है। अग्निदेवता वाणीका अधिष्ठाता है और वाणी भी प्रत्येक विषयको व्यक्त करके प्रकाशित करनेवाली होनेसे ज्योति है; अतः वह भी ज्योतियोंकी उपासनामें मानो ‘भूः’ है। ‘भुवः’ यह वायु है। वायुदेवता त्वक्-इन्द्रियका अधिष्ठाता है और त्वक्-इन्द्रिय स्पर्शको प्रकाशित करनेवाली ज्योति है; अतः ज्योतिविषयक उपासनामें वायु और त्वचाको ‘भुवः’ रूप समझना चाहिये। ‘स्वः’ यह सूर्य है। सूर्य चक्षु-इन्द्रियका अधिष्ठातृ देवता है, चक्षु-इन्द्रिय भी सूर्यकी सहायतासे रूपको प्रकाशित करनेवाली ज्योति है; अतः ज्योतिविषयक उपासनामें सूर्य और चक्षु-इन्द्रियको ‘स्वः’ व्याहृतिस्वरूप समझना चाहिये। ‘महः’ यह चौथी व्याहृति ही मानो चन्द्रमा है, चन्द्रमा मनका अधिष्ठातृ देवता है। मनकी सहायतासे मनके साथ रहनेपर ही समस्त इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको प्रकाशित कर सकती हैं, मनके बिना नहीं कर सकतीं; अतः सब ज्योतियोंमें प्रधान चन्द्रमा और मनको ही ‘महः’ व्याहृतिरूप समझना चाहिये; क्योंकि चन्द्रमासे अर्थात् मनसे ही समस्त ज्योतिरूप इन्द्रियाँ महिमान्वित होती हैं। इस प्रकार मनके रूपमें परमेश्वरकी उपासना करनेकी विधि समझायी गयी है। फिर इसी भाँति वेदोंके विषयमें व्याहृतियोंके प्रयोगद्वारा परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार बताया गया है। भाव यह है कि ‘भूः’ यह ऋग्वेद है, ‘भुवः’ यह सामवेद है, ‘स्वः’ यह यजुर्वेद है और ‘महः’ यह ब्रह्म है; क्योंकि ब्रह्मसे ही समस्त वेद महिमायुक्त होते हैं। तात्पर्य यह कि सम्पूर्ण वेदोंमें वर्णित समस्त ज्ञान परब्रह्म परमेश्वरसे ही प्रकट और उन्हींसे व्याप्त है तथा उन परमेश्वरके तत्त्वका इन वेदोंमें वर्णन है, इसीलिये इनकी महिमा है। इस प्रकार वेदोंमें इन व्याहृतियोंका प्रयोग करके उपासना करनी चाहिये।
भूरिति वै प्राणः। भुव इत्यपानः। सुवरिति व्यानः। मह इत्यन्नम्। अत्रेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते। ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा। चतस्रश्चतस्रो व्याहतयः। ता यो वेद। स वेद ब्रह्म। सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति।