ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 352, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली १ ]
भूः='भूः'; इति=यह व्याहृति; वै=ही; प्राणः=प्राण है; भुवः='भुवः'; इति=यह; अपानः=अपान है; सुवः='स्वः'; इति=यह; व्यानः=व्यान है; महः='महः'; इति=यह; अत्रम्=अत्र है; (क्योंकि) अत्रेन=अत्रसे; वावः=ही; सर्वे=समस्त; प्राणाः=प्राण; महीयन्ते=महिमायुक्त होते हैं; ताः=वे; वै=ही; एताः=ये; चतस्त्रः=चारों व्याहृतियाँ; चतुर्धा=चार प्रकारकी हैं; (अतएव) चतस्त्रः चतस्त्रः=एक-एकके चार-चार भेद होनेसे कुल सोलह; व्याहृतयः=व्याहृतियाँ हैं; ताः=उनको; यः=जो; वेद=तत्त्वसे जानता है; सः=वह; ब्रह्म=ब्रह्मको; वेद=जानता है; अस्मै=इस ब्रह्मवेताके लिये; सर्वे=समस्त; देवाः=देवता; बलिम्=भेंट; आवहन्ति=समर्पण करते हैं।
व्याख्या —उसके बाद प्राणोंके विषयमें इन व्याहृतियोंका प्रयोग करके उपासनाका प्रकार समझाया गया है। भाव यह है कि 'भूः' यही मानो प्राण है, 'भुवः' यह अपान है, 'स्वः' यह व्यान है। इस प्रकार जगद्वापी समस्त प्राण ही मानो ये तीनों व्याहृतियाँ हैं और अत्र 'महः' रूप चतुर्थ व्याहृति है; क्योंकि जिस प्रकार व्याहृतियोंमें 'महः' प्रधान है, उसी प्रकार समस्त प्राणोंका पोषण करके उनकी महिमाको बनाये रखने और बढ़ानेके कारण उनकी अपेक्षा अत्र प्रधान है; अतः प्राणोंके अन्तर््यामी परमेश्वरकी अत्रके रूपमें उपासना करनी चाहिये।
इस तरह चारों व्याहृतियोंको चार प्रकारसे प्रयुक्त करके उपासना करने-की रीति बताकर फिर उसे समझकर उपासना करनेका फल बताया गया है। भाव यह कि चार प्रकारसे प्रयुक्त इन चारों व्याहृतियोंकी उपासनाके भेदको जो कोई जान लेता है, अर्थात् समझकर उसके अनुसार परब्रह्म परमात्माकी उपासना करता है, वह ब्रह्मको जान लेता है और समस्त देव उसको भेंट समर्पण करते हैं—उसे परमेश्वरका प्यारा समझकर उसका आदर-सत्कार करते हैं।
॥ पञ्चम अनुवाक समाप्त ॥ ५ ॥